इश्क और इंतज़ार
इश्क और इंतज़ार
ये कोई साधारण प्रेम कहानी नहीं है ! इस कहानी के पात्र जब मिलते हैं तब वो दोनों अपनी जिंदगी और उमर का एक पड़ाव पार कर चुके होते हैं ! लेकिन इश्क उम्र का मोहताज नहीं होता !!
अमित और सुरेखा दस साल के लम्बे अंतराल के बाद आज फिर मिलने वाले थे ! फर्क सिर्फ इतना था कि अब दोनों की आंखों पर चश्मा था और बाल भी पक कर सफेद हो गये थे !
हां एक बात और थी जो दोनों के भविष्य मे जुड़ने वाले रिश्ते का आधार बनती है और वो ये कि जहां सुरेखा का एक बेटा था वहीं अमित अभी तक कुंवारा था , अगर दूसरे शब्दों में कहें तो उसने शादी की ही नही थी !
पति के गुजरने के बाद सुरेखा के जीवन का कोई सहारा था तो वह था उसका बेटा वंश ! लेकिन , ऐसा सुरेखा को लगता था जबकि वंश को तो अपनी मॉं के पास रहने का दूर उनसे बात करने तक का भी वक़्त नही मिलता था !
इस वजह से सुरेखा अब खुद को बहुत अकेला और टूटा हुआ सा महसूस करने लगती है !
अपने इसी अकेलेपन को दूर करने के लिए वो नौकरी करने का निश्चय करती है और एक मल्टीनेशनल कंपनी में इन्टरव्यू देने जाती है !
अब इसे इत्तेफाक कहें या ईश्वर की इच्छा कि जिस कंपनी में सुरेखा इंटरव्यू देने जाती है वो कंपनी किसी और की नही बल्कि उसके बचपन और स्कूल टाइम के दोस्त अमित की रहती है जो उसे बचपन से ही पसंद करता था..... हां ये बात और थी कि तब सुरेखा उसे सिर्फ एक अच्छा दोस्त मानती थी लेकिन अमित के उसका पहला और आखिरी प्यार सिर्फ सुरेखा ही थी !
इन्टरव्यू देने के लिए सुरेखा जैसे ही अमित के केबिन में जाती है तो अपने बचपन के प्यार को इतने सालों बाद यूं अपनी आंखों के सामने देख अमित खुद को रोक नही पाता है और दौड़कर सुरेखा को अपनी बाहों में भर लेता है !
तन्हाई और अकेलेपन की शिकार सुरेखा भी अब खुद को काबू में नही रख पाती है और अमित की बांहों में सिमटती चली जाती है !!
" इश्क और इंतज़ार सच्चा हो तो वक्त चाहे कितना भी लग जाए प्यार करने वाले किसी न किसी तरह मिल ही जाते हैं।"

