STORYMIRROR

S R Daemrot (उल्लास भरतपुरी)

Tragedy Others

3  

S R Daemrot (उल्लास भरतपुरी)

Tragedy Others

इतिहास, शासकों का लिखा जाता है गुलामों का नहीं।

इतिहास, शासकों का लिखा जाता है गुलामों का नहीं।

3 mins
188

 शीर्षक : शिलालेख


“इतिहास शासकों का लिखा जाता है, गुलामों का नहीं।”


यह वाक्य मैंने पहली बार किसी किताब में नहीं पढ़ा था।


किसी पढ़े-लिखे आदमी को कहते सुना था—

“हम इतिहास में बहुत कमजोर रहे हैं। हम कुछ याद नहीं रखते।”


मैं बहुत देर तक सोचता रहा।


क्या सचमुच हम कुछ याद नहीं रखते?


फिर मुझे अपने बुजुर्ग याद आए। उनके पास बड़ी-बड़ी किताबें नहीं थीं। तारीखें याद नहीं थीं। राजाओं के नाम भी बहुत कम याद थे। लेकिन कुछ बातें थीं, जिन्हें वे भूल नहीं पाए थे।


वे कहते थे—

“हमारे बाप-दादा बहुत कुछ सहकर गए हैं।”


बस इतना।


लेकिन उस “बहुत कुछ” के भीतर न जाने कितनी सदियाँ दबी थीं।


मैंने उनसे पूछा था, “फिर लिखा क्यों नहीं?”


बूढ़े ने मेरी तरफ देखा और हँसा नहीं। बहुत देर तक चुप रहा।


फिर बोला—


“लिखने के लिए पहले आदमी को साँस लेने की फुर्सत चाहिए।”


मैं उसकी बात समझ नहीं पाया।


उसने जमीन से एक छोटा-सा पत्थर उठाया और मेरी हथेली पर रख दिया।


“देखते हो इसे?”


“हाँ।”


“इस पर कुछ लिखा है?”


मैंने पत्थर उलट-पलटकर देखा।


“नहीं।”


वह बोला—


“हमारे इतिहास का यही हाल है। जो कुछ लिखा जा सकता था, वह या तो लिखा नहीं गया, या मिटा दिया गया। और जो मिटाया नहीं जा सका, वह लोगों के भीतर चला गया।”


मैं चुप रहा।


वह आगे कहता गया—


“हमारे लोग अनपढ़ थे, ऐसा कह देना आसान है। लेकिन यह कौन पूछेगा कि उन्हें पढ़ने का अवसर किसने दिया? दिन भर बेगार करने वाले हाथ रात को कलम कैसे पकड़ते? पेट में अन्न न हो तो आदमी अपने बच्चों के नाम लिखे या अपना इतिहास?”


उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी।


बस थकान थी।


बहुत पुरानी थकान।


“आराम?” उसने कहा, “आराम के नाम पर भी क्या मिला था हमें? भूख, मार, अपमान और वह डर कि कल का सूरज किस हालत में मिलेगा।”


मैं उसे देखता रहा।


अचानक मुझे लगा, इतिहास किताबों में नहीं, उसके चेहरे की झुर्रियों में लिखा है।


उसकी आँखों में कुछ था।


मैंने पूछा—


“क्या?”


वह बोला—


“इतिहास।”


मैंने उसकी आँखों में देखने की कोशिश की।


वहाँ कोई राजा नहीं था।


कोई युद्ध नहीं था।


कोई तारीख नहीं थी।


वहाँ भूख थी।


वहाँ अपमान था।


वहाँ पीढ़ियों से दबा हुआ क्रंदन था।


और उसके बहुत नीचे—कुछ और भी था।


एक जिद।


एक स्मृति।


एक ऐसी आग जिसे पूरी तरह बुझाया नहीं जा सका था।


मैंने पूछा—


“तो क्या हमें अपना इतिहास याद नहीं है?”


वह धीरे से बोला—


“है। बहुत अच्छी तरह है।”


“क्या?”


उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।


“यह।”


फिर अपनी आँखों की ओर इशारा किया।


“यह।”


और अंत में जमीन की ओर देखते हुए बोला—


“और यह मिट्टी।”


मैंने पूछा, “लेकिन किताबों में?”


वह मुस्कुराया।


“गुलामों की किताबें कौन छापता है?”


मैं फिर चुप हो गया।


उस दिन पहली बार मुझे समझ आया कि इतिहास का न होना और इतिहास का लिखित रूप में न होना—दो अलग बातें हैं।


कुछ इतिहास कागज पर नहीं होते।


वे शरीर में होते हैं।


आँखों में होते हैं।


मौन में होते हैं।


और कभी-कभी जमीन के बहुत नीचे दबे हुए किसी पत्थर पर।


कहा जाता है, हमारे गौरव के भी दिन थे। हमारे अपने शासक थे। हमारे अपने नगर थे। हमारे अपने पराक्रमी लोग थे। बहुत कुछ था, जिसे समय ने ढक दिया।


कुछ मिट गया।


कुछ जला दिया गया।


कुछ जमीन में दब गया।


और कुछ लोगों की स्मृति में बचा रह गया।


लेकिन गुलामी के लंबे दौर ने हमारी स्मृति पर एक दूसरी परत चढ़ा दी।


वह परत गौरव की नहीं थी।


वह पीड़ा की थी।


कभी किसी भूखे आदमी का पेट पकड़कर पानी माँगना।


कभी किसी बच्चे का अपने पिता से डरकर चुप हो जाना।


कभी किसी बूढ़े का अपनी ही कहानी कहते-कहते अचानक मौन हो जाना।


क्या इन्हें इतिहास कहेंगे?


अगर नहीं, तो फिर इतिहास किसे कहेंगे?


शायद इतिहास केवल वह नहीं होता जो विजेता लिखता है।


शायद इतिहास वह भी होता है जिसे पराजित अपने भीतर ढोता रहता है।


लेकिन एक बात मैंने उस बूढ़े से सीखी।


पीड़ा को याद रखना जरूरी है।


पर केवल पीड़ा को अपना भविष्य बना लेना खतरनाक है।


उसने मेरी हथेली में रखा पत्थर वापस लिया और कहा—


“अब इसे ध्यान से देख।”


मैंने देखा।


वह बोला—


“पत्थर पर कुछ लिखा नहीं है।”


“हाँ।”


“तो लिखना सीखो।”


मैं उसकी ओर देखने लगा।


“क्या?”


उसने कहा—


“अपना इतिहास।”


उस दिन उसकी बात पूरी तरह समझ नहीं आई थी।


आज आती है।


आज समझता हूँ कि स्वतंत्रता केवल इस बात का नाम नहीं कि हमारे ऊपर कोई दूसरा शासन न करे।


स्वतंत्रता का अर्थ यह भी है कि हमें अपनी कहानी कहने का अधिकार हो।


अपनी स्मृतियों को बचाने का अधिकार हो।


अपने बच्चों को यह बताने का अधिकार हो कि हम कौन थे, क्या सहकर आए हैं और आगे क्या बनना चाहते हैं।


क्योंकि इतिहास लिखने के लिए केवल कलम नहीं चाहिए।


स्वतंत्रता चाहिए।


और स्वतंत्रता खो जाने के बाद आदमी को सबसे पहले अपनी आवाज़ खोनी पड़ती है।


फिर अपनी कहानी।


फिर अपना इतिहास।


इसलिए अपनी आजादी को कभी मामूली मत समझना।


इतिहास बाद में लिखा जा सकता है।


किताबें बाद में छप सकती हैं।


शिलालेख बाद में बनाए जा सकते हैं।


लेकिन अगर स्वतंत्रता चली गई—


तो शायद अगली पीढ़ी के पास अपना इतिहास लिखने वाला कोई न बचे।


उस बूढ़े की आवाज़ आज भी मेरे भीतर कहीं सुनाई देती है—


“याद रखना, इतिहास शासकों का लिखा जाता है, गुलामों का नहीं।”


और अब मैं उस वाक्य को थोड़ा अलग तरह से समझता हूँ।


शासक बनने की बात सत्ता पाने की बात नहीं है।


बात इतनी-सी है—

अपनी कहानी का लेखक स्वयं बने रहना।


उस बूढ़े की आवाज़ आज भी भीतर गूँजती है—

“याद रखना, इतिहास शासक लिखते हैं, गुलाम नहीं।”

शायद वह सही था। अपनी कलम जिसके हाथ में हो, इतिहास भी वही लिखता है।

पर सवाल अब भी सामने है—

अगर आज़ादी बचाने की कीमत बहुत कुछ खोना हो, तो क्या हम वह कीमत चुकाने का साहस करेंगे?

या आने वाली पीढ़ियाँ हमें सिर्फ़ इतिहास में पढ़ेंगी—

एक ऐसी कहानी की तरह, जिसमें हमारी अपनी आवाज़ ही नहीं थी?

फैसला आपका है।

क्या आप अपनी कहानी खुद लिखेंगे—

या किसी और की कलम से लिखे गए एक पात्र बनकर रह जाएँगे?


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi story from Tragedy