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Rukhsar parveen

Children Stories

3  

Rukhsar parveen

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जाड़े का दिन

जाड़े का दिन

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जाड़े का दिन था। सुमन सुबह कार धुलवाने वाशिंग सेंटर गई । कार वाशिंग के लिए देकर वो कुर्सी पर बैठ गई।

तभी सामने से एक 8 साल का बच्चा आता दिखा। वो कंधे पर कबाड़ की बोरी लाद कर ला रहा था। इतनी ठंड में वो सिर्फ हाफ पैंट और बनियान पहने हुए था । उसके पैर में चप्पल भी नहीं थी।  

सुमन को देखकर बड़ा अचरज हुआ। उसने बच्चे को बुलाकर पूछा - "क्या तुमको ठंड नहीं लग रही है?तुम्हारे पास कपड़े और चप्पल नहीं है क्या?"

 बच्चे ने थोड़ा सा झेंप कर जवाब दिया,"नहीं ,दीदी!मेरे पास पहनने को कपड़े नहीं है और ना ही चप्पल है। हम बहुत गरीब है। हम 5 भाई बहन है । मेरे पिता जी की तबियत बहुत खराब रहती है। इस कबाड़ को बेच के जो पैसा आएगा हम फिर उससे खाना खायेंगे ।

  सुमन को उस बच्चे पर बहुत तरस आयी । सुमन ने पूछा,"तुम्हारा नाम क्या है?"

"छोटू ",बच्चे ने जवाब दिया।

सुमन ने पूछा - "अगर मैं तुमको चप्पल दिलाऊं तो तुम पहनोगे?

बच्चे ने खुशी से जवाब दिया, "हां, दीदी!जरूर पहनेंगे। "

 इतनी देर में उसकी बड़ी बहन वहां से आती दिखी।

 "अरे! छोटू तुम अभी तक यहीं हो?" बहन ने पूछा।

 "हां, मीनू दी! दीदी मुझे चप्पल दिलाएंगी",छोटू ने जवाब दिया।

 "अच्छा!"मीनू खुशी से बोली।

 तभी सुमन की निगाह लड़की के पैरों पर गई। उसके पास भी चप्पल नहीं थी।

सुमन ने कहा - "चलो ,मैं तुम दोनों को चप्पल दिला दूं। "

"छोटू तुम्हारा घर कहां है ?",सुमन ने पूछा।

"यही पास में हमारी झोपडी है। "छोटू ने बताया।

 "चलो पहले हम तुम्हारे घर चलें। " सुमन ने कहा।

" चलिए दीदी" - बच्चे खुशी से बोले।

 थोड़ी ही दूर पर बच्चों की झोपडी थी जिस पर तिरपाल पड़ा हुआ था । छोटू ने अपने माता पिता से सुमन को मिलवाया। "दीदी हमारी मदद करने आईं हैं,"छोटू ने अपनी मां से कहा।

सुमन गौर से झोपडी को देख रही थी यहां गरीबी के अलावा कुछ भी नहीं था। इस परिवार में 7 सदस्य थे । माता पिता और पांच बच्चे। उनके पास ना खाने को कुछ ढंग का था और ना ही पहनने को। ये सब देखकर सुमन की आंखें नम हो गई। सुमन ने माता जी से कहा, " मैं आप सब की कुछ मदद करना चाहती हूं।

"धन्यवाद बहनजी! ईश्वर आपको हमेशा खुश रखें। "माताजी भावुक होकर बोली। "क्या आपने बच्चों का नाम स्कूल में लिखवाया हैं?",सुमन ने पूछा।

"नहीं ,बहनजी। बच्चे जब काम करते हैं तभी घर चलता है। इसलिए बच्चों का नाम स्कूल में नहीं लिखवाया। "माताजी ने जवाब दिया।

सुमन ने छोटू की मां को समझाया,"बच्चों का नामांकन स्कूल में अवश्य करा दें । वहां निशुल्क शिक्षा और किताबें मिलेंगी। ड्रेस, जूता ,मोज़ा और कॉपी का पैसा खाते में आ जाएगा। दिन में ताज़ा और गर्मा-गर्म भोजन भी बच्चों को मिलेगा। फल, दूध और पूरक आहार भी मिलेगा । बच्चे जब पढ़ेंगे तभी ये कुछ बन पाएंगे और तभी आपकी गरीबी दूर होगी।

अभिभावक को बात समझ में आ गई।

सुमन ने पास के ही एक प्राथमिक विद्यालय में बच्चों का नामांकन करा दिया ।

उनके लिए कपड़े और चप्पल खरीद कर ले आई और महीने भर का राशन भी रख दिया । माता पिता ने सुमन का बहुत आभार व्यक्त किया और बहुत ढेर सारी दुआएं भी दी। बच्चों के चेहरे भी खुशी से खिल उठे।

शिक्षा - हमें हमेशा लोगो को शिक्षा के प्रति जागरूक करना चाहिए और दूसरों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।  



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