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Pushpraj Singh

Drama Inspirational


4.8  

Pushpraj Singh

Drama Inspirational


हरिया और हवेली

हरिया और हवेली

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"ओ हरिया के बापू, आज ठाकुरों की हवेली में बड़ी धूम है। ठाकुर साहब की बड़ी बिटिया को लड़के वाले देखने आये है क्या?"


"नहीं रे हरिया की अम्मा, आज छोटे ठाकुर साहब विदेश से पढ़ाई पूरी करके लौटे है। सुना है दर्जे में अव्वल आएं है पूरे फर्स्ट क्लास पास होकर। सुबह जो मिठाई लाया था न वो बड़े ठाकुर साहब ने इसी ख़ुशी में ही तो बंटवाई थी" खाना खाता हुआ रामू अपनी पत्नी से कहता है।


उसकी पत्नी कहती है, "तो अब तुम्हारी पगार बढ़ेगी ना? छोटे ठाकुर साहब के आने पर पगार बढ़ाने का वादा किया था ना?"


"अरे हरिया की अम्मा एक रोटी और दे, मैं पगार की बात करूंगा ठाकुर साहब से। सुना है छोटे साहब बड़े सख्त आदमी है। अब सारा काम काज उन्हीं के हाथों में सौंपा जायेगा। काश हमारे दिन भी फिर जाए मगर भगवान जाने ये विदेश से पढ़कर आने वाले बाबू हम गरीबों पर क्या ध्यान देंगे", कहते हुए हरिया की माँ ने लम्बी सी सांस ली और चूल्हे से दो बड़ी बड़ी रोटियां निकाल कर रामू की थाली में पटक दी।


सुबह सुबह रामू अपने बेटे हरिया को पुकारता है। "हरिया ओ हरिया! ये हरिया कभी एक बार में सुनता ही नहीं है! अरे हरिया ये क्या? कहाँ जा रहा है?"


हरिया ने कहा "बाबूजी मैं पाठशाला जा रहा हूँ। बाबूजी मेरा नाम भी लिखवा दो न, मास्टर जी हमेशा कहते है कि बिना नाम लिखवाये वो ज्यादा दिन बैठने नहीं देंगे। बाबूजी वहाँ सबको खाना भी दिया जाता है"


इतना सुनते ही रामू को मनो सांप सूंघ गया हो। वो गुस्से से बोला "कम्बख्त तेरी मति मारी गयी है क्या? तुझे कौन पढ़ायेगा वहां? तेरे बाप ने कभी पढ़ाई की है क्या? पढ़ाई तेरी किस्मत में नहीं। पिछली दफा जब मुन्नू का बाप उसे पाठशाला में दाखिल करने ले गया था तब मास्टर ने पचास रुपये मांगे थे और जब नहीं मिले तो दोनों बाप बेटों को धक्का मार कर गिरा दिया था। मुन्नू का बाप कैसे गिर गया था उसी चोट की वजह से प्रेमू आज भी लंगड़ा कर चलता है। तू चाहता है की मेरे साथ भी ऐसा ही हो?" चल हाथ मुँह धो और तैयार हो जा हवेली पर तू मेरे साथ जायेगा। देर मत कर देना, छोटे ठाकुर साहब आये है।वो समय के बड़े पाबंद है और सुन हरिया, आज खूब मन लगाकर काम करना। हो सकता है छोटे ठाकुर साहब तुझे इनाम में चार आने दे दे" हरिया अपने पिताजी की बातों से आहात होकर बिना मन के ही अपनी फटी कॉपी रख कर मुँह धोने चला जाता है।


हरिया और रामू हवेली पहुँचते है। वहां पहुँचते ही बड़ी ठकुराइन कहती है " क्यों रे रामू आज कहाँ मर गया था, इतनी देर कहाँ लगा दी? सारी हवेली गन्दी पड़ी है। कुँवरजी कल ही तो आये है, ये सब देखेंगे तो क्या कहेंगे? चल जल्दी से सफाई में लग जा, मगर पहले इस ठूंठ को जरा काट कर बरोठे में डाल दे"


"जी मालकिन" कहते हुए रामू ने गमछा कमर पर बंधा और कुल्हाड़ी उठाकर बहार पड़े एक सूखे तने को काटने लगा।


हरिया हवेली में झाड़ू लगा रहा था । हवेली के बाकी नौकर भाग भाग कर सारे काम निपटा रहे थे। छोटे ठाकुर साहब टहलने गए थे, उनके आने से पहले सब तैयार हो जाना था ।उन्हें समय से सारे काम करना बेहद पसंद है। सुबह सूर्योदय से पहले उठकर धरती माँ के चरण स्पर्श कर बाकी कार्यों से निवृत होकर और नहा कर सूर्य नमस्कार करना और फिर व्यायाम के बाद टहलने जाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। विदेश में रहकर भी वो अपनी संस्कृति, अपनी विरासत को नहीं भूले।


रामू ने आज पहली दफा छोटे ठाकुर साहब को देखा। हाँथ में लम्बी छड़ी लिए, सफ़ेद धोती कुरता पहने और अपनी लम्बी नाक पर चश्मा चढ़ाये वो बगिया से चले आ रहे थे। सभी उनका अभिवादन कर रहे थे। रामू के पास से जब वो गुजरे तो उसने "पाएं लागू मालिक" कहा। छोटे ठाकुर साहब ने नजर उठाकर हरिया और रामू को देखा, एक पल रुके और फिर बिना कुछ कहे हवेली में चले गए।


उस दिन शाम को चूल्हे के पास बैठा रामू अपनी पत्नी से कहता है।


"सुन हरिया की अम्मा आज मैंने छोटे ठाकुर साहब को देखा। वैसी ही कद काठी, मुख पर वही तेज़ जो उनके दादाजी और अपने स्वर्गीय राजासाहब के चेहरे पर था। एक पल तो लगा की मानो राजासाहब चले आ रहे हो, कितना ख्याल रखते थे वो हम सबका" उसकी पत्नी पूछती है, "तुमने पगार की बात की मालकिन से?"


रामू कहता है, "अरे कल कर लूँगा हरिया की अम्मा, ज़रा एक फुलकी और दे" उसकी पत्नी तिलमिला कर कहती है "तुम्हारी हिम्मत नहीं होती कुछ भी कहने की तो मैं ही बात कर लूंगी मालकिन से। सारा चून ख़तम हो चूका है मगर आपको इसकी तनिक भी चिंता नहीं। कल हवेली से चून मांग लाऊंगी आज बस दो ही रोटियों का चून बचा था सो मैंने बना दी। ये दाल का पानी पी कर सो जाओ। हे ईश्वर पता नहीं हमारे दिन कब फिरेंगे" कहकर रामू की पत्नी ने दाल का पानी रामू के कटोरे में उढेल दिया।


रात को वो दोनों घर के आंगन में पड़ी चारपाई पर लेटे लेटे कल की चिंता में मगन थे। रामू ने कहा "ओ हरिया की अम्मा! आज अपना हरिया पाठशाला जाने की बात कर रहा था। उसके दिमाग में पढ़ाई लिखाई की बातें कौन डालता है? हमारे नसीब में जागीरदारों की सेवा के सिवा है ही क्या? हवेली से हमारा गुज़ारा चल ही जाता है और क्या चाहिए हमें?"


हरिया की माँ ने सोते हुए हरिया के सर पर हाँथ फेरते हुए कहा "ये अभागा पता नहीं कहाँ से एक फटी किताब उठा लाया था तभी से इसे पढ़ाई का भूत चढ़ा हुआ है"


अब छोटे ठाकुर साहब को आये करीब एक महीना बीत चुका है। वो जमींदारी, जागीर और गाँव को अच्छे से समझने लग गए है। मगर उन्हें हवेली में हँसते बोलते कम ही देखा गया है। हाँ रात में हवेली की फुलवारी से वायलिन की आवाज़ जरूर आती थी। शायद यही एक शौक था उनका, वो घंटों बैठे वायलिन बजाया करते थे। संगीत की मोहक तान सुनकर लगता ही नहीं था की हवेली में रहने वाला कोई इतनी मधुर धुन बजा सकता है।


एक दिन सुबह हरिया हवेली की बैठक में पोंछा लगा रहा था और छोटे ठाकुर साहब चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहे थे। वो अचानक ही हरिया को देखकर उसे पास बुलाते है और पूछते है -"तुम्हारा नाम क्या है?" हरिया मासूमियत से कहता है " हरिया, नहीं नहीं हरिदयाल"


और तुम्हारे पिताजी का नाम क्या है " मेरे पिताजी का नाम रामदयाल है मगर माँ उसे हरिया के बापू और गांव और हवेली में सभी रामू बुलाते है"


छोटे ठाकुर साहब ने फिर पूंछा "तुम यहाँ कब से काम करते हो?"


हरिया बोला "जब मैं छोटा था तो बापू के साथ आता था तभी से"


"तो अब तुम बड़े हो गए हो?" कहकर छोटे ठाकुर साहब मुस्कुराने लगे।


हरिया ने कहा "हाँ अब मैं बड़ा हो गया हूँ पूरे नौ साल का। अम्मा कहती है की जल्दी ही मेरी लगन करवा देगी और मेरे लिए एक दुल्हन ले आएगी। फिर अम्मा को अकेले सारा काम नहीं करना पड़ेगा"


छोटे ठाकुर साहब उसकी मासूमियत पर हंसकर बोले "तुम पढ़ने कहाँ जाते हो, बिना पढ़े कैसे कर लोगे शादी? छोटे ठाकुर साहब की इस बात पर मायूस होकर हरिया ने सर झुका लिया और बोला -"नहीं मैं पढ़ने नहीं जाता, बापू ने मना किया है। पिछली दफा मुन्नू के बापू का पैर स्कूल वालों ने तोड़ दिया था और अगर मैं स्कूल गया तो वो लोग मेरे बापू को भी मारेंगे"


इतने में रामू आ जाता है और छोटे ठाकुर साहब के गुस्से से लाल मुँह को देखकर घिघयाते हुए उनके पैरों पर गिर पड़ता है और कहता है "माफ़ कर दो मालिक, ये बच्चा है न जाने इसकी मति कैसे मारी गयी है। कोई गलती हो गयी हो इस से तो माफ़ कर दो"


इतना कहकर रामू हरिया को एक थप्पड़ मारते हुए कहता है "हाय रे हरिया मैंने पहले ही मना किया था तुझे की ढंग से काम करना। कोई गलती मत करना, पर तेरे दिमाग में तो कोई बात जाती ही नहीं है"


हवेली के लोग इकट्ठे हो जाते है। छोटे ठाकुर साहब कहते है "उठो रामू, खड़े हो जाओ। तुम्हारे बेटे ने कोई गलती नहीं की ये बहुत ही समझदार बालक है। तुम इसे पाठशाला क्यों नहीं भेजते?" रामू उठ खड़ा होता है और अपने बच्चे की तारीफ छोटे ठाकुर साहब से सुनकर उसकी आँखों से आँसू बह निकलते है। रामू कुछ कह नहीं पाता उसके होंठ बस काँपकर रह जाते है।


छोटे ठाकुर साहब हवेली के चारो तरफ नज़र दौड़ते है और सबको सवालिया निगाहों से देखते है और कहते है " पिछले एक महीने में मैंने इस गाँव, हवेली और जागीरदारी को समझने की कोशिश की है और मुझे लगता है की आज भी हम सब कुछ बेकार की मान्यताओं से जकड़े हुए है। कुछ ऐसी प्रथाएं जो अंग्रेजी हुकूमत ने हम पर थोपी थी और जो हमारी गुलामी की पहचान थी। ऐसी प्रथाओं को हमने आज भी ग़ुलामी के निशानों के तौर पर संजो कर रखा हुआ है। ये निशान जब तक मिट नहीं जाते तब तक इस गाँव और इस राष्ट्र की उन्नति संभव नहीं। हमारे पूर्वजों ने सदैव लोगों की सेवा की है और इसी कर्त्तव्य को आगे बढ़ाने के लिए मुझे हवेली के नियम कायदों और परम्पराओं में कुछ बुनियादी बदलाव करने होंगे। मैं उम्मीद करता हूँ की मुझे इस कार्य को करने में आपका सहयोग और आशीर्वाद मिलता रहेगा"


इतना कहकर छोटे ठाकुर साहब हरिया के सिर पर हाँथ फेरते है और अंदर चले जाते है। छोटे ठाकुर साहब की बातों से हवेली के कुछ लोग खुश तो कुछ के चेहरों पर नाराजगी साफ़ दिखाई देने लग जाती है।


सोमवार को गाँव की पाठशाला सजी हुई है। कई गरीब बच्चे जो स्कूल नहीं जा पाते थे आज उनका स्कूल में प्रवेश समारोह है। छोटे ठाकुर साहब की बात सभी मानते थे सब उनमे अपने प्रिय स्वर्गीय राजा साहब की छवि देखते थे। अतः किसी ने भी अपने बच्चे को स्कूल भेजने से मना नहीं किया।


आज मास्टर साहब खुद नए बच्चों का दाखिला कर रहे है। हरिया के हाथ में आज सुबह झाड़ू नहीं किताबें थी और हरिया के माँ बाप की आँखों में ख़ुशी के आँसू। हरिया के माथे पर तिलक लगाकर उसे स्कूल में दाखिल किया जाता है। खुश होकर हरिया अपने बापू के पाँव छूने लगता है, हरिया का बापू कहता है "पहले छोटे ठाकुर साहब जी के पावों छुओ उनकी ही वजह से आज तू और तेरे जैसे कई बच्चे स्कूल जा पा रहे है" हरिया छोटे ठाकुर साहब के पावों छूने के लिए जैसे आगे बढ़ता है, ठाकुर साहब उसे गोद में उठा लेते है। आज गाँव वर्षों के बाद स्वर्गीय राजासाहब को दोबारा देख रहा था। सब देख रहे थे की उनके राजासाहब छोटे ठाकुर साहब के रूप में वापस गाँव आ गए है।


सारे विद्यार्थियों को हवेली की तरफ से किताबें और पाठशाला के परिधान दिए जाते है। इस पाठशाला के सुचारु संचालन की जिम्मेदारी अब हवेली के मुनीम को सौंप दी जाती है। बदलाव की हवा ऐसी चलती है की गाँव में पहले प्राइमरी, फिर हायर सेकंडरी विद्यालय शुरू हो जाते है। इन विद्यालयों में बालक एवं बालिकाएं दोनों ही समान रूप से शिक्षा पाते है। पढ़ाई छोड़ चुके वयस्कों के लिए इनमे सायंकालीन सत्र लगाया जाता है। शिक्षा की ऐसी बयार चलती है की गाँव का परिदृश्य ही बदल जाता है।


कुछ वर्षों बाद ......


आज हरिया ने प्रदेश की प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। वो सबसे पहले हवेली की तरफ दौड़ता है। माँ कहती है रुक जा ज़रा, छोटे ठाकुर साहब के लिए उनकी पसंदीदा मिठाई तो लेता जा। ये घेवर मैंने उन्ही के लिए बनाये थे।


हरिया की माँ अब स्वरोजगार के तहत खुद मिठाई बनाकर शहर भेजती है। ठाकुर साहब ने ग्रामीणों के स्वरोजगार और स्वावलम्बन पर जो ध्यान दिया है उसी कि वजह से आज ये ग्राम आदर्श ग्राम की सूची में आ सका है। इधर हरिया अपनी माँ की टेर को अनसुना कर के ख़ुशी में सराबोर बस हवेली की ओर दौड़ा जा रहा है। बगिया की ठंडी हवा भी हरिया के साथ मदमाती होकर उसके बालों को बिखेरे जा रही है।


हवेली में अपनी लम्बी नक्कासीदार कुर्सी पर अख़बार पकड़कर कर बैठे छोटे ठाकुर साहब जब अख़बार में प्रकाशित प्रावीण्य सूची के प्रथम स्थान पर "हरी दयाल" नाम देखते है तो उनके होंठों पर एक छोटी सी मुस्कान छा जाती है और उनकी आँखों से टपकता हुआ ख़ुशी का एक आँसू अख़बार में लिखे हरिदयाल के नाम पर गिर जाता है। अब हवेली और हरिया के बीच का फ़ासला ख़तम हो चुका है। यही तो शुरुआत है अपनी परम्पराओं और संस्कृति के मज़बूत स्तम्भ पर खड़े एक नए कल की, एक नए भारत की।


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