“सुपरमैन नहीं… फिर भी हीरो” “सुपरपावर”
“सुपरमैन नहीं… फिर भी हीरो” “सुपरपावर”
सुधार की हुई कहानी:-
राज 10 साल का बच्चा है। उसके पिता शराबी हैं और उसकी माँ दूसरों के घरों में काम करके अपनी जीविका चलाती है। उसके पिता को बिल्कुल पसंद नहीं कि उसका बेटा दूसरे लड़कों के साथ खेले।
इसलिए 10 साल के राज ने खुद को ही अपना दोस्त बना लिया है। वह पास के दरबान के पास दीवार में लगे शीशे में खुद से बात करता, सवाल करता और फिर चुप हो जाता। आज भी वह खुद से ही बात करते हुए कह रहा था—
“ये दिमाग भी कितना अजीब चीज है… यह मुझसे कहता है कि मैं तो सुपरमैन हूँ…”
(अपनी आँखों के आँसू पोंछते हुए)
“फिर रात में जब पापा शराब पीकर माँ को रॉड से क्यों पीटते हैं?
क्यों मैं कुछ कर नहीं पाता…?”
तभी दरवाजे पर किसी की दस्तक होती है। वह सहम जाता है। उसे डर लगता है—कहीं उसके पापा तो नहीं… और उसका शक सही निकलता है।
पापा: “राज! दरवाजा खोल… कहाँ मर गया है तू? खोल दरवाजा!”
राज:“डरते हुए… खोलता हूँ पापा, बस…”
दरवाजा खोलते ही उसके पिता उसे दो जोरदार थप्पड़ मारते हैं।
पापा: “पता नहीं किसका बेटा है… कमीना! मेरे जैसा तो है ही नहीं…”
राज की आँखों में आँसू आ जाते हैं।
पापा (संजीव) शराब के नशे में लड़खड़ाते हुए घर में घुसते हैं। तभी उसकी माँ सीखा दौड़कर बेटे को अपने आँचल में छुपा लेती है।
सीखा:“क्या बिगाड़ा है मेरे बेटे ने? क्यों पीटते हो इसे?”
संजीव गुस्से में पास पड़ी लोहे की रॉड उठाकर सीखा के सिर पर वार कर देता है।
*संजीव:* “कमीनी! शराब के लिए पैसे दे… खरीदनी है मुझे!”
वह लगातार रॉड से उसे मारता रहता है।
*सीखा: “हाय… मर गई… बचाओ… बचाओ…”
काँपती और रुंधी आवाज़ में दया की भीख मांगती है—
“कल बेटे की फीस देनी है… आज पैसे नहीं दूँगी… आप शराब छोड़ दीजिए, प्लीज़…”
सीखा के सिर से खून बहने लगता है।
संजीव गुस्से में चिल्लाता है—
“कितनों के साथ सोकर पैसे लाती होगी तू…!”
और फिर से उसके सिर पर वार करता है। सीखा दर्द से बेहोश हो जाती है।
आज जैसे राज के सिर पर मौत सवार थी। कोई पड़ोसी भी संजीव के डर से मदद के लिए नहीं आता।
राज काँप रहा था… तभी उसे माँ की एक बात याद आती है—
“मेरा बेटा एक दिन बड़ा पुलिस अफसर बनेगा…”
बस, उसी पल उसका “सुपरपावर माइंड” काम करने लगता है। वह हिम्मत जुटाता है, दौड़कर माँ का कीपैड मोबाइल उठाता है और बाथरूम में जाकर 112 नंबर डायल कर देता है। पुलिस को एड्रेस बताता है।
जैसे ही वह मोबाइल छुपाता है, उसके पिता की नजर उस पर पड़ जाती है। अब संजीव अपनी पत्नी को छोड़कर बेटे पर हमला करने दौड़ता है।
इस बार राज डरता नहीं।
वह आँखों में आँख डालकर चिल्लाता है—
*राज:* “बहुत हुआ! अब नहीं… आप शराबी हैं!
और माँ के बारे में क्या कहा आपने?
आप क्या समझेंगे—मेरी माँ लोगों के घर बर्तन माँजकर मेरी पढ़ाई और आपकी शराब का खर्च चलाती है!
आज के बाद आपका अत्याचार खत्म होगा!”
संजीव हैरान रह जाता है—
“आज इसके अंदर इतनी हिम्मत कहाँ से आ गई…?”
तभी दरवाजे पर पुलिस आ जाती है और संजीव को पकड़कर ले जाती है।
इस तरह राज की “सुपरपावर”—उसका दिमाग और हिम्मत—उसकी माँ और उसकी जान बचा लेती है।
कुछ दिनों बाद माँ और बेटा अस्पताल से सुरक्षित घर लौटते हैं।
राज को अब अपनी सुपरपावर पर विश्वास हो जाता है।
जेल में बंद संजीव को भी अपने किए का एहसास होता है। वह घर लौटकर अपनी पत्नी और बेटे से माफी मांगता है और एक प्राइवेट स्कूल में काम करने लगता है।
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🎯 शिक्षा
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि—
भले हम छोटे हों, लेकिन धैर्य और साहस से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है।
**सुपरपावर सिर्फ सुपरमैन में नहीं होती…
हर इंसान में छुपी होती है—बस सही समय पर खुद पर भरोसा करना पड़ता है।**
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स्वरचित: राजेश बनारसी बाबू
