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Rukhsar parveen

Inspirational

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Rukhsar parveen

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हकीकी अफसाना

हकीकी अफसाना

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"कहते है एक कामयाब मर्द के पीछे एक औरत का हाथ होता है ।बिल्कुल सही है।लेकिन ये भी सच है कि एक कामयाब औरत के पीछे भी मर्द का साथ और विश्वास होता है।"

अगर जीवनसाथी साथ न दे तो न जाने कितने सपने परवाज़ होने से पहले ही दम तोड़ दें।

     हां ,आज अगर महिला सशक्त है तो इसमें पुरुषों की बदली हुई सोच है अन्यथा आज भी बहुत सी प्रतिभाएं घर के दायरे में सिमट कर रह गई हैं।

     ऐसी ही एक कहानी मेहविश नाम की एक लड़की की है जो बेहद खूबसूरत, आत्मविश्वासी और प्रतिभाशाली लड़की थी।मेहविश के सपने आसमान की छू लेने को थे।

   वो जिंदगी में ऐसा मकाम हासिल करना चाहती थी जो दूसरों के लिए मिसाल बन जाए।समाज का सीमित दायरा जो लड़कियों के लिए बना था वो उसको मिटा देना चाहती थी।वो लोगों को दिखाना चाहती थी लड़कियां अपनी संस्कृति के साथ भी लड़कों से कंधे से कंधा मिला कर चल सकती हैं।

  मेहविश एक ऐसे समाज में रहती थी जहां औरतों पर बहुत सी पाबंदियां थी।शादी के बाद पढ़ाई और नौकरी को अच्छा नही समझा जाता था।औरतों का काम सिर्फ खाना पकाने और बच्चा संभालने तक ही सीमित था।

    मेहविश इन दायरों से बाहर आना चाहती थी।समाज की सोच को बदलना चाहती थी।

       मेहविश की शादी की बात जब घर में चली तो उसको सबसे ज्यादा फिक्र अपने सपनों की सताई।कही ऐसा न हो कि कोई ऐसा जीवनसाथी मिल जाए जो उसके सपनों को घर की चहारदीवारी में कैद कर दें।उसकी पढ़ाई और उसके अरमानों को समाज की दकियानूसी सोच के परवान चढ़ा दे।इन सब बातों से वो बहुत घबरा रही थी।

    लेकिन फहाद से मिलकर लगा की वो खुले विचारों के एक नेक दिल इंसान हैं।उन्होंने मेहविश से वादा किया कि वो हर कदम पर उसका साथ देंगे।

      फहाद और मेहविश शादी के बंधन में बंध गए।फहाद मेहविश से बहुत प्यार करते थे।उसकी हर जरूरतों और ख्वाहिशों का ध्यान रखते।

     मेहविश ने जब अपनी पढ़ाई जारी रखने की बात की तो पूरे घर में हंगामा मच गया।

 "हम तो बहू लाए थे घर संभालने के लिए.... अब ये महारानी पढ़ेंगी तो घर का काम काज कौन करेगा।" फहाद की मां की आवाज जब मेहविश के कानों तक गई तो वो चुपचाप जाकर कमरे में रोने लगी। फहाद ने भी ये बात सुन ली थी ।उसने मेहविश की यकीन दिलाया कि वो हर कदम पर उसका साथ देंगे।

   अपनी पढ़ाई के सिलसिले में मेहविश को बाहर जाना था । फहाद भी उसके साथ जाने को तैयार था।

    "हाय तौबा, ऐसी कैसी दीवानगी जो बहु को पढ़ाने के लिए काम धंधा छोड़कर बाहर जा रहा है।"परिवार में कानाफूसी होने लगी।

 फहाद को मेहविश जान से ज्यादा अज़ीज़ थी। उसने लोगों की कड़वी कसैली सुन ली लेकिन अपने मकसद से पीछे नहीं हटा।उसने मेहविश के सपनों को पूरा करने की ठान ली थी।

  मेहविश ने भी खूब मेहनत से पढ़ाई की और सरकारी महकमे में आला मकाम पर फ़ायज़ हो गई।

  " मैं न कहती थी महाविश ज़रूर कुछ बन कर लौटेगी।"ये वही लोग थे जो पहले इनका मजाक उड़ाते थे आज इनकी तारीफे करते नहीं थक रहे थे।

समाज में अपनी मेहनत के दम पर इन दोनों ने अलग ही मकाम हासिल कर लिया था। 

  लोगों की सोच को इन दोनों ने बदल कर रख दिया था ।अब लोग अपने घर की बहुओं को भी पढ़ाने लगे ताकि उनकी बहुएं भी वो मकाम हासिल कर लें जो मेहविश ने हासिल कर लिया था।

   सब कुछ अच्छा चल ही रहा था कि एक दिन अचानक मेहविश के पिताजी का देहांत गया। ये सदमा मेहविश बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। वो गहरे सदमे में चली गई थी। मेहविश अपने पापा से बहुत प्यार करती थी। मेहविश के सपने.. उसकी सोच.. सब उसके पापा की ही देन थे। उन्होंने अपनी बेटी की बेटे से कम नहीं समझा था। उसको लग रहा था कि पापा के बगैर उसकी दुनिया ही खत्म हो गई। वो अब जिंदा नहीं रहना चाहती थी।

   

फहाद ने ऐसे मुश्किल वक्त में मेहविश को संभालने की पूरी कोशिश की। उससे जो भी मुमकिन था हर वो अमल कर रहा था ताकि मेहविश अपनी जिंदगी में वापस लौट आए।

लेकिन मेहविश इस सदमे से बाहर नहीं आना चाहती थी।


एक दिन फहाद मेहविश का मन बहलाने के लिए बाहर ले गया और उसको ड्राइविंग सीट पर बैठा कर कहा,"मेहविश तुम हमेशा लोगों के लिए एक मिसाल रही हो क्या तुम उन औरतों के लिए कुछ नहीं करना चाहती जिनके लिए ड्राइविंग एक सपना है।"

  "नहीं फहाद, न ही मुझमें अब ज़िंदगी जीने का शौक है और ना ही कुछ नया करने का जज्बा।"

मेहविश ने उदासी से जवाब दिया।

फहाद ने मेहविश को समझाया,"अगर तुम हार मान जाओगी तो उन लड़कियों के बारे में सोचो जिनके हौसलों को तुमने उड़ान दी।"

  मेहविश को बात समझ में आई।उसने एक बार फिर से बदलाव लाने की ठान ली....

उन तमाम औरतों के लिए ....जो सिर्फ चूल्हे चौके तक ही सीमित थी।

वो अपने परिवार और उस शहर की पहली औरत बन गई थी जो अपनी संस्कृति यानि पर्दे के साथ बेझिझक ड्राइविंग कर रही थी।

वो जिधर से भी गुजरती सब यही कहते देखो पर्दे के साथ भी लड़कियां कार चला सकती है।

 एक बार फिर से फहाद जैसे सच्चे हमसफर ने मेहविश का रुख ज़िंदगी की तरफ मोड़ दिया था।

  मेहविश एक बार फिर से परवाज़ करने के लिए तैयार थी.......

 


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