जिन्दगी का मोल
जिन्दगी का मोल
यह ज़िन्दगी साधारण व्यक्तियों की तुच्छ सी बातों पर रोने के लिये नहीं है। जिन्दगी बहुत बड़ी है। यह एक व्यक्ति के सिर पर बैठकर बिताने के लिये नहीं है। करने के लिये काम की कमी नहीं। नहीं तो कहानी उपन्यास पढ़कर भी जिन्दगी बिताई जा सकती है। । कुछ लिखने का शौक़ बढ़ाया जा सकता है। अपने ऑफिस के काम में और बच्चों के काम में व्यस्त रहा जा सकता है। इतना समय ही कहॉं है कि बुद्धुओं के बारे में सोचते रहकर अपनी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी जाय।
अंजना बैठी सोच रही थी। विचार धारा चल रही थी- “ कितना अच्छा होगा वह दिन जब मैं अपने प्रति किये गये इस अपमान का बदला उतनी ही स्वतंत्र अभिव्यक्ति देकर ले लूँगी। काश, आज इसी पल से यह कार्य शुरू हो जाय।”
अंजना खाना खा रही थी। ट्रक की आवाज़ आई। उसके पति उधर से गुजरे। अंजना ने पूछा-“ बाहर क्या था ?”
बोले- “ट्रक था।”
इसके आगे कोई जवाब नही, न कुछ बतलाना। अर्थात् अंजना पूछे तब आगे बोलेंगे, नहीं तो कोई मतलब नहीं ।अंजना ने ही पूछा-“क्यों आया था यहॉं ?”
बड़ी लापरवाही से बोले-“ ईंटें लाया था, पीछे जो बन रहा है कार धोने के लिये शेड ।” अपनी तरफ़ से इन्होंने कुछ बताने की ज़रूरत नहीं समझी थी ।
इस बात को लेकर अंजना का मन उद्विग्न हो उठा। आज सुबह ही चपरासी मावलंकर से अंजना को पता चला था कि बाहर मोटर धोने के लिये शेड बन रहा है। बड़ा बुरा लगा उसे। “इस बार पूछना तो दूर , इन्होंने कोई सूचना तक देने की ज़रूरत नहीं समझी; जबकि मैं हर काम इनसे पूछकर करती हूँ।कितनी बड़ी निर्भरता है मेरी इनके ऊपर। अच्छा हो कि मैं भी इनसे बिना पूछे काम किया करुँ ।”
ऐसा ही रेडियो स्टैंड के बारे में हुआ था। अंजना से बिना पूछे ही रेडियो का स्टैंड बन भी गया, लग भी गया। अंजना को इस बारे में कुछ पता नहीं चला। जब वह आफिस से लौटकर आई तो बच्चों ने बताया। तब जाकर देखा।
अंजना के मन में ग्लानि हुई-“ मैं इन पर कितना निर्भर रहती हूँ! और ये हैं कि पूछते तक नहीं हैं।किसी बात में मेरी राय आवश्यक नहीं समझते हैं।”
पति से दो मीठी बातें तो कभी क्या होतीं , यही सुनने को मिल जाता है-“तुम मेरी लाईफ़ में इंटरफियर मत करो, मैं तुम्हारी लाईफ़ में नहीं करूँगा , मैं जैसे चाहूँ, रहूँ ।”
कहने को तो कह दिया। लेकिन अमल कहॉं होता है? झुकना और सहना पत्नी को ही होता है।
घर है, बच्चे हैं,अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़कर पत्नी कहॉं जाये।
पति अपनी मनमाफिक करे, चल जाता है। लेकिन पत्नी घर सँभालती है, उसे सबकी ओर देखना होता है, सबका मन रखना होता है।
पति की उखड़ी उखड़ी बातों पर ध्यान दें तो सब घर टूटते नज़र आयें। पत्नी की सहनशीलता और समझदारी से ही घर घर बनता है। समझदार पत्नियों का कहना है-“ पति की कड़वी बातों को भूल जाओ। अपने कानों में रुई ठूँस लो।” अर्थात् श्री भगवद् गीता का निष्काम कर्मयोग अपना लो, निरासक्त भाव से निन्दा प्रशंसा से दूर अपना कर्तव्य कर्म करते रहो।
