विजय बागची

Abstract


4.0  

विजय बागची

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हमारी स्तिथि

हमारी स्तिथि

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मनुष्य अपनी हर स्थिति का ज़िम्मेदार खुद होता है। वर्तमान में अर्थात अभी जो स्थिति है उस पर ग़ौर करें तो हम पाएंगे कि यह स्थिति हमारी खुद की बनायी, अपनायी और चुनी हुई है। हम ही इसके सच्चे निर्माणक हैं। स्थिति कैसी भी हो सकती है, सरल-कठिन, अच्छी बुरी कोई भी। अंततः इन्हीं से सुख और दुःख की परिणीति होती है। स्वीकृति भी स्तिथि में विशेष योगदान रखती है।


चलिए आज हम अपनी यथास्थिति का मूल्यांकन करके देखते हैं और इससे सम्बद्ध अपने वर्तमान, भूत और भविष्य के क्रियाकलापों का अध्ययन करके भी देखते हैं। हम अपने आस-पास, अपने परिवार के सदस्यों को पाते हैं, अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, पड़ोसियों से हमेशा जुड़े रहते हैं। हम सभी आय, भोजन, आवास आदि से अनन्य प्रकार की कड़ियों से बंधे पड़े हैं। जीवन है तो इन सब का होना स्वाभाविक है। परंतु हमनें इन्हें स्वाभाविक की अपेक्षा कहीं ज़्यादा आवश्यक बना रखा है, तभी हमको इन सब में बहुत सी भिन्नता देखने को मिलती है। ये भिन्नता दिखती जिस प्रकार हैं उसी प्रकार इनका अनुसरण भी कर लिया जाता है। कुछ बुद्धिजीवी लोग इनसे आवश्यक दूरी बना लेते हैं क्योंकि वह इसके पीछे की गहनता को भलीभांति समझ लेते हैं।


उदाहरणस्वरूप मैं एक ही परिवार के दो भाइयों को एक ही पद पर आसीन करना चाहूंगा ताकि उनकी स्तिथियों का आकलन हम भलीभांति समझ सकें।


हम पाते हैं कि दो भाई राम और श्याम जोकि सरकारी पद पर इंजीनियरिंग विभाग में विराजमान हैं। दोनों शादीशुदा हैं और दोनों के अभी तक कोई बच्चे नहीं हुए हैं। बुद्धिमत्ता में दोनों एक दूसरे से कम नहीं। सभी स्वरूप में समानता ही रखते है, फर्क बस इतना सा हैं कि एक(राम) स्वयं से प्रतिस्पर्धा रखता है एक(श्याम) समाज से। सामान वेतन होने पर भी श्याम चिंतित ही रहता है और राम प्रसन्न इसलिए क्योंकि राम आकांक्षी नहीं। वह अपनी स्तिथि का स्वयं निर्माणक है। राम अपनी स्तिथि से इसीलिए भी प्रसन्न है क्योंकि वह जीवन को पैसे और समाज से प्रतिस्पर्धी नहीं बनाता। परंतु श्याम के लिए इसके विपरीत ही है जो उसके दुःख का कारण होता जाता है। यही दुःख उसकी मानसिक स्तिथि में भी भिन्नता लाता है। जोकि उसके दुःख, दर्द, द्वेष आदि उलझनों में समय असमय अभिवृद्धि करते रहते हैं।


भिन्नता के संदर्भ में मैं यह कहना चाहूंगा कि सभी समान तो हैं, फिर भी ये सभी सबके जीवन को अलग-थलग करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। यहाँ हमनें आय को एक कड़ी के रुप में देखा और पाया कि राम किस प्रकार प्रसन्न है और श्याम नहीं। इसी प्रकार अन्य कड़ियां भी भिन्नता प्रदर्शित करती है जैसा कि हम अपने जीवन में देखते और महसूस करते हैं। यही भिन्नता ही हमें कम-ज़्यादा से परिचित कराती है। यही कम ज़्यादा ही सुख दुःख के प्रमाणक भी होते जाते हैं। कोई ज़्यादा पाकर प्रसन्न होता है तो कोई दुःखी। इसी के विपरीत कोई कम पाकर प्रसन्न है तो कोई दुःखी। इससे आप किसी की भी मानसिक स्थिति का आकलन कर सकते हैं। सही रुप में देखे तो इस भिन्नता में वास्तविकता का खेल ही उल्टा है, सारा का सारा खेल को मानसिकता का है। हम अपनी सोच के अनुसार ही बनते जाते हैं। हम जैसे हैं वैसे न रह के एक काल्पनिक दुनिया से अपनी तुलना करते रहते हैं और जब तक उससे हम समानता नहीं पाते व्याकुल ही रहते हैं। देखा जाए तो जो सभी संदर्भों में प्रसन्न हैं वह उसकी अपनी एक मानसिक स्थिति है जो उसे सामान्य बनाये रखने में सहायक सिद्ध होती है। उसकी प्रबलता उसकी मानसिक स्थिति में है न कि वास्तविक स्थिति में।


सही रास्ता वही है जो हम खुद अपने लिए बनाते है। क्योंकि हमें खुद ही अपना निर्माणक होना है। यह भी सत्य है कि हमारा जीवन, हमारी स्थिति, हर रुप में दूसरे से भिन्न है। मानता हूं प्रतिस्पर्धा मायने रखती है पर उसका भी सही मार्ग और सही स्वरूप है। हमारी स्थिति ही हमारा भविष्य तय करती है। यही हमारे भविष्य की नींव भी है। इस स्थिति को भलीभांति जानकर ही हम खुद को दृढ़ता प्रदान कर सकते हैं। अतः हमें अन्य की स्थिति को ध्यान दिए बिना यह ध्यान रखना है कि हम अभी अपने भूत के परिणाम हैं और कल को अपने भविष्य के निर्माणक होंगे।


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