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Anita Sharma

Inspirational


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Anita Sharma

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जादू का पिटारा

जादू का पिटारा

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मीरा सुबह के कामों में व्यस्त थी। तभी उसका मोबाइल बज उठा। हाथ धोकर मीरा ने जल्दी से फोन उठाया


............. "हैलो"


"हाँ मीरा बिटिया कैसी हो"


दूसरी तरफ मीरा की गाँव वाली सबसे छोटी चाची थी। जिन्होंने मीरा को अपने बड़े बेटे के फलदान के लिये गाँव बुलाया था।


चाची से अपने पति से पूंछकर बताने का बोल मीरा ने फोन रख दिया।


मीरा के पापा तीन भाई थे। सबसे बड़े मीरा के पापा,जो गाँव के स्कूल में ही अध्यापक थे उनसे छोटे एक चाचा जो शहर में नौकरी करते थे। और सबसे छोटे चाचा अपने खेत संभालते थे।मीरा अपने पापा की सबसे बड़ी और पूरे परिवार में इकलौती बेटी थी।जिसका पूरा बचपन गाँव में ही बीता था। पर शादी एक बड़े शहर में हुई थी। वहीं उसका भाई भी शहर में नौकरी करने लगा था। तो माँ पापा को भी शहर बुला लिया था। तो मीरा का गाँव लगभग छूट ही गया था।

पर उसका जुड़ाव गाँव से खत्म न हुआ था। आज भी उसके सपने में वहीं पुराना घर आता था। इसबार भाई के फलदान के बहाने वो नवरात्रे और दशहरा वहीं मनाएगी ये सोच कर ही उसका मन मयूर नाच उठा था।


उसने शाम को अपने पति को बताया। तो उन्होंने खुद टाइम की कमी बता उसे जाने को बोल दिया। मीरा ने अपने दोनों बच्चों से पूंछा तो वो साथ चलने को तैयार हो गये। आखिर वो भी देखना चाहते थे कि बचपन से माँ के मुँह से जिसकी इतनी कहानी सुनी है। वो गाँव है कैसा??


तय समय पर सभी को ट्रेन में बिठा मीरा के पति बाय बोल चले गये। और मीरा अपने बच्चों संग पहुँच गई अपने गाँव। जहाँ उसका पूरा परिवार पहले ही आ चुका था। अपने सभी छोटे ,बड़ों के बीच पहुँच मीरा को ऐसा लग रहा था जैसे वो एक बार फिर बच्ची बन गई हो।बच्चे भी नानी के हाथ के बने पकवानों और नवरात्रि की धूम का खूब मजा ले रहे थे।


फलदान एकदिन बाद था। तो मीरा भी अपने कुछ जानने बाले पड़ोसियों से मिलने निकल पड़ी। जो मीरा से मिलकर बहुत खुश हो रहे थे। कोई उसे बचपन के किस्से सुना कर हँसने को मजबूर कर देता। तो कोई उसकी शरारते उसे याद दिला रहा था।


यही तो खूबसुरती है हमारे ग्रामीण जीवन की जो तरक्की करते हुये भी अपनी जड़े नहीं छोड़ते। मीरा का गाँव भी खूब तरक्की कर गया था। अब सड़क से लेकर शौचालय तक हर सुबिधा थी वहाँ।


यही सब देखते हुये मीरा अपने उस घर तक पहुँच गई जिसे शादी से पहले वो हर दिवाली पर दुल्हन की तरह सजाती थी। जिस चबूतरे पर बैठ कर उसके बाबा लोगों के बड़े , बड़े फैसले करते थे आज वो चबूतरा खुद अपनी दयनीय हालत पर रो रहा था।


जिसकी रौनक कभी देखते बनती थी आज वो घर वीरान हो गया था। दरवाजे की कुंडी खोलकर मीरा अन्दर आ गई। जहाँ सामने आंगन में ही तुलसी का घरुआ उसके स्वागत में खड़ा मिल गया।जो अपनी गृहस्वामनी के जाने के गम में बहुत ही दीन अवस्था में खड़ा था। अपनी आदत अनुसार मीरा ने चप्पल उतार कर उस घरूये को प्रणाम किया। जिसमें तुलसी न होते हुये भी उसे उनकी टेहनियों द्वारा आशीर्वाद देने का यहसास हो रहा था।घर की दीवारों में जगह -जगह से उधड़ता प्लास्टर ऐसा लग रहा था जैसे किसी बुजुर्ग के झुर्रियों बाले हाथों ने अपने संस्कार और आशीर्वाद रूपी छत को बड़ी ही मुस्तेदी से पकड़ रखा हो।तभी उसकी नजर वहाँ रखे उस "जादू का पिटारा "पर गई। उसे देखते ही मीरा की आँखों के सामने गंदी बस्ती के कुछ बच्चों के चेहरे याद आ गये।


मीरा ने जाकर उस बॉक्स को खोला जिसमें कुछ दीमक लगी कॉपी और एक आधी पेंसिल के अलावा दो चार पटाखे भी पड़े थे ।मीरा के चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई वो सब देख। इस जादू के पिटारे को भरने के लिये पहले वो मोहल्ले के सभी बच्चों से उनकी बची हुई पेंसिल, कलर और कोपियाँ इकठ्ठा करती ,फिर बस्ती के कुछ बच्चों को बुला कर उन्हें दे देती।


धीरे - धीरे उसने उसमें पुराने कपड़े ,पैसे और भी जरूरत का सामान जोड़ने लगी थी। ये मीरा की तरफ से एक छोटी सी पहल थी। जिसमें बच्चों के साथ बड़ों ने भी साथ देना शुरू कर दिया था दिवाली दशहरे पर तो ये जादू का पिटारा बस्ती के बच्चों की खुशियों को चार गुना कर देता था। क्योंकि इसमें सभी गाँव वाले अपने हिसाब से मिठाई पटाखे भी देते थे ।मीरा भी तो अपने सारे पटाखे और दिवाली पर मिलने वाली चॉकलेट खुद न खा कर उन्हें दे देती थी।


अभी मीरा ये सब देख ही रही थी कि चाचा जी के छोटे बेटे की आवाज आई....... " दीदी आप "यहाँ क्या कर रही है ??चलिये घर पर आपसे कोई मिलने आया है।"


मीरा ने उसकी तरफ देखकर बोला..... "यहाँ मुझसे मिलने कौन आ गया भई"?


" पता नहीं दीदी मैने देखा नहीं। मुझसे तो पापा ने फोन पर आप को लाने को बोला तो आपको खोजते हुये मै यहाँ आ गया। "


तभी उसकी नजर भी बड़े - बड़े अक्षरों में लिखे "जादू का पिटारा " पर गई। और मुस्कराते हुये बोला.... " दीदी आप इसे देख रही थी। आपकी चलाई हुई वो परम्परा अभी भी बंद नहीं हुई है। दिवाली के टाइम पर इसी के नाम से सभी लोग जरूरतमंद बच्चों की अभी भी मदद करते है। "


भाई की ये बात सुनकर मीरा खुश होते हुये चाचा के घर की तरफ चल दी।घर पहुंची तो चाचा जी और पापा जी बाहर ही मिल गये। जिनके सामने तीन चार लोग मीरा की ही उम्र के बैठे थे। जो उसे देखकर खड़े हो उसके पैर छूने लगे।मीरा आदत अनुसार "खुश रहो" का आशीर्वाद देते हुये चाचाजी के पास पहुँच गई। और बोली......


" माफ करना मैने आप लोगों को पहचाना नहीं "!


तो उन्ही में से एक लड़का बोला..... " कैसे पहचानोंगे दीदी अब हम सब बड़े जो हो गये है। "


तभी चाचाजी ने बताया..... "बेटा ये सारे वही है। जिनकी तुम अपने जादू के पिटारे से जरूरत पूरी करती थी। आज ये सब सरकारी नौकरी करते है।तुम्हारे आने की खबर सुनकर ये तुम से मिलने आये है। "


अब मीरा ने उन लड़को को गौर से देखा तो सभी चेहरे उसे जाने पहचाने ही लगने लगे थे।


तभी सारे लड़के एक साथ बोले...... "दीदी आपकी मदद करने से ही आज हम यहाँ पहुंचे है। अब हम भी पूरी कोशिश करते है कि आपकी तरह ही किसी की मदद कर सकें। "


और सभी ने अपने साथ लाई साड़ी मीरा के हाथ में रखते हुये कहा..... " दीदी आपने हमारे लिये जो किया उसका कर्ज तो हम कभी नहीं उतार सकते। पर ये साड़ी हम सब की तरफ से एक छोटा सा गिफ्ट है। वैसे ही जैसे आप दिवाली पर अपने पटाखे खुद न चला कर हमें गिफ्ट देती थी।"


मीरा को असमंजस में देख मीरा के पापा ने उसके सर पर हाथ रख कर कहा.... " लेलो बेटा ये तुम्हारे एक अच्छे काम का नतीजा है। कि जिन्हें लोग गंदी बस्ती के बच्चे कह दूर भगाते थे। आज अपना काम करवाने के लिये इनके आगे पीछे हाथ जोड़कर घूमते है। और ये संभव हुआ है तुम्हारी एक अच्छी पहल से । मुझे तुम पर गर्व है।"


पापा के कहने से मीरा ने वो साड़ी लेली। और उसे शाम को ही नवरात्रि उत्सव में पहन भी ली । उसकी चमक मीरा के सम्मान में चार चाँद लगा रही थी।मीरा के बच्चे भी अपनी माँ की पहल से सीख ले खुद भी उसी रास्ते में चलने का वादा अपनी माँ से कर रहे थे।और मीरा अपने "जादू के पिटारे " से निकली खुशियों का असर पूरे गाँव पर देखकर फूली नहीं समा रही थी।ये त्यौहार तो एक बहाना था। असल में उसने त्यौहार में दिये जाने वाले उपहारों का सदुपयोग किया था। दूसरों की जिंदगी में खुशिया भरने के लिये। 


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