“जब पत्नी छोड़कर चली गई” “झूठ, नौकरी और टूटी हुई शादी ”
“जब पत्नी छोड़कर चली गई” “झूठ, नौकरी और टूटी हुई शादी ”
मैं राजीव हूँ, उम्र 28 वर्ष, गेहुँआ रंग, कद-काठी ठीक-ठाक, हाइट 5 फुट 6 इंच। मैंने ग्रेजुएशन कर रखा था, हालांकि पढ़ाई छूटे पूरे 3 साल से ज़्यादा हो गए थे।
सच बताऊँ तो माँ-पिताजी को मेरी शादी की चिंता हो रही थी। वैसे तो मेरी महिला मित्रों की संख्या 7 से 8 थी, इस कारण मुझे खुद पर बड़ा अभिमान था।
और मेरी परेशानी यह थी कि मेरी कोई भी जॉब फिक्स फील्ड में नहीं रही। जिस भी फील्ड में जॉब मिला, उसी का हो लेता—क्या करता, आपने सुना है न “मरता क्या नहीं करता।”
ऊपर से बेरोज़गारी की स्थिति आप देख ही रहे हैं। मान लो आज मैं कही भी 25k वेतन की जॉब कर रहा , तो यहाँ प्रतियोगिता इतनी है की मुझसे पहले ही लोग 12k के वेतन के लिए लाइन में लगे पड़े थे। यानी आप कहें तो मैं जॉब्लेस था, नौकरी ढूँढ रहा था।
यह सच है कि माता-पिता से ज़्यादा उत्साहित तो मैं ही था शादी के लिए, लेकिन भला क्या ही कहता कि शादी जल्दी कराओ।
अब गर्लफ्रेंड और वाइफ में अंतर तो है ही। जब शादी की बात चलती, तो मन ही मन खुश हो लेता।
मुझे अभिमान तो था कि मेरी गर्लफ्रेंड 6–8 थीं, फिर भी डर लगता—अपनी हाइट, रंग-रूप और गंजेपन को लेकर—कहीं कोई लड़की मुझे रिजेक्ट न कर दे।
इसलिए शादी जैसे मौके को मैं भुना लेना चाहता था। जल्दी से कोई लड़की पसंद कर ले, बस। क्योंकि अब उम्र भी बढ़ रही थी, दबाव था, और एक अच्छी जॉब कहीं मिल जाए—यह भी चिंता थी।
इधर मैं दिनभर दूसरे कमरे में पड़े-पड़े मोटिवेशनल मूवी देखता, कि शायद वहीं से अपने अंदर बदलाव आ जाए। लेकिन उस वक्त मुझे कौन समझाता कि मूवी देखने से न जॉब मिलती है, न बिजनेस होता है—एक्शन लेना पड़ता है।
तभी पापा ने उस रोज आवाज़ लगाई—“राजीव, देख कैसी लड़की है।”
शायद पिताजी के किसी दोस्त की बेटी थी, और उन्हीं के व्हाट्सऐप पर फोटो आई थी।
अब तो मेरे पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। मैंने झूठ ही कह दिया—“मुझे नहीं देखना।”
फिर माँ ने भी ज़ोर दिया। और फिर क्या—पापा जब मोबाइल छोड़कर नहाने गए, तब मैंने चोरी से देखा।
मुझे लगा जैसे चोर को बटेर मिल गई हो। मैं बहुत खुश था। फिर मैंने कहा—“माँ, बहुत अच्छी नहीं… बस ठीक ही है।”
इस तरह मंदिर में मिलना-जुलना हुआ, और चेहरा देख लिया। लड़की पसंद हो गई।
फिर फोन पर बातचीत में नज़दीकियाँ बढ़ीं, और यूँ ही कहें तो प्यार हो गया। शादी भी हो गई।
जॉब तो थी नहीं, बस झूठ बोलता रहा—उसके परिवार से भी और उससे भी।
अब शादी को एक हफ्ता हो गया था। मैंने ऑनलाइन जॉब का इश्तिहार देखा और नोट कर लिया।
अगले दिन इंटरव्यू देने जाने का सोचा।
पिछली रात श्वेता, मेरी पत्नी, मेरा हाथ पकड़कर प्यार से बोली—“कल से जॉब पर जाना है न?”
उसकी आँखों में आँख डालने की हिम्मत तो नहीं थी, लेकिन जब झूठ की बुनियाद पर शादी की थी, तो आज भी झूठ बोल दिया—“हाँ, जाना है।”
अगली सुबह उसने मेरा शर्ट आयरन किया—“ये पहनना… और ये टिफिन खा लेना।”
मैंने कहा—“अभी तो इंटरव्यू देने जा रहा हूँ।”
बैग में इंटरव्यू के डॉक्यूमेंट्स छुपा लिए, ताकि उसे पता न चले।
श्वेता ने प्यार से गाल पर किस किया और बोली—“जल्दी आना।”
मैं भी झूठा आश्वासन देकर निकल गया।
दहेज में मिली बाइक पर चाबी लगाई और चल पड़ा।
नई ड्रेस, नई बाइक—मैं काफी कॉन्फिडेंट था।
रास्ते में तनाव बढ़ने लगा—“अगर जॉब नहीं लगी तो क्या करूँगा? क्या बोलूँगा श्वेता से?”
फिर खुद को समझाया—“इंटरव्यू में आत्मविश्वास दिखाना है, बस।”
जैसे ही पहुँचा, तो मेरा सिर घूम गया। इतने लोग, इतनी गाड़ियाँ… हजारों लोग कंप्यूटर पर काम कर रहे थे।
मैं बहुत घबरा गया। लगा—“यहाँ मेरी दाल नहीं गलने वाली।”
फिर सोचा—“श्वेता क्या सोचेगी?”
हिम्मत जुटाई। तभी प्यून ने आवाज़ दी—“मैम बुला रही हैं।”
मैं गया। एक सुंदर लड़की बैठी थी।
उन्होंने पूछा—“अपने बारे में बताइए।”
मैंने रटी हुई अंग्रेज़ी बोल दी।
फिर उन्होंने सवाल पूछे—मैथ और इंग्लिश के—मैं गोल-मोल जवाब देता रहा।
मुझे खुद पता था—मुझे कुछ नहीं आता।
फिर उन्होंने एक्सेल पर काम दिया।
अब तो मेरा दिमाग घूम गया—“कहाँ फँस गया!”
15 मिनट तक कीबोर्ड पर हाथ फेरता रहा। फिर बोला—“मैम, फॉर्मूला भूल गया।”
उन्होंने कहा—“कोई बात नहीं, आपको मशीन चलानी होगी। 14k वेतन मिलेगा।”
मैं 25k सोचकर आया था, लेकिन मजबूरी में हाँ कर दी।
फैक्ट्री में ले जाया गया—बड़ी-बड़ी मशीनें, तेज़ गर्मी, पिघलता लोहा…
मैं डर गया।
टीम के लोग मुझे अजीब नज़रों से देख रहे थे।
मशीन उठाई—उठी नहीं। फिर जैसे ही उठाई—हाथ जल गया।
तब पछतावा हुआ—“अगर पढ़ाई की होती…”
डिग्री तो थी, पर ज्ञान नहीं।
शिफ्ट खत्म होने में 3 घंटे बाकी थे।
कुछ समझ नहीं आ रहा था।
सोचा—भाग जाऊँ या सच बोल दूँ?
फिर समझ आया—“नाटक छोड़ना होगा।”
मैंने एक लड़के से दोस्ती करनी चाही, उसकी मदद की—पर उसने मुझे चोर समझ लिया।
मैं टूट गया।
फिर सोचा—“जब ये लोग कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं?”
मैंने ठान लिया—अब सीखूँगा।
राजीव घर लौटा।
श्वेता समझ गई—“तुमने झूठ बोलकर शादी की है…”
और वह मायके चली गई।
उसके शब्द गूँजते रहे—
“झूठ की बुनियाद पर बनी शादी कभी खुश नहीं रहती…”
अब राजीव बदल गया।
दिन में फैक्ट्री, रात में यूट्यूब से पढ़ाई।
महिला मित्रों को छोड़ दिया।
धीरे-धीरे मेहनत से उसी कंपनी का मैनेजर बन गया।
एक दिन घर लौटा—तो श्वेता वापस आई।
राजीव ने माफ़ी माँगी।
दोनों गले लगकर रो पड़े।
*सीख (Moral)*
किसी भी चीज़ की शुरुआत झूठ के बल पर नहीं होती।
डिग्री के साथ ज्ञान भी ज़रूरी है।
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स्वरचित एवं अपठित एवं मौलिक
राजेश बनारसी बाबू
उत्तरप्रदेश वाराणसी
