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Jeevan Bhambere

Abstract


4.0  

Jeevan Bhambere

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जिंदगी का मोड़

जिंदगी का मोड़

7 mins 272 7 mins 272

आधी रात को सडक पर वाहनों का तेज रफ्तार से आना जाना था। सभी वाहन एक-दुसरे को पीछे छोड़ने का अट्टहास करती हुई दौड रही थी। इन सभी वाहनो में उसका भी वाहन था, जो वह 120 की गति से दौड़ाये जा रहा था। उसका गाड़ी की गति पर जरा भी ध्यान नही था। उसे यह भी पता नहीं था कि वह कहाँ जा रहा है या उसे जाना कहा है। वह सिर्फ अपनी मोटरसायकिल को तेज गति से दौड़ा रहा था। रात होने के कारण हर तरफ एक अजब - सा सन्नाटा छाया हुआ था। ऐसे शांत वातावरण को चिरते हुये वह जा रहा था। ऐसे मे गूंज रही थी, तो वह थी सिर्फ गाड़ियों की आवाजें ! 


जैसे - जैसें उसकी मोटरसायकिल आगे बढ रही थी, वैसे - वैसे अपने हाथों से शंतनू अपनी गाड़ी की गति को और बढ़ा रहा था। उसे तो यह भी पता नहीं था कि उसका इरादा क्या है। उसके मन- मस्तिष्क में एक ही अलग वीचारों का शोर मचा हुआ था। पिछले कई दिनो से उसकी जिंदगी मे जो घटनाऍ घटित हुई थी , उन घटनाओं की वजह से उसका मन आज उसके बस में नहीं था। शंतनु अपने नाम की तरह ही शांत स्वभाव का था। वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। हर रोज कॉलेज में जाना-आना उसकी दिनचर्या का प्रमुख हिस्सा था। पढ़ाई में ज्यादा होशियार नहीं था वह ! पापा ने उसे बहुत लाड़ -प्यार से बड़ा किया था। बारहवीं की परीक्षा में कम अंक मिलने के बावजूद , उसके पापा ने उनकी इच्छापूर्ति के लिए शंतनु को इंजीनियरिंग कॉलेज में भर्ती करा दिया । माँ - की बहुतआशाएँ जुड़ी हुई थी, शंतनु से! परंतु, जैसे - जैसे वक्त बीतता जा रहा था, वैसे - वैसे उसके अंको का ग्राफ घटता जा रहा था। और इसका मुख्य कारण था, शंतनु का उसके माता-पिता द्वारा किया जानेवाला इंजीनियरिंग की पढ़ाई का आग्रह! उसके लिए शंतनु के माता-पिता ने जो सपने संजोके रखे थे, उन सपनों को पूरा करने में वह असफल हो रहा था और इसी कारण शंतनु के पापा उससे आज - कल बहुत नाराज रहने लगे थे। हर बात की नाराजगी वह शंतनु पर निकाल रहे थे। 


शंतनु के इंजीनियरिंग की पढ़ाई का आखरी यानी चौथा साल शुरू हो गया था। साल के पहले दिन जैसे ही शंतनु ने कॉलेज में प्रवेश किया , वैसे ही उसने एक लड़की को सामने से आते हुए देखा। उसे देखते ही शंतनु की नजरें उसपर टिकी की टिकी रह गयी। वो सामने से गुजर गयी फिर भी शंतनु की नजरे पीछे से उसकी आकृति पर गड़ी हुई थी। उसके नजरों से ओझल होने के बाद शंतनू ने उस लड़की के बारे मे जानकारी हासिल करना शुरू किया। जानकारी हासिल करने पर शंतनु को यह पता चला कि उस लडकी ने उसी के इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रथम वर्ष के लिये प्रवेश लिया है। उस लड़की का नाम चंचल था और अपने नाम की तरह ही वह चंचल थी। धीरे - धीरे शंतनुने चंचल से जान - पहचान बढ़ानी शुरू कर दी। थोडे ही दिनों मे उनमे अच्छी पहचान बढ़ी और वे दोनों अच्छे दोस्त बन गये। देखते ही देखते ये दोस्ती का रिश्ता, प्यार के रिश्ते मे बदल गया। दोनों एक - दुसरे से बहुत प्यार करते थे , फिर भी छोटी - छोटी वजहों से उनमें अक्सर झगड़े भी हुआ करते थे। उनके झगड़े ज्यादा देर नहीं टिकते थे। कभी बड़े झगड़े या लड़ाइयों की नौबत अभी तक तो नहीं आयी थी। छोटे-मोठे झगड़े होना वाजिब था क्योंकि उन दोनों का स्वभाव एक - दुसरे से बिल्कुल अलग था। दोनों का स्वभाव हुबहू अपने नामों जैसा था - शंतनु का शांत तथा चंचल बहुत ही चंचल थी। झगड़े के बावजूद भी वह दोनों एक - दूसरे के बिना ज्यादा देर तक रह नहीं सकते थे। चंचल स्वभाव से चंचल तो थी ही, परंतु वह पढ़ाई में भी खूब तेज थी। उसे पढ़ाई में विशेष रुचि थी। इसी कारणवश उसे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बड़ी आसानी से कॉलेज में प्रवेश मिल गया था। वह हमेशा कुछ न कुछ पढ़ते ही रहती थी। इसलिए उसे लगता था की शंतनु भी अच्छी पढ़ाई करें , अच्छे अंको से इंजीनियरिंग पास करके वह एक प्रतिष्ठित कंपनी में नोकरी करे। वह अपनी इच्छा शंतनु को हमेशा बताती रहती थी। पर शंतनु उसकी किसी भी बात को गंभीरता से नहीं लेता था और यहीं मुख्य कारण था उन दोनों के बीच तनाव , मनमुटाव तथा झगड़े का। 


इसी वजह के चलते एक दिन शंतनु और चंचल में बहुत बड़ा झगड़ा हो गया। उस झगड़े की तीव्रता इतनी थी कि अगर शंतनु मन लगाकर पढ़ाई करके अच्छे अंकों से इंजीनियरिंग पास करके किसी बड़ी कंपनी में नौकरी हासील करेगा , तो ही वह उसके साथ शादी करेगी नहीं तो नहीं , ऐसा फैसला सुनाकर चंचल वहाँ से गुस्से होकर चली गयी। परंतु शंतनु जो अपने नाम की तरह ही शांत था, फिर भी उसका मन कभी इंजीनियरिंग की पढ़ाई में नही लगा। उसे हमेशा यही लगता कि चंचल जो उसे इतना प्यार करती है, उन दोनों के बीच कुछ भी अनबन हो जाये तब भी चंचल उसे छोड़कर कभी नही जायेगी। इसी झूठे आत्मविश्वास के बल पर हर वर्ष की तरह , इस वर्ष भी शंतनु ने पढ़ाई को टाल दिया। आखिर इंजीनियरिंग के आखरी साल का परिणाम घोषित हुआ। हर साल वह जैसे-तैसे परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता, परंतु इस आखरी वर्ष की परीक्षा में शंतनु अनुत्तीर्ण हो गया। चंचल ने जब शंतनु के परीक्षा का परिणाम देखा, तब शंतनु से बिना एक शब्द कहे उसे छोड़कर चली गयी। शंतनुने चंचल को रोकने की बहुत कोशिश की, परंतु चंचल कुछ भी सुनने की अवस्था में नहीं थी। 


चंचल के छोड़कर चले जाने के बाद शंतनु खुद को संभालते हुए घर पहुँचा। घर पहुँचने के बाद जब उसके पिताजी उसके परिणाम से अवगत हुए तो उन्होंने शंतनु को बहुत बुरी तरह से फटकारा और आवेश में उसे घर छोड़कर चले जाने का आदेश दिया। दोनों तरफ से मुँह पर खाने के बाद शंतनु गुस्से में पागल हो रहा था। उसका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया था । वह घर से निकला और अपनी मोटरसाइकिल शुरू कर के वहाँ से चल दिया। उसे कहाँ जाना है, क्या करना है कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। यहाँ-वहाँ अपनी गाड़ी दौड़ाते हुये वह चल दिया। जैसे-जैसे उसकी गाड़ी आगे दौड़ रही थी, वैसे-वैसे वह अपनी गाड़ी की गति को और बढ़ाता जा रहा था। उसके मन में आत्महत्या का विचार घर कर रहा था। तभी अचानक उस रात के सन्नाटे को एक आवाज ने उसे बैचेन कर दिया। बहुत ही बड़ी दुर्घटना उस सड़क पर घटित हो चुकी थी। अपनी आँखों के सामने हुई इस भयानक दुर्घटना को देखकर शंतनु ने अपनी मोटरसाइकिल को रास्ते के बाजूं में रूकाकर दुर्घटनास्थल पर भागा। वह जाकर उसने जिस गाड़ी का अपघात हो गया था , उस गाड़ी में से लोगो को बाहर निकालने की कोशिश करने लगा। उस गाड़ी में तीन लोग थे ; माता-पिता और उनका एक छोटा बेटा। इस हादसे में उस पति-पत्नी को बहुत सारी चोटें आयी थी। परंतु उस वक्त उन्हें अपनी घावों की चिंता बिल्कुल नहीं थी। उस हालात में भी वह दोनों अपने बेटे को ढूंढ़ रहे थे। अपने बेटे के प्रति उन दम्पत्ति ला वह प्यार, वह चिंता शंतनु के समझ मे आ रही थी। वह जिस परिस्थितियों से गुजर रहा था, उनके ठीक विपरीत यह स्थिति वह अपने आँखों से देख रहा था । उसे यह समझ आ रहा था कि भले ही माँ-बाप कितने ही डाँटे, कितना भी गुस्सा क्यों न करे, पर वो अपने बच्चों से अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते है। अगर मेरे साथ भी ऐसा कुछ घटित हो जाये, तो मेरे माता-पिता भी मेरे बिना जिंदा नही रह पायेंगे। शंतनु को अपनी गलती का अहसास हो गया । उसने आत्महत्या का विचार पूरी तरह से अपने मन से निकालकर फेंक दिया, उन तीनों को जल्दी से सुरक्षित रूप से अस्पताल पहुँचाया। और अपनी मोटरसाइकिल को लेकर अपने घर पहुँच गया। घर पहुँचते ही वह भागकर अपने पिता के गले लगा। मैं आपकी आशाओं पर, सपनों पर खरा नहीं उतर पाया , अपनी इस गलती को मानकर उसने माता-पिता से दिल से माफ़ी माँगी। उसके अचानक आये इस बदलाव से माता-पिता बहुत ही संतुष्ट हुये। पिताजी ने शंतनु को प्यार से गले लगाया और सभी गीले - शिकवे भूलाकर उसे माफ कर दिया।


यह होता है माँ-बाप का प्यार! बच्चे कितनी भी गलतियाँ करे , उनपर अपना प्यार और अपनी जान लुटानेवाले , उनकी चिंता करनेवाले ! ऐसे माँ-बाप की इच्छाओं को , सपनों को पूरा करना , क्या बच्चों का धर्म नही है ?


इसी धर्म को आदर्श मानकर शंतनुने अपने माँ - बाप के सपनों को पूरा करने का दृढ़ संकल्प किया और आगे जाकर यहीं शंतनु की जिंदगी का खूबसूरत मोड़ बन गया



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