हिम्मत
हिम्मत
"सुनो ये मुझे छोड़ कर जा रहे हैं, कोई फ्लेट देख लिया किराये से वहीं पन्द्रह को शिफ्ट हो रहे हैं।" शिखा ने मुझे सुबह सुबह फोन पर बताया।
उसकी आवाज में डर समाया था।
"अरे-तुम अब स्वतंत्र हो गई, मज़े करो यार, घर खर्च के महीने के पचास हज़ार से कम मत लेना।" मैंने बात को हल्के में लिया।
"नहीं, ये सीरियस है। मुझे बहुत चिंता हो रही है लोग क्या सोचेंगे। बेटियों के ससुराल वाले क्या कहेंगे।" उसकी आवाज में कम्पन था।
मैं शिखा को बचपन से जानती थी। सीधी,सरल स्वभाव की,गुड़िया सी पर पति उससे एकदम उलट मिले। रुप रंग तो ईश्वर की देन मान ले पर स्वभाव बिल्कुल दुर्वासा। शिखा से एक एक पैसे का हिसाब लेना, घरवालों के सामने उसे अपमानित करना। जब कभी मैं उसके घर गई उसके चेहरा गवाह होता कि पति देव ने उस पर अपना हाथ छोड़ा है। उसने सहन किया बच्चों के खातिर परिवार की खातिर और समाजिक मर्यादा खातिर।
"तुम परेशान मत हो, अभी दस दिन है। देखते हैं, अब तुम उनका कोई काम नहीं करना। न ही किसी तरह की हिंसा बर्दाश्त करना।"
शिखा ने मेरी बात का जवाब न देकर फोन रख दिया। शिखा की परेशानी से मैं भी परेशान थी कि पन्द्रह तारीख से दो दिन पहिले उसका फोन आया।
आवाज में आत्म बल के साथ आश्चर्य भी था बोली- "मैंने पिछले कई दिनों से न इनके कपड़े साफ किये, न ही खाना परोसा। बस इसी बात पर जोर जोर से चिल्लाने लगे। घर में काम वाली बाई भी थी। जैसे ही मारने के लिये हाथ उठाया मैंने इनका हाथ पकड़ लिया और कहा- बस अब और नहीं।आप जहाँ जाना चाहते है जाइये।
सोलह तारीख को मैनें ही उसे फोन किया- "तुम्हारे श्रीमान शिफ्ट हो गये ?
"नहीं बाहर अखबार पढ़ रहे हैं।"
"निश्चिंत रहो, कहीं नहीं जायेंगे वो। जिन्दगी भर तुम डरती रही, वो तुम्हें डराते रहे।"
"काश ये हिम्मत मैंने पहिले कर ली होती।"आत्मविश्वास के साथ शिखा बोली।
