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Rukhsar parveen

Romance

3  

Rukhsar parveen

Romance

हकीकी अफसाना

हकीकी अफसाना

5 mins
201


"कहते है एक कामयाब मर्द के पीछे एक औरत का हाथ होता है।"बिल्कुल सही है।

लेकिन ये भी सच है कि एक कामयाब औरत के पीछे भी मर्द का साथ और विश्वास होता है"।

     अगर जीवनसाथी साथ न दे तो न जाने कितने सपने परवाज़ होने से पहले ही दम तोड़ दे।

 आज अगर महिला सशक्त है तो इसमें पुरुषों की बदली हुई सोच है अन्यथा आज भी बहुत सी प्रतिभाएं घर के दायरे में सिमट कर रह गई है।

     ऐसी ही एक कहानी महाविश नाम की एक लड़की की है जो बेहद खूबसूरत ,आत्मविश्वासी और प्रतिभाशाली लड़की थी। मेहविश के सपने आसमान को छू लेने के थे।

   वो जिंदगी में ऐसा मक़ाम हासिल करना चाहती थी जो लोगों के लिए एक मिसाल बन जाये।समाज का सीमित दायरा जो लड़कियों के लिए बना था वो उसको मिटा देना चाहती थी। वो लोगों को दिखाना चाहती थी कि लड़कियां अपनी संस्कृति के साथ साथ भी लड़कों से कंधे से कंधा मिला कर चल सकती है।

       मेहविश एक ऐसे समाज में रहती थी जहां औरतों पर बहुत सी पाबंदियां थी।शादी के बाद पढ़ाई और नौकरी को अच्छा नहीं माना जाता था।

       औरतों का काम घर में सिर्फ खाना पकाने और बच्चे संभालने तक ही सीमित था।

   मेहविश इन दायरों से बाहर आना चाहती थी ।समाज की सोच बदलना चाहती थी।

     मेहविश की शादी की बात जब घर में चली तो उसको सबसे ज्यादा फिक्र अपने सपनो की सताई।कही ऐसा न हो कि कोई ऐसा जीवनसाथी मिल जाए जो उसके सपनो को घर की चारदीवारी में कैद कर दे।

उसकी पढ़ाई को और उसके अरमानों को समाज की दकियानूसी सोच पर परवान चढ़ा दे। इन सब बातों से वो बहुत घबरा रही थी। 

    लेकिन फहाद से मिलकर उसे लगा कि वो खुले विचारों के एक नेक दिल इंसान थे।उन्होंने मेहविश से वादा किया कि वो हर कदम पर उसका साथ देंगे । 

   मेहविश और फहाद शादी के बंधन में बंध गए। फहाद मेहविश से बहुत प्यार करते थे। उसकी हर ख्वाहिशों और जरूरत का ध्यान रखते।

     मेहविश ने जब अपनी पढ़ाई जारी रखने की बात की तो पूरे घर में हंगामा सा मच गया ।  

      "हम तो बहु लाए थे घर को संभालने के लिए अब ये महारानी पढ़ेगी तो घर के काम काज कौन संभालेगा"।फहाद की मां की आवाज जब मेहविश के कानो तक गई तब वो चुपचाप कमरे में जाकर रोने लगी।फहाद ने भी ये बात सुन ली थी ।उसने मेहविश को यकीन दिलाया कि वो हर कदम पर उसका साथ देगा।

      अपनी पढ़ाई के सिलसिले में मेहविश को दूसरे शहर जाना था।फहाद उसके साथ चलने को तैयार था।

  " हाय तौबा ऐसी कैसी दीवानगी जो बहू को पढ़ाने के लिए काम धंधा छोड़कर बाहर जा रहा है।"परिवार में कानाफूसी होने लगी।

    फहाद को मेहविश जान से ज्यादा अजीज थी उसने लोगों की कड़वी कसैली सुन ली ।लेकिन अपने मकसद से पीछे नहीं हटे ।

  उसने मेहविश के सपनो को पूरा करने की ठान ली थी।

मेहविश ने भी खूब मेहनत से पढ़ाई की उसकी मेहनत रंग लाई और वो सरकारी महकमे में आला मक़ाम पर फायज हो गई।

   "मैं न कहती थी कि मेहविश जरूर कुछ बन कर लौटेगी।"ये वही लोग थे जो पहले इनका मजाक उड़ाते थे आज इनकी तारीफे करते थक नहीं रहे थे।समाज में अपनी मेहनत के दम पर इन दोनों ने एक अलग ही मक़ाम हासिल कर लिया था।

   लोगों की सोच को इन दोनों ने बदल कर रख दिया ।अब लोग अपने घर की बहुओं को पढ़ाने लगे ताकि उनकी बहु भी वो मक़ाम हासिल कर ले जो मेहविश ने हासिल कर लिया था।

     सब कुछ अच्छा चल ही रहा था कि 

 अचानक मेहविश के पिताजी का देहांत हो गया।ये सदमा मेहविश बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी ।वो गहरे सदमे में चली गई थी।मेहविश अपने पापा से बहुत प्यार करती थी।मेहविश के सपने उसकी सोच सब उसके पापा की ही देन थे।उन्होंने अपनी बेटी को कभी बेटों से कम नहीं समझा था।

उसको लग रहा था कि पापा के बगैर उसकी दुनिया खत्म हो गई ।वो अब जिंदा नहीं रहना चाहती थी।

     फहाद ने ऐसे मुश्किल वक्त में उसको संभालने की पूरी कोशिश की।उससे जो भी मुमकिन हो रहा था हर वो अमल कर रहा था ताकि मेहविश अपनी जिंदगी में वापस लौट आए।

      लेकिन मेहविश इस सदमे से बाहर नहीं आना चाहती थी।

        एक दिन फहाद उसका मन बहलाने के लिए बाहर ले गया और उसको ड्राइविंग सीट पर बैठा दिया ।

     मेहविश तुम हमेशा लोगो के लिए एक मिसाल रही हो। क्या तुम उन औरतों के लिए कुछ नहीं करना चाहती जिनके लिए ड्राइविंग करना एक सपना है।

 "नहीं फहाद न ही मुझमें अब जिंदगी जीने का शौक है और न ही कुछ नया करने का जज्बा।"मेहविश ने उदासी से जवाब दिया।

      फहाद ने मेहविश को समझाया अगर तुम जिंदगी से हार मन जाओगी तो उन लड़कियों के बारे में सोचो जिनके हौसलों को तुमने उड़ान दी।

          मेहविश को बात समझ में आई ।उसने फिर से एक बदलाव लाने की ठान ली। उसने सोच लिया कि जो लोग मजाक उड़ाते है कि औरत कुशल ड्राइवर नहीं होती उसमें इतनी हिम्मत नहीं होती कि वो बिना डरे ड्राइविंग कर सकती है।उनको करारा जवाब देगी।

     मेहविश एक बार फिर से उन तमाम लड़कियों में हिम्मत जगाना चाहती थी जो सिर्फ चूल्हे चौके तक ही सीमित थी।

    वो अपने परिवार और उस शहर की पहली औरत बन गई थी जो अपनी संस्कृति यानी पर्दे के साथ बेझिझक ड्राइविंग कर रही थी। वो जिधर से भी निकलती लोग गर्व से कहते देखो पर्दे के साथ भी लड़कियां कार चला सकती है।

     एक बार फिर से फहाद जैसे एक सच्चे हमसफर ने मेहविश का रुख जिंदगी की तरफ मोड़ दिया था। मेहविश एक बार फिर से परवाज़ करने ले लिए तैयार थी।

      रुखसार परवीन

सहायक अध्यापक

गजपतिपुर

बहराइच



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