सामाजिक असहयोग कितना घातक
सामाजिक असहयोग कितना घातक
आमतौर पर कहा सुना जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, पर जीवन के अनुभव अक्सर इस कथन को झुठला देते हैं। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य सामाजिक नहीं, बल्कि स्वार्थी, अवसरवादी और संवेदनहीन होता जा रहा है। यह आरोप किसी पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि लंबे अनुभवों की कसौटी पर परखा हुआ सत्य है। इसी सत्य को समझने का प्रयास यह कहानी करती है। कुछ वर्ष पूर्व की बात है। गाँव के लोग एक व्यक्ति के पीछे आँख मूँदकर चल रहे थे, मानो वह कोई महान व्यक्तित्व हो। उसकी हर बात को अंतिम सत्य मान लिया जाता था। उस व्यक्ति का नाम था मीतू—तेज़ दिमाग, मीठी ज़ुबान और खतरनाक मानसिकता का मालिक। लोगों को बहकाने और अपने हित में इस्तेमाल करने में उसे महारत हासिल थी। वह सपरिवार शहर में रहता था, पर गाँव पर उसका प्रभाव गहरा था। मीतू के कारनामों की सूची लंबी है, पर यह कहानी उसके नहीं, बल्कि गाँव के समाज की संवेदनहीनता, आपसी असहयोग, ईर्ष्या, जलन और रिश्तों की गैर-जिम्मेदारी की है। मीतू ने किसी तरह जुगाड़ लगाकर गाँव के एक युवक को सरकारी नौकरी दिलवाने में भूमिका निभाई थी। इससे गाँव के लोगों में उसकी छवि और मजबूत हो गई। एक गरीब परिवार—जिसकी समझ सीमित थी—मीतू की बातों में पूरी तरह आ गया। उन्हें लगने लगा कि मीतू उनके बेटे को भी नौकरी दिलवा देगा। गाँव के कुछ समझदार लोगों ने उन्हें सावधान किया, पर लालच और अंधविश्वास ने उनकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया। मीतू ने इस कमजोरी का पूरा लाभ उठाया। उस परिवार में माता-पिता और दो भाई थे—मन्नू और सन्नू। मन्नू शादीशुदा था, मेहनत-मज़दूरी कर परिवार पालता था, जबकि सन्नू बेरोजगार था। नौकरी के लालच में यह परिवार मीतू के हर काम में नि:शुल्क लगा रहता और इसे गौरव समझता। मीतू का अपने पड़ोसी से पुराना भूमि-विवाद चल रहा था। इस विवाद में उसने मन्नू और सन्नू को ढाल की तरह इस्तेमाल किया। एक दिन योजनाबद्ध तरीके से मीतू ने अपने पड़ोसी पर हमला करवाया। मामला पुलिस तक पहुँचा और एफ.आई.आर. में मीतू के साथ मन्नू और उसके परिवार के नाम भी दर्ज हो गए। बात यहीं खत्म नहीं हुई। मीतू ने अपने बचाव के लिए मन्नू की वृद्ध माँ के नाम से झूठा क्रॉस केस भी दर्ज करवा दिया। मन्नू का परिवार कानून के जाल में उलझ चुका था, पर उन्हें इसकी गंभीरता का अंदाज़ा नहीं था। उधर, सन्नू की सगाई टूटने की घटना ने पूरे गाँव पर सामाजिक दबाव बना दिया। पीली चिट्ठी के बाद शादी से इनकार करना सामाजिक और कानूनी दोनों दृष्टि से गलत माना जाता है। गाँव और समाज के लोग पहले से ही इस परिवार से नाराज़ थे। धीरे-धीरे मीतू ने दूरी बना ली और मौका पाकर शहर भाग गया। मन्नू तब समझ पाया कि गाँव वालों की चेतावनी सही थी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। समय के साथ मन्नू का जीवन लगातार कठिन होता गया। झगड़े, बीमारियाँ और दुर्भाग्य एक के बाद एक आते रहे। उसकी माँ लकवाग्रस्त हो गई, फिर स्वयं मन्नू एक हादसे में अपंग हो गया। इलाज और गरीबी के बीच जूझते हुए उसने बेटियों की शादी की और अंततः दुनिया से विदा हो गया। कुछ ही वर्षों में एक हँसता-खेलता परिवार उजड़ गया। मन्नू की मृत्यु के वर्षों बाद, एक दिन पुलिस सन्नू को पुराने केस में गिरफ्तार कर ले जाती है—उस केस में, जिसे वह वर्षों पहले खत्म मान चुका था। उसकी पत्नी विशाखा, अनपढ़ और असहाय, मदद के लिए दर-दर भटकती रही, पर गाँव और मोहल्ले से कोई आगे नहीं आया। यहाँ प्रश्न उठता है— क्या यही समाज है? क्या यही सामाजिकता है? विशाखा को न आर्थिक सहयोग मिला, न मानसिक सहारा। अंततः उसके मायके वालों की मदद और एक वकील के प्रयास से सन्नू को जमानत मिली, लेकिन इस प्रक्रिया में परिवार कर्ज़ में डूब गया। जब सन्नू जेल से लौटा, तो मोहल्ले का कोई भी व्यक्ति उसे देखने नहीं आया। यह कहानी केवल मन्नू-सन्नू की नहीं है। यह उस समाज की कहानी है, जो गलती देखने में तेज़ और मदद करने में बेहद धीमा है। यह कहानी बताती है कि सामाजिक असहयोग कितना घातक हो सकता है। कठिन समय व्यक्ति को यह सिखा देता है कि कौन अपना है और कौन केवल नाम का। मनुष्य होने का अर्थ केवल बोलना नहीं, बल्कि समय पर साथ खड़ा होना है। मदद कोई एहसान नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य है। यदि हम मनुष्य होकर भी मनुष्य की सहायता नहीं कर सकते, तो हमारे और पशु में अंतर केवल भाषा का रह जाता है। उपसंहार यह कहानी किसी एक गाँव की नहीं, बल्कि हमारे समाज का आईना है। यदि हमने अपनी सोच, संवेदना और सहयोग की भावना नहीं बदली, तो ऐसे हादसे दोहराते रहेंगे। सामाजिक सहयोग ही समाज को जीवित रखता है— और उसका अभाव समाज को भीतर से खोखला कर देता है। नोट: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं। किसी भी वास्तविक व्यक्ति या घटना से समानता संयोग मात्र है।
