Prabodh Govil

Drama


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ज़बाने यार मनतुर्की - 14

ज़बाने यार मनतुर्की - 14

10 mins 213 10 mins 213

लोगों का एक सवाल और था।

जब माधुरी पत्रिका ने पाठकों की पसंद से साल के नवरत्न चुनने शुरू किए तो पहले ही साल राजेश खन्ना के साथ नायकों में दूसरे नंबर पर जीतेन्द्र को चुना गया था। जीतेन्द्र हिंदी फ़िल्म जगत में आने वाले अब तक के सबसे सुंदर (स्मार्ट नहीं) नायक रहे। उन्होंने "सेहरा" फ़िल्म से पदार्पण किया था और उसके बाद "बूंद जो बन गई मोती", "फ़र्ज़","धरती कहे पुकार के" जैसी फ़िल्मों में अपनी कामयाबी दर्ज़ करवाई थी।

चढ़ता सूरज था, जिसकी तुलना राजेश खन्ना से की जाती थी। तो लोग यही सोचते थे कि इस दशक की सबसे ख़ूबसूरत कही जाने वाली हीरोइन साधना को जीतेन्द्र के साथ क्यों नहीं उतारा गया। जबकि जीतेन्द्र ने बबीता के,और साधना ने संजय खान के साथ हिट फिल्में की।

अपना थायराइड का इलाज़ करवाने के बाद बॉस्टन से वापसी पर साधना ने जो फ़िल्में साइन की उनमें एक फ़िल्म जीतेन्द्र के साथ भी थी। इसकी शूटिंग में भी पांच दिन तक जीतेन्द्र ने भाग लिया। लेकिन अपनी सुपरहिट फिल्म "फ़र्ज़" की नायिका बबीता के उसे हतोत्साहित करने के बाद न जाने क्यों जीतेन्द्र ने साइनिंग अमाउंट लौटा दिया। और इस फ़िल्म से पल्ला झाड़ लिया।

कुछ लोग कहते हैं कि जिन दिनों जीतेन्द्र सेहरा में छोटी सी भूमिका कर रहे थे उन दिनों वक़्त, आरज़ू और मेरे मेहबूब के शोर- शराबे को जीतेन्द्र ने भी अपनी आंखों से देखा और कानों से सुना था। अतः अब जब एक निर्माता ने उन्हें साधना के साथ हीरो के तौर पर चुना तो पहले तो जीतेन्द्र ख़ुशी से फूले नहीं समाए। पर शूटिंग शुरू होने के चंद दिनों बाद ही युवा जीतेंद्र कुछ हड़बड़ाहट व हीनभावना का शिकार हो गये, और उसी धड़क ने उन्हें अब अपने कदम पीछे हटा लेने पर विवश कर दिया।

कहते हैं कि बबीता ने जीतेन्द्र का मज़ाक उड़ाते हुए कहा था कि उन्हें सब अपने से बड़ी- बड़ी महिलाओं के साथ ही काम मिल रहा है।

सच में उन दिनों जीतेन्द्र मुमताज़ व राजश्री के साथ काम कर लेने के बाद नंदा और आशा पारेख के साथ जोड़ी बनाने वाली फ़िल्में चुन रहे थे।

बबीता ने हो जीतेन्द्र को ये जानकारी दी कि साधना बबीता से सात साल बड़ी हैं और विदेश से बीमारी का इलाज़ करवा कर हाल ही में लौटी हैं। इतना ही नहीं बल्कि ये तक कहा गया कि बीच में चैक- अप के लिए उन्हें कभी भी वापस अमेरिका जाना पड़ेगा और फ़िल्म बीच में अधर झूल में लटक जाएगी।

जीतेन्द्र को इतना समझौता करने की कहां ज़रूरत थी, उन्होंने फ़िल्म छोड़ दी। और इस तरह दशक की सबसे ख़ूबसूरत हीरोइन और दौर के सबसे हैंडसम हीरो को एकसाथ देखने से पब्लिक वंचित रह गई।

लेकिन फ़िल्म की कहानी ही कुछ ऐसी थी कि हीरो युवा ही चाहिए था, चाहे न्यूकमर ही क्यों न हो। लिहाज़ा नए हीरो की तलाश में फ़िल्म रुक गई और प्रोडक्शन को पहला झटका लगा।

जीतेन्द्र के साथ शूट किए जा चुके सीन्स दोबारा फिल्माए जाने थे, जिससे फ़िल्म के बजट पर भी आंच आई।

फाइनेंसर ये भी देख रहे थे कि फ़िल्म को अभी तक हीरो नहीं मिला है। प्रायः फ़िल्म का फाइनेंस हीरो के नाम पर ही होता रहा है। इससे फ़िल्म और भी विलंब का शिकार होती चली गई।

ये वो दौर था जब फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षण लेकर लोग आ रहे थे। प्रचारित किया जा रहा था कि फ़िल्मों में अब सुन्दर और सजावटी चेहरों की नहीं, बल्कि ज्वलंत मौजूदा समस्याओं पर आधारित कथानकों की ज़रूरत है। साधारण से दिखने वाले आमआदमी नुमा लोग फ़िल्मों में हीरो - हिरोइन बन रहे थे। फिल्मकारों का फोकस ख़ूबसूरती पर नहीं, बल्कि एक्टिंग के गुर सीखे व्यक्तियों पर था।

इसी समय एक फ़िल्म आई - चेतना। बाबूराम इशारा की फ़िल्म थी जिसे अपने सब्जेक्ट और कंटेंट के चलते बोल्ड फ़िल्म कहा जा रहा था। फ़िल्म सुपरहिट थी और इसके कलाकार अनिल धवन तथा रेहाना सुल्तान रातों रात ख्याति पा गए थे। अनिल धवन के युवा चिकने चेहरे में भोलापन और ताज़गी भी थी। फ़िल्म में सेक्स का तड़का इतना ज़बरदस्त था कि फ़िल्म को न्यूड वेव ला देने वाली फ़िल्म करार दिया जा रहा था।

ये तो प्रशिक्षित लोगों का बौद्धिक कमाल था कि जल्दी ही इस न्यूड वेव की व्याख्या "न्यू वेव" के रूप में करके इसे नई पीढ़ी के लिए वक़्त की मांग बताया जाने लगा।

जल्दी ही अनिल को एक पारिवारिक फ़िल्म "पिया का घर" जया भादुड़ी के साथ भी मिल गई थी।

अनिल धवन को ही साधना के साथ जीतेन्द्र की छोड़ी हुई इस फ़िल्म "महफ़िल" में साइन कर लिया गया।

साधना की ये एक अत्यंत महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी, जिसके निर्माता कृष्ण कुमार थे।

इधर कई लोग तो स्पष्ट रूप से ये मानने लगे थे कि केवल नक्षत्रों की चाल ही नहीं, बल्कि कुछ फिल्मी हस्तियों की छिपी हुई चाल भी साधना का रास्ता रोक रही थी।

भाग्य केवल उन्हें बीमार करके ही संतुष्ट नहीं था बल्कि उनसे खिन्न लोगों की खुनस भी समानांतर रूप से चल रही थी।

ये कौन लोग थे?

और इससे भी बड़ा सवाल ये था कि ये लोग क्यों ऐसा कर रहे थे?

क्यों खुद उनके अपने भी उनसे ईर्ष्या पाल कर अपनी दुनिया को सुलगाए बैठे थे?

उन्होंने किसका क्या बिगाड़ा था?

बात केवल नज़र लग जाने तक ही सीमित नहीं थी, कोई था जो छिप कर उनकी हर बात, उनकी गतिविधियों पर पैनी निगाह रखे था, और उन्हें नुक़सान पहुंचाने के लिए हर हद तक जा रहा था।

किस्मत से उनके कुछ ऐसे शुभचिंतक भी थे जो बिना किसी स्वार्थ के उनके साथ थे, और उनकी मदद करते हुए उनके अच्छे दिन लाने की कोशिशों में लगे हुए थे।

साधना को मिस्ट्री गर्ल का खिताब ज़रूर मिला था पर शीशे की तरह साफ़ दिल, पारदर्शी साधना के लिए न जाने ये कौन लोग थे जो "मिस्ट्री" बने हुए थे।

जिस तरह दुर्भाग्य से लड़ता हुआ मनुष्य ये नहीं जानता कि किस देवता के प्रकोप और नाराज़गी से उसके सब काम बिगड़ रहे हैं और वह हार कर सभी देवताओं का पूजन - मनन करने लग जाता है, वैसे ही शायद महफ़िल फ़िल्म के निर्माता की भी मनःस्थिति थी। उन्होंने कोई कोर- कसर नहीं छोड़ी थी रूठे देवों को मनाने में।

महफ़िल की पटकथा के रूप में उन्होंने उन्नीस सौ चौवन में आई एक फ़िल्म "अनहोनी" को चुना था, जिसका रीमेक "महफ़िल" थी।

इस फ़िल्म में उस समय राजकपूर और नरगिस ने काम किया था।

निर्माता इस फ़िल्म की भव्यता में कोई कोर - कसर नहीं छोड़ना चाहता था इसलिए इसकी कहानी सुविख्यात उर्दू -हिन्दी लेखक ख़्वाजा अहमद अब्बास से लिखवाई गई।

फ़िल्म के सशक्त संवाद मशहूर लेखिका इस्मत चुग़ताई से लिखवाए गए।

फ़िल्म में कई नृत्य थे, लिहाज़ा नृत्य निर्देशक गोपी किशन को टीम में शामिल किया गया।

मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे गीतों को शंकर जयकिशन से स्वरबद्ध करवाया गया। उस समय तक जयकिशन का निधन हो चुका था किन्तु शंकर अपने जोड़ीदार मित्र को श्रद्धांजलि देने के लिए अकेले हो जाने पर भी उनका नाम अपने नाम के साथ जोड़े हुए थे। फ़िल्म में एक अहम केंद्रीय भूमिका के लिए अशोक कुमार को भी साइन किया गया था।

तात्पर्य ये, कि फ़िल्म की कामयाबी की संभावना का कोई कोण बाक़ी नहीं छोड़ा गया था। अब तो सारा दारोमदार क़िस्मत पर था।

के ए अब्बास कई सार्थक फ़िल्मों की पटकथा और निर्माण का काम देख चुके थे। उन फ़िल्मों की सफ़लता व्यावसायिक रूप से चाहे जैसी भी हो, उनकी अर्थवत्ता जगजाहिर रही थी। यही कारण था कि इस बार कहानी का दारोमदार उन पर छोड़ा गया था।

साधना की ज़बरदस्त सफ़ल फ़िल्मों को भी कुछ लकीर के फ़कीर मानसिकता के लोगों ने ख़ूबसूरती और ग्लैमर का जलवा कह कर उनकी अनदेखी की थी। इसी बात का जवाब था फ़िल्म महफ़िल का कथानक।

इसमें बाकायदा एक ज्वलंत समस्या का निर्वाह था, उसकी मीमांसा थी और थी उसके निराकरण पर लोगों की मानसिकता बनाने की कोशिश। अब्बास का नाम था। जब विचारधारा संकीर्ण गुटबाज़ी में तब्दील हो जाती है तो कुछ लोगों की "न्यूसेंस वैल्यू" भी हो जाती है। पर निर्देशक और निर्माता कोई समझौता नहीं करना चाहते थे। साधना भी एक मूक दर्शक की तरह सारे खेल का आनंद ले रही थीं। शायद अंदर ही अंदर उन्हें ये अहसास भी हो गया था कि ये फ़िल्म जगत में उनकी अंतिम फ़िल्म होगी और इसे संभवतः फिल्मी दुनिया से उनकी विदाई की तरह ही देखा जाएगा।

काश ऐसा हो पाता।

मीना कुमारी अपनी आखिरी फ़िल्म "पाकीज़ा" से इसी तरह जुड़ी थीं और वो अंततः उनका विदा गीत ही साबित हुई थी।

महफ़िल में एक बार फिर साधना के लिए दोहरी भूमिका लिखी गई।

फ़िल्म जगत में शायद ही कोई ऐसी फ़िल्म आई हो जिसमें डबल रोल करते कलाकार के लिए दोनों अच्छे या दोनों बुरे रोल लिखे गए हों। हमेशा ये एक अच्छा चरित्र और दूसरा बुरा चरित्र ही दिखाया गया। और अंत में दोनों का रक्त संबंध निकल आना भी ये संदेश देता रहा कि वस्तुतः दोहरी भूमिका और कुछ नहीं, बल्कि एक ही इंसान की स्प्लिट पर्सनैलिटी का खेल है जो "जैसा मिला हवा पानी, वैसी ही बिरवे की कहानी" की सत्यता को दर्शाता है।

जब फ़िल्म की कलाकारी से अब्बास और इस्मत चुग़ताई जैसे लोग जुड़े तो मानो इस सच्चाई पर प्रामाणिकता की मोहर लग गई।

लेकिन फ़िल्म के सितारे (ज़मीनी नहीं, आसमानी सितारे यानी नक्षत्र) शायद शुरू से ही गर्दिश में रहे।

कभी ज्वैलथीफ की सफ़लता के बाद अशोक कुमार की तारीखों का चक्कर, कभी जयकिशन की मृत्यु के बाद शंकर की डांवाडोल स्थिति, कभी अनिल धवन और साधना की संभावित केमिस्ट्री पर फाइनेंसरों की संदिग्धता, तो कभी राजकपूर के शुभचिंतकों का उनकी फ़िल्म के रीमेक पर संदेह, कुछ न कुछ फ़िल्म को हिचकोले खिलाता रहा।

फ़िल्म के पूरा होने तक राम और श्याम, सीता और गीता जैसी फ़िल्मों का रिलीज़ हो जाना तो अपनी जगह था ही, पटकथा "लीकेज" का मामला भी सामने आया।

निर्माता को विश्वस्त सूत्रों के हवाले से पता चला कि उनकी "रत्ना" का रोल समानांतर रूप से शर्मिला टैगोर पर भी फिल्माया जा रहा है, जो उन दिनों संजीव कुमार के साथ कमलेश्वर की कहानी "आगामी अतीत" पर बन रही गुलज़ार की मौसम में काम कर रही थीं।

शर्मिला टैगोर और साधना की जुगल बंदी दर्शक फ़िल्म वक़्त के ज़माने में देख चुके थे। इसलिए ये साधना के शुभचिंतकों के लिए कोई बड़ी चिंता की बात नहीं थी कि साधना और शर्मिला टैगोर एक सी भूमिका अभिनीत कर रही हैं, किन्तु ये चिंता की बात ज़रूर थी कि लगभग इन्हीं दिनों आराधना, अमरप्रेम जैसी फ़िल्मों के अा जाने के बाद नक्शा नज़ारा कुछ बदल गया था। इन्हीं दिनों की बात है, साधना और शर्मिला टैगोर का एक फिल्मी समारोह में साथ- साथ शिरक़त करना हुआ।

साधना की इसी दौर में दिल दौलत दुनिया फ़िल्म राजेश खन्ना के साथ रिलीज़ हुई थी, जबकि शर्मिला की अमर प्रेम। लेकिन शायद दर्शक एक को उगता सूरज और दूसरी को डूबता सूरज की तरह देखने लगे थे।

समारोह के ख़त्म होते ही साधना ने देखा कि युवाओं की सारी भीड़ शर्मिला टैगोर के ऑटोग्राफ लेने के लिए टूट पड़ी, जबकि साधना से मुखातिब होने वाले गिने- चुने ही थे।

साधना ने ये नज़ारा अपनी आंखों से खुद देखा। उन्हें वक़्त फ़िल्म का वो आलम उस वक़्त ज़रूर याद आया होगा जब उनके दिन थे, और उनके साथ नई तारिका की तरह केवल एक गीत में लोगों ने शर्मिला को देखा था।

यद्यपि ये कोई नई बात नहीं थी। खुद साधना ने भी अपनी फ़िल्म अबाना के समय शीला रमानी को इसी हाल में देखा था।

साधना की सहायक ने काले चश्मे के पीछे से उनके आंसुओं को भांप कर उन्हें दिलासा भी दिया था कि उन्होंने आज आंखों में दवा नहीं डाली है, इसलिए आंखों से पानी आ रहा है।

साधना थायरॉइड के इलाज के बाद अमेरिका से वापस लौटी थीं। इस बीच उनका रोग तो खत्म हो गया था पर उन्हें आंखों की एक बीमारी " यू वाइटिस" हो गई थी।

इस रोग के चलते उनकी आंखें सामान्य से ज़्यादा बड़े आकार में फ़ैल गई थीं, पर उनमें दूसरी जटिलता शामिल हो गई थी।

दो रोगों के एक साथ चलने के कारण स्थिति इतनी जटिल हो गई थी कि एक बार कुछ समय के लिए साधना की आंखों के आगे पूरी तरह अंधेरा ही छा गया। उनकी एक आंख की रोशनी चली गई।

और जिन आंखों को कभी ये दुआएं मिली थीं कि छलके तेरी आंखों से शराब और ज़्यादा...वो नर्गिसी आंखें उजाले के लिए ही तरस गई।

उनके कई चाहने वाले कहते हैं कि साधना की फ़िल्म "महफ़िल" यदि सही समय पर साठ के दशक में ही रिलीज़ हुई होती तो ये उनके जीवन की सर्वश्रेष्ठ भूमिका होती और किसी भी पुरस्कार समिति के लिए इसमें उनके अभिनय की अनदेखी करना

असम्भव ही होता। हो सकता था कि रत्ना की इस भूमिका को ताउम्र उसी तरह याद किया जाता जैसे मदर इंडिया की नरगिस, मुगले आज़म की मधुबाला या पाकीज़ा की मीना कुमारी को याद किया जाता है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि साधना के अंतिम दिनों में उनकी केवल एक ही आंख में रोशनी शेष रही, दूसरी आंख पूरी तरह ख़राब हो चुकी थी।

इस दिल में अभी और भी ज़ख्मों की जगह है !



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