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chandraprabha kumar

Tragedy Others

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chandraprabha kumar

Tragedy Others

जब करुणा गाथा गाती है

जब करुणा गाथा गाती है

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        एक अभिशापित मानव था वह, जो अपनी आकांक्षाओं को कुचलते देखकर ,अपनी भावनाओं को मसलते देखकर ,अपने आत्माभिमान को ठुकराते देखकर और स्वयं को उपेक्षित पाकर भी सहता गया …….सहता गया चुपचाप। और अब जीवन की सांध्य बेला में अपने जर्जर तन को संभालता हुआ अपनी जर्जर अपूर्ण आशाओं का प्रतीक वह मानवोचित संज्ञा को भी खो बैठा है। 

          संसार उसे जानता है भिखारी के नाम से। उसके साथ किसी को सहानुभूति नहीं ,किसी को उसके दुःख में दुःख नहीं ।वह अकेला विश्रांत पथिक सा निरंतर संघर्ष कर रहा है अपने अभिशापित जीवन से ।खाने के लिए भीख के सिवा और कोई मार्ग नहीं।…. पर नहीं ,भीख न मिलने पर भी वह भूखा नहीं रहता क्योंकि हमारे समाज के ठेकेदार अपनी कृपा से खाने के लिए बहुत कुछ देते हैं ——गालियां, झिड़कियों की बौछार और उसके शोषित कुंठित जीवन के प्रति शुभ उद्गार। और वह…..वह बेचारा चुप हो जाता है क्योंकि वह अपनी मर्यादा को जानता है । और अब………. विश्रान्ति की गोद में वह स्वप्न ले रहा है अपने अतीत के। अपने शैशव के चलचित्रों के जो उसके हृदय पटल पर अंकित थे ,जिन्होंने कि उसके जीवन को बदल दिया था ।


   वह एक सुखी परिवार का चिराग था। माता पिता के लाड़ प्यार से पोषित उसका मस्त शैशव बीत गया ।और साथ ही साथ माता पिता की छत्रछाया भी उसके ऊपर से उठ गई। अपनी किशोर वय में वह अकेला बालक अपनी निस्सहाय अवस्था से परित्राण पाने के लिए उद्विग्न हो उठा। माता पिता का दुलारा बालक स्नेह की एक बूँद पाने के लिए तड़प कर रह गया। पर इस कटु विषमय संसार से स्नेह अमृत की आकांक्षा करना कितनी मूर्खता की बात है इसको वह क्या जाने। संबंधियों ने सब संपत्ति हड़प ली और उसको छोड़ दिया दर दर की ठोकरें खाने।….. भोला बालक क्या जाने जग की कटुता को ,इसकी विषमता को ,इसकी कुचक्रों को।

   हारकर उसने मिल में नौकरी करनी शुरू कर दी । एक पेड़ के नीचे ही उसको रहने के लिए आश्रय मिला ।प्रकृति की निर्मुक्त गोद ने ही उसको स्थान दिया। छल प्रपंच से युक्त मानव को किसी से क्या सहानुभूति हो सकती है ।वह कहाँ इतना अवकाश रखता है कि दूसरों को आश्रय दे सके ,अपना सके। पर ये पेड़ पौधे ही तो है जो कि प्रशस्त हृदय से जड़ जंगम स्थावर सबको बिना भेदभाव आश्रय देते हैं।

  पर मनुज कहलानेवालों को यह भी क्या कभी रुच सकता था कि उनका ठुकराया मानव सुख की नींद सो सके।


 शहर में हुई चोरी के अपराध में उसे गिरफ़्तार कर लिया गया। न्यायाधीशों ने न्याय किया और तदनुसार दस वर्ष का कठोर कारावास ।निरपराध किशोर को ,उस प्रकृति के चंचल शिशु को आख़िर मानव ने अपना ही लिया जेल के सींखचों में बंद करके। 

    दिन पर दिन बीतते गये और उसी के साथ समाप्त होती गई किशोर की कारावास की अवधि। जेल से छूट कर जब वह आया ,यहॉं कोई न था जो उसको सहानुभूति देता । क्षीणकाय दुर्बल किशोर हार चुका था ज़िंदगी से । उसके अनजाने ही उसके जीवन को समाज ने विष बना दिया था । और अब भिखारी के नाम से सम्मान किया जाता था -सृष्टिकर्ता की सर्वोत्कृष्ट रचना को, मानव को और अपनी ही जाति के मानव को।

  

    वह बूढ़ा भिखारी जिसका शरीर अब छाया मात्र ही रह गया था ,जिसकी आकांक्षाएं निर्जीव हो गयीं थीं, आज इस योग्य भी तो न था कि अपनी अतीत की स्मृतियों को मधुर कहकर वर्तमान पर संतोष कर सकता। 

 

     वह बेचारा चिर निद्रा देवी की शरण जा चुका था फुटपाथ पर पड़ा पड़ा। उसकी विदाई पर कोई रोने वाला भी नहीं था। 



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