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राजेश "बनारसी बाबू"

Drama Classics Inspirational

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राजेश "बनारसी बाबू"

Drama Classics Inspirational

“बेटी को ‘गंदी’ कहने वाला पिता… फिर हुआ कुछ ऐसा कि रो पड़ा”

“बेटी को ‘गंदी’ कहने वाला पिता… फिर हुआ कुछ ऐसा कि रो पड़ा”

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कहने को तो आज हम सब डिजिटल ऐरा में हैं। जनरेशन चेंज तो हुआ, शायद सभी नहीं… शायद मैं ही पीछे रह गया।

चलिए, आज अपनी छोटी-सी वाक्या के ज़रिए बताता हूँ।

मेरा जन्म जिस परिवार में हुआ, वहाँ माँ के अलावा कोई स्त्री नहीं थी। हम सब दो भाई ही थे। बड़े भाई नोएडा की प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी करके विवाह कर वहीं बस गए थे।

उसके बाद मेरा विवाह दिव्या से हुआ। शादी के एक साल बाद ही आरूही को जन्म देने के दौरान दिव्या की मृत्यु हो गई थी। खुश तो मैं वैसे भी नहीं था, क्योंकि मुझे पुत्र की इच्छा थी।

इसलिए आरूही का पालन-पोषण 10 साल तक उसकी नानी ने किया था। अब नानी की मृत्यु एक साल पहले हो गई, तो आरूही को मुझे न चाहते हुए भी अपने साथ रखना पड़ा।

आपको पहले ही बता चुका हूँ, मुझे पुत्र ही पसंद था, तो मेरा आरूही से बिल्कुल नहीं बनता था।

मेरी ज़िंदगी में आरूही के आने से कुछ खास परिवर्तन नहीं हुआ था। वह स्कूल जाती थी, उसके पहले मेरे ड्यूटी जाने से पहले मेरा टिफिन और खाना बनाकर देती थी, फिर स्कूल जाती थी।

लौटकर घर व्यवस्थित करके पढ़ती, टेलीविज़न देखती। क्या देखती है, ये सब तो मैं नहीं देखता था। हाँ, मेरे आते ही वह चैनल पलटकर न्यूज़ लगा देती और घर के काम में फिर से व्यस्त हो जाती।

आप कह सकते हैं कि हम पिता-बेटी में एक बड़ा-सा गैप था। उसे पता था कि मैं उसे बिल्कुल पसंद नहीं करता, इसलिए वह काम से काम रखती।

इधर कुछ दिनों से वह किशोरावस्था में प्रवेश कर रही थी। पीरियड में थी वह, शायद…

अब आप समझ सकते हैं, इस वक्त एक बेटी को भावनात्मक रूप से एक अभिभावक की कितनी ज़रूरत होती है।

वह पीरियड में थी और उसके दर्द और थकान को मैं उसका बहाना समझ बैठा।

इसी अनजाने में एक दिन मैंने उसे दो तमाचे जड़ दिए।

वह रोती रही और किसी तरह दो रोटी और सब्ज़ी बनाकर मुझे खाने को दिया।

मैं यह भी नहीं समझा कि इन दिनों रसोई से उसे दूर रखा जाता है।

अब एक बेटी उस वक्त कितना असहज महसूस करती है—एक किनारे शर्म से पड़ी, दर्द में उसकी सकुचाई नज़रें…

खुलकर आरूही बात करे तो कैसे करे? वह पिता जो उसे पसंद ही नहीं करता, हमेशा ग्लानि की दृष्टि से उसे देखता।

उसे शर्म लगती थी कि वह कैसे कहती—

कि मैं पीरियड में हूँ… पापा, बहुत दर्द हो रहा है… मुझे सैनेट्री पैड चाहिए।

वह ऐसे परिवार में रही जहाँ बाहर से खरीदने में भी यह सब मना था।

माँ काश ज़िंदा होती, तो समझती… कम से कम खरीदकर ला देती।

ये सब बातें मुझे अब समझ आती हैं, काश पहले आ गई होतीं।

मैं सोचता था कि वह आलसी है और काम करने में बहाना बना रही होगी, लेकिन जब पता चला कि वह पीरियड में है, तो भी मुझमें खास परिवर्तन नहीं था।

मैं उससे और ज़्यादा नफरत करने लगा।

जब वह पास आती, तो मैं उसे गंदगी/अशुद्ध मानता, पास आते ही नाक-मुँह सिकोड़ता और कहता—

“चल हट, पास से जा मेरे सामने से… नीच, घिनौनी लड़की!”


“पीरियड के बहाने न कोई काम, न काज… बस बिस्तर पर पड़ी रहती है… काश मर जाती, बोझ कहीं की!”


यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि यह बातें मैं हर वक्त उसे बोलता रहता था।

मेरी कुछ बातें तो आम थीं उसके साथ—

जैसे बेटी से दूरी बनाना, उसे छूना नहीं, गंदगी कहना, और न जाने क्या-क्या अपशब्द बोल देना।

और यही नहीं—

“तू पीरियड में है, किसी को मत बताना… यह गलत है, समझी?”

सैनेट्री पैड या सफाई के लिए पैसा न देना…

पीरियड के दौरान उसे बिस्तर न देना, ज़मीन पर रहने को बोलना…

उसे अपने कमरे में आने न देना…

पीरियड के विषय में लोगों के सामने उसका मज़ाक बनाना…

ये सब मेरे लिए हमेशा का था।अब बात आती है—कब मेरी आँखें खुलीं, या यूँ कहें कब मेरी बेटी ने मेरी आँखें खोलीं।

पिछले सितंबर का महीना था।

हमेशा की तरह मैं ड्यूटी से देर से घर लौटता था, लेकिन उस दिन न जाने क्यों ऑफिस में बेचैनी हो रही थी, इसलिए मैं जल्दी घर लौट आया।

देखा तो दरवाज़ा खुला हुआ था। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था कि आरूही कितनी लापरवाह हो गई है।

तभी मैंने देखा कि उसके कमरे में उसकी हमउम्र एक लड़की बैठी हुई है।

मैंने बिना कुछ बोले उनकी बातें सुनने की कोशिश की दीवार के पास जाकर मैंने सुना—

आरूही रोते हुए अपनी दोस्त से कह रही थी—“यार रिया, काश माँ ज़िंदा होती… तो पापा जो जुल्म करते हैं, उनसे बचाती…”

रिया ने पूछा—“क्यों? क्या करते हैं तेरे पापा?”

आरूही रोते हुए बोली—“यार रिया… पापा दिल के बुरे नहीं हैं… बस उन्हें हमेशा से बेटा चाहिए था… बेटी नहीं…मैं ठहरी बेटी… अब मैं क्या करूँ? 

“जानती है, पापा कहते हैं मैं गंदगी हूँ… बोझ हूँ…”(यह कहते हुए वह फूट-फूटकर रोने लगी)

“काश मेरे पापा भी मुझे समझते… मुझे गले लगाते… दुलारते… माँ-पापा का प्यार मैंने कभी महसूस ही नहीं किया…”रिया ने उसे गले लगा लिया।

आरूही फिर बोली—“पापा मुझे सैनेट्री पैड या सफाई से जुड़ी कोई चीज़ भी नहीं लाकर देते… उन्हें लगता है ये सब फालतू चीज़ है…”रिया बोली—“ये सब जागरूकता की कमी है…”

आरूही बोली—

मुझे शर्म आती है इन सब पर बात करने में… लेकिन पापा को समझना चाहिए कि पीरियड्स में दर्द, असहजता, घबराहट होती है…”

“लेकिन इसके बजाय वो मेरा मज़ाक बनाते हैं… मुझसे काम कराते हैं…”

रिया ने कहा—बस कर, कितना रोएगी… तेरी तबियत खराब हो जाएगी… मैं तेरे पापा से बात करूँगी…”

आरूही घबराकर बोली—“नहीं! तू कुछ नहीं कहेगी… पापा मुझे कभी नहीं समझेंगे…”

“चल मान लेती हूँ कि समाज कहता है मासिक धर्म के दौरान लड़की ‘अशुद्ध’ है… जबकि ये पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया है…”

“पाबंदियाँ भी देख—मंदिर नहीं जाना, रसोई में नहीं जाना, खेलना नहीं…”“लेकिन समझ नहीं आता—जब समाज हमें देवी मानता है, तो फिर ये तिरस्कार क्यों?”काश… पापा मुझे समझते…”

यह सब सुनकर मैं अंदर से हिल गया…करीब एक घंटे तक मैं वहीं खड़ा सब सुनता रहा…फिर चुपचाप घर से निकलकर अपने बचपन के दोस्त *रुस्तम चाय वाले* के पास चला गया।

अभी चाय की पहली चुस्की ही ली थी कि मोबाइल की घंटी बज उठी।

फोन उठाया—दूसरी तरफ आरूही के स्कूल की मैम थीं।“क्या आप आरूही के पापा बोल रहे हैं?”मैंने कहा—“जी।”

मैम बोलीं—“कल आप थोड़ा समय निकालकर स्कूल आइएगा, कुछ ज़रूरी बात है।”

मैं घबरा गया—“कहीं आरूही ने कुछ गलती तो नहीं कर दी?”

अगले दिन मैं स्कूल पहुँचा। कुर्सी पर बैठा था… माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं।

तभी मंच से घोषणा हुई—“नेशनल लेवल मैथ प्रतियोगिता में कुमारी आरूही ने टॉप किया है!”“हमें गर्व है कि हमारे स्कूल में इतनी होनहार छात्रा है।”

“अगर उनके पिता यहाँ हैं, तो कृपया मंच पर आकर अपनी बेटी को आशीर्वाद दें।”

मेरी आँखों में आँसू आ गए…मैं मंच पर गया…

आरूही डर रही थी…मैंने उसे गले लगा लिया…हम दोनों रो पड़े…पूरा हॉल भावुक हो गया…

मैम ने कहा—“आप अपनी बेटी के बारे में कुछ कहना चाहेंगे?”

मैंने माइक लिया और कहा—“मेरी बेटी दुनिया की सबसे अच्छी बेटी है… और मैं सबसे अभागा पिता हूँ… जो इसे समझ नहीं पाया…”

“बेटी, मुझे माफ़ कर दो…”फिर मैंने कल सुनी सारी बातें सबके सामने बता दीं…पूरा हॉल सन्नाटे में था…

मैंने अपने झोले से एक पैकेट निकाला…और कहा—“बेटी, देख… तेरे लिए क्या लाया हूँ…”मैंने उसे सैनेट्री पैड दिया…

एक अध्यापक ने कहा—“आप ये क्या दे रहे हैं, वो भी सबके सामने?”

मैंने जवाब दिया—“यही तो हमें समझना है…

पीरियड्स कोई अभिशाप नहीं है… यह प्रकृति का दिया हुआ वरदान है…”

“हम सिगरेट और तंबाकू खुलेआम ले लेते हैं… लेकिन इसे खरीदने में शर्म आती है…”

“कल तक मैं भी ऐसा ही सोचता था…”“लेकिन आज मुझे अपनी बेटी पर गर्व है…”“और हर माता-पिता को चाहिए कि वो अपनी बेटी को पीरियड्स में समझें, उसका साथ दें…” “ न कि उसे कोसें…”

“मैं पुत्र चाहता था… लेकिन आज मेरी बेटी ने मेरी आँखें खोल दीं…” और फिर मैंने कहा—

*“हमारी छोरी, छोरे से कम है के?”*    पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा… 

मैंने अपनी बेटी को गोद में उठा लिया…

📚 *सीख (Moral)*

* बेटियाँ बोझ नहीं होतीं

* पीरियड्स कोई गंदगी नहीं है

* इस समय बेटियों को सबसे ज़्यादा प्यार और सहारे की जरूरत होती है

* 12 साल की बेटी ने आज मेरा आंख खोल दिया


  स्वरचित एवं अपठित                             

                                                                                                                                                                                                                                                                           राजेश बनारसी बाबू

उत्तरप्रदेश वाराणसी




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