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Archana Saxena

Drama


4.7  

Archana Saxena

Drama


होली तो हो ली

होली तो हो ली

7 mins 270 7 mins 270

चार दिन परिवार के साथ बिता कर काम पर लौटना रमेश को बिल्कुल नहीं भा रहा था। उस पर पत्नी की उदास आँखें उसके पाँव में बेड़ियाँ डाल रही थीं। कहने को मुंह से इतना ही कहा रीता ने कि उसे पता नहीं था विवाह रमेश के साथ नहीं उसके परिवार के साथ हो रहा है। 

रमेश कुछ कह ही नहीं सका जवाब में। कुछ गलत भी तो नहीं कहा था उसने। डेढ़ बरस हो गया विवाह को, वह बेचारी एक बार भी पति के साथ नहीं जा पाई थी। शुरू में तो माँ बाप ने यही कहा कि "हमारे भी तो कुछ अरमान हैं। कुछ दिन हमें भी सेवा कराने दे।"

रमेश ही नहीं रीता ने भी सहर्ष मान लिया था। उसके बाद से जितनी बार कोशिश की माँ बाबू जी में से कोई न कोई बीमार हो ही जाता था और रीता को रोक लिया जाता। और हद तो तब होती जब रमेश के जाते ही अगले दिन वह ठीक भी हो जाते। अब तो रीता सब समझने लगी थी, पर रमेश की आँखों पर माँ बाप के प्यार की पट्टी बँधी थी। रीता लिहाज में और रमेश  सहानुभूति में कुछ कह ही नहीं पाते थे। कल रमेश को वापिस जाना था और माँ सुबह से सिर पर पट्टी बाँधकर लेटी हुयी थी। यह देख रीता ने जाने के लिये कुछ कहा ही नहीं। पर पानी सिर के ऊपर बहने लगा था। रीता की हँसी ठिठोली न जाने कहाँ गायब हो गयी थी। इस बार होली पर रमेश ने आने से पहले ही वादा किया था कि रीता को लेकर ही जायेगा। रीता ने फोन पर कही इस बात का जवाब तक नहीं दिया था। यहाँ तक कि रमेश को देख कर भी वह तटस्थ ही रही जैसे उसका भरोसा ही उठ गया हो रमेश के हर बार किये वादों पर से।

जब वातावरण ज्यादा ही बोझिल लगने लगा तो रमेश घर से बाहर आकर गली में टहलने लगा। वैसे भी रीता रसोई में व्यस्त हो गयी थी। उसके बचपन का मित्र देवेश सामने से आता दिखा तो रमेश के चेहरे पर मुस्कान आ गयी। दोनों साथ टहलते दूर निकल गये। तभी देवेश ने पूछा "इस बार तो भाभी को लेकर जा रहा है न?"

 "कहाँ यार माँ फिर बीमार हैं" उसने बुझे हुये स्वर में कहा।

"आंटी कुछ ज्यादा बीमार नहीं हो जाती तेरे वापस जाते समय?" उसने हँसते हुए पूछा।

"होता तो कुछ ऐसा ही है। पर करूँ भी क्या?"

"भाभी सीधी हैं उसका फायदा तो नहीं उठाते आंटी अंकल?"

"कैसी बात कर रहा है? वह बेचारे तो खुद परेशान होते हैं कि हर बार कुछ न कुछ हो जाता है। और रीता नहीं जा पाती।"

"तू भोला है, तेरी आँखों पर उनके प्यार की पट्टी बँधी है। वरना तेरे दिमाग में एक बार तो आता कि हर बार ऐसा कैसे सम्भव है जबकि उन्हें कोई बीमारी भी नहीं है? और तेरी शादी के बाद ही ऐसा क्यों होता है? तू तो पहले भी आता जाता था।"

  इस बार रमेश सोच में डूब गया। उसको बात में सत्यता भी नजर आ रही थी पर उसका मन माँ बाप पर अविश्वास नहीं कर पा रहा था।


कुछ देर बात करने से मन कुछ हल्का हो गया था। खाने का समय हो गया था तो वह वापिस आ गया। दरवाजा यूँ ही भिड़ा कर चला गया था वैसे ही चुपचाप खोल कर अंदर भी आ गया। पहले माँ बाबू जी का कमरा ही पड़ता था। उनकी बातें करने की आवाज आ रही थी। और कोई दिन होता तो वह बिना ध्यान दिये आगे बढ़ जाता पर आज उसने रुक कर दरवाजे के साथ कान लगा दिये। बाबू जी कह रहे थे "लगता है आज घर का माहौल कुछ गर्म है। और यह रमेश बिना बताये कहाँ चला गया? कुछ शक तो नहीं हो गया उसे? सुनो इस बार बहू को भेज ही देते हैं। अगली बार फिर रोक लेंगे।"

"अरे कैसी बातें कर रहे हो? एक बार बाहर रहने की आदत हो गयी तो वह यहाँ नहीं रुकने वाली। जब तक न जाये तब ही तक अच्छा। और अब यह घर का काम मेरे बस का नहीं है।" यह माँ की आवाज थी।

ओह तो देवेश सही कह रहा था। कई दफा माँ बाप भी इस दर्जे तक स्वार्थी हो जाते हैं कि बच्चों की खुशियाँ रौंद देते हैं। मन तो किया कि अभी दरवाजा खोल कर बता दे कि वह सब कुछ सुन चुका है। फिर कुछ सोच कर रुक गया और चुपचाप आगे बढ़ गया।

 खाना खाते समय रीता ने रमेश से कोई बात नहीं की। रात में भी पीठ करके सो गयी। रमेश भी शान्त रहा पर मन ही मन एक निर्णय कर चुका था। 

अगली सुबह आराम से उठा चाय पीकर अखबार पढ़ने बैठ गया तो रीता से रहा न गया पूछ बैठी 

 "आप तैयार नहीं हो रहे? जाना नहीं है?"

 "नहीं! इस बार सचमुच तुम्हें लेकर ही जाऊँगा पर उसके लिये तुम्हें मेरा साथ देना होगा।" 

 "क्या करना है?" रीता ने उत्सुकता पर काबू पाने की व्यर्थ सी कोशिश की।

"बस आज सारा दिन आराम करना है और जोर के पेट दर्द का बहाना।"

 "यह नहीं होगा मुझसे। झूठ क्यों बोलूँ?"

  "जैसे जहर को जहर ही काटता है उसी तरह झूठ के बदले झूठ। और फिर जो बोलना है वह मुझे बोलना है, तुम्हें बस तड़पने का नाटक करना है।" रमेश ने मुस्कुरा कर कहा।

 रीता ने अचरज से देखा "आपको समझ में आ गया?"

  "हाँ, बस थोड़ी देर लगी समझने में। जो माँ बाप बच्चों के लिये इतना कुछ करते हैं वह अपने आराम के लिये स्वार्थी हो सकते हैं इस बात को मन नहीं मान पाता था।" रमेश ने थोड़े दुखी स्वर में कहा।

रीता ने हाँ में सिर हिलाया। और फिर शुरू हुआ नाटक। रीता पेट पकड़ कर लेट गयी और रमेश घबराया हुआ सा माँ बाबू जी के कमरे में गया। 

 "पता नहीं रीता को क्या हुआ रात भर पेट दर्द से तड़पती रही है। और एक बार तो चक्कर खाकर गिर भी पड़ी।"

 "अच्छा? ऐसा क्या हो गया? त्योहार था कुछ अंट संट खा लिया होगा। बदहजमी होगी। ठीक हो जायेगी। तू बिना टेन्शन के जा।" माँ ने लापरवाही से कहा।

"अरे नहीं माँ बदहजमी नहीं लग रही। डॉक्टर को ही दिखा लाता हूँ थोड़ी देर में।

और चाय आप में से कोई खुद से बना लेना प्लीज। मैंने अपने लिये बनाई थी पर तब आप दोनों सो रहे थे। नहीं तो बर्तन सफाई वाली भी आने वाली होगी, उससे बोल दूँगा।"

"तू चिंता मत कर हम देख लेंगे। तू बहू को देख"

 बाबू जी ने कहा।

थोड़ी देर में कामवाली बाई आ गयी। रमेश ने उससे बात करके आज अतिरिक्त कार्य के लिये हिदायतें दे दीं और रीता को डॉक्टर के यहाँ ले जाने को निकल गया। उसने देवेश से उसकी कार कुछ घंटे के लिये माँग ली थी।। अब रीता बीमार होती तब ही तो डॉक्टर को दिखाने जाते। लॉंग ड्राइव पर निकल गये दोनों और आधा दिन लगा कर वापिस आ गये।

 "क्या कहा डॉक्टर ने? क्या हुआ है बहू को?"

बाबू जी ने पूछा। माँ भी उत्तर की प्रतीक्षा में रमेश को देखने लगीं। उन्हें विश्वास था कि सब ठीक होगा और एक दो दिन में रीता ठीक हो जायेगी। आशा के विपरीत रमेश बोला

"एक तो अपने कस्बे के डॉक्टर जरा भी होशियार नहीं हैं। दो जगह दिखा लिया, वह तो कह रहे हैं किसी बड़े शहर में दिखा लो। कुछ टेस्ट कराने पड़ेंगे जो यहाँ होते ही नहीं। अब देर करने से कहीं बात ज्यादा न बिगड़ जाये इसलिये कल ही अपने साथ शहर ले जा रहा हूँ रीता को। ठीक से इलाज कराना पड़ेगा। आप लोगों को परेशानी तो होगी पर यहाँ पूरे दिन की मेड लगा लेते हैं।"

  "पूरे दिन की मेड क्यों लगानी? पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं। और फिर मुझे किसी का काम नहीं भाता। कर लूँगी खुद ही जैसे तैसे। अब भगवान ने अगर बुढ़ापे में कष्ट लिखे हैं तो भोगने पड़ेंगे ना"

माँ ने आखिरी पासा फेंका।

"पैसों की चिंता आप क्यों करती हो? हर महीने घर खर्च मैं देता तो हूँ। मैंने कितनी बार कहा है मेरे साथ शहर में चल कर रहो पर आप लोग सुनते कब हो? एक गृहस्थी होगी तो खर्चे भी कम रहेंगे। पर आपको तब पैसे की फिक्र नहीं होती। और काम पसंद नहीं भी आये तो भी कभी तो आदत डालनी पड़ेगी। मैं भी हमेशा अकेले नहीं रह सकता न? मेरा भी तो सोचो।" अब माँ ने चुप रहना ही ठीक समझा। कहीं न कहीं रमेश ने इशारा भी कर दिया था कि अब से रीता को साथ ही रखेगा।

अगले ही दिन दोनों शहर चले गए। माँ बाबू जी ने जब पूछा कि शहर के डॉक्टर ने क्या कहा तो रमेश ने बताया कि अकेलापन अनुभव करने की वजह से तनाव बहुत बढ़ गया था अतः उसका असर ही था। इस बार उसने गलत नहीं कहा था। तनाव की वजह से सही में पेट दर्द बेशक नहीं हुआ था पर अवसाद की ओर अवश्य बढ़ रही थी वह। इस बार होली सचमुच खुशियों के रंग बिखेर गयी उन दोनों के जीवन में। माँ बाबू जी भी अपनी गलती मानने को विवश थे और शहर जाकर रहने के फैसले पर भी पुनर्विचार कर रहे थे।


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