मां
मां
ये कहानी एक ऐसे लड़के पर आधारित है जो उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से शहर आता है लेकिन शिक्षा का असली महत्त्व नहीं जान पाता और जब समझ आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है !
रोशन एक जमींदार का इकलौता बेटा है जो उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से शहर आता है
यहां आने पर उसे रहने को घर तो मिल जाता है पर खाने पीने और घर की साफ-सफाई का ध्यान रखने वाला कोई नहीं था !
एक दिन अचानक कोई उसके घर का दरवाजा खटखटाता है....
कौन है ?
रोशन ने अंदर से ही पूछा !
साहब मेरा नाम कमला है आपको कामवाली बाई की जरूरत है ना
कमला ने कहा
रोशन दरवाजा खोलते हुए बोलता है हां हां है तो पर तुम्हें कैसे पता चला ?
साहब पता तो नहीं था अंदाजा लगाया क्योंकि ये घर बहुत दिनों से बंद था और इस पर ताला लगा हुआ था !
हां मैं आज ही गांव से आया हूं पर तुम ये सब बातें छोड़ो ,
अंदर आओ और लग जाओ काम पर मुझे बहुत भूख लगी है जल्दी से खाना बनाओ !
कमला आज बहुत खुश थी क्योंकि उसे लगा कि रोशन के रूप में उसे बेटा मिला गया हो.... लेकिन उसकी ये खुशी ज्यादा देर तक न रह सकी क्योंकि रोशन की नजरों में उसकी कीमत सिर्फ एक कामवाली बाई की थी और वह उसके साथ वैसा ही बर्ताव करता था !
कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा कमला भी यह सोच कर सब सहती रही कि आज नहीं तो कल रोशन को उसकी ममता और स्नेह की कद्र होगी , पर ऐसा कुछ न हुआ बल्कि उसके रवैया और बिगड़ने लगा !
अब कमला ये सब सह नहीं पा रही थी और इसी वजह से उसकी तबीयत बिगड़ती रही थी , वो घर से जाने का निर्णय लेती है और जाने से पहले रोशन के नाम एक ख़त छोड़ जाती है जिसमें लिखा था.......
" रोशन बेटा जानती हूं कि मैं तुम्हारी मां नहीं हूं और न ही कभी बन पाऊंगी लेकिन फिर भी मैंने तुम्हें अपने बेटे की तरह प्यार दिया क्योंकि मेरा भी बेटा अगर होता तो आज उसकी उम्र भी लगभग तुम्हारी जितनी ही होती पर अब वो इस दुनिया में नहीं और मेरे कान मां सुने के लिए तरह रहे हैं लेकिन गया है मेरी ये इच्छा इस जन्म में पूरी नहीं होगी इसलिए मैं भी उसके पास जा रही हूं बस एक आखिरी गुज़ारिश है तुमसे...हो सके तो मेरा अंतिम संस्कार तुम ही करना " !
ख़त पड़ते ही जैसे उसके पैरों तले जमीन खिसक जाती है और कमला मां बोलते हुए फूट-फूट कर रोने लगता है !!
