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Archana Saxena

Thriller


4.5  

Archana Saxena

Thriller


गुत्थी सुलझ गयी

गुत्थी सुलझ गयी

11 mins 625 11 mins 625

पुलिस जब मौका ए वारदात पर पहुँची तो हाउस नम्बर तेरह के आगे भीड़ लगी थी। लोहे का बड़ा सा दरवाजा बन्द था पर उसमें बना छोटा सा गेट खुला हुआ था। सुबह दूध वाले ने आकर वहीं बाहर लगी घंटी बहुत देर तक बजाई थी परन्तु जब दरवाजा नहीं खुला तो वह छोटे गेट से अन्दर बरामदे तक आ गया था। एक घंटी वहाँ भी थी। दूधवाले ने वह भी बजाई पर अन्दर से कोई आवाज नहीं आई तो उसने ड्राइंग रूम के अन्दर परदे की झिरी में से झाँकने की कोशिश की। और कोई दिन होता तो वह बाहर से ही वापस लौट चुका होता परन्तु कल घर के मालिक ने खुद बाहर आकर सात लीटर दूध का ऑर्डर दिया था और कहा था कि बहुत मेहमान आयेंगे तो ज्यादा दूध की आवश्यकता होगी।

 अन्दर झाँकने में सफल रहा वह, पर नजारा दिल दहलाने वाला था अन्दर का।

साहब कुर्सी पर पैर भी ऊपर रख कर थर थर काँपते ऐसे बैठे थे जैसे होशोहवास खो चुके हों। और मेमसाब नीचे जमीन पर पड़ी थीं। उनके शरीर में कोई हलचल नहीं थी। शायद वह जीवित ही नहीं थीं। दूधवाला फौरन छोटे गेट से बाहर निकल आया। उसने पड़ोस वाले शर्मा जी के घर की घंटी बजा कर उन्हें वस्तु स्थिति से अवगत करवाया। उन्होंने बिना आवाज लगाये झाँक कर देखा, दूधवाला सच बोल रहा था। फौरन कुछ पड़ोसियों को एकत्रित करके शर्मा जी ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस के आने तक तो वहाँ भारी भीड़ एकत्रित हो चुकी थी।

पुलिस के अन्दर जाकर दरवाजा जोर जोर से पीटने पर कुछ ही मिनटों में दरवाजा खुल गया। पुलिस की पूछताछ में जो सामने आया वह इस प्रकार था कि  छः महीने पूर्व ही उमेश और रीमा इस घर को खरीद कर इसमें रहने आये थे। उनके विवाह को चार वर्ष हुये थे और अभी कोई सन्तान नहीं थी। दोनों ही पड़ोस में किसी से बात नहीं करते थे। पड़ोसियों ने प्रारंभ में घनिष्ठता बढ़ाने का प्रयास किया भी परन्तु रूखी सी मुस्कान के अतिरिक्त कोई उत्तर नहीं मिला तो सामने पड़ने पर औपचारिक हाय हलो के अतिरिक्त किसी से बात नहीं होती थी।

यह मकान दो बरस तक बन्द रहा था, उससे पहले जो परिवार यहाँ रहता था उनकी युवा बेटी ने आत्महत्या कर ली थी यहीं एक कमरे में। उसके बाद वह परिवार यहाँ से कहीं और चला गया था। अतः कोई इस मकान को खरीदना नहीं चाहता था। ऐसे में उमेश को यह कम दामों में मिल गया था और उसने इसे खरीद लिया।

पड़ोसियों के अनुसार पति पत्नी के सम्बन्ध मधुर नहीं थे। लड़ाई झगड़े की आवाजें अक्सर ही वहाँ से आया करती थीं।

रीमा की मृत्यु के बारे में उमेश ठीक से कोई जबाव नहीं दे पा रहा था। उसके गले में निशान थे जिससे पता चल रहा था कि किसी कपड़े से गला घोंटकर मारा गया है परन्तु कपड़ा गायब था। उमेश के अनुसार जब वह सुबह करीब साढ़े पाँच बजे पानी पीने उठा था तो उसने रीमा को इसी तरह पड़े देखा। उसने हिलाया डुलाया तब समझ में आया कि वह नहीं रही। पुलिस के द्वारा पूछने पर कि मेहमान कौन से आने वाले थे उमेश का जवाब था 

"दूधवाले से ऐसा बोलने के लिए रीमा ने कहा था। वह कोई सरप्राइज देना चाहती थी।" 

जैसे ही सूचना मिली दोनो के परिवार भी वहाँ पहुँच गये। रीमा के घरवाले उमेश को कोस रहे थे। उमेश के घरवाले मानने को तैयार ही नहीं थे कि वह ऐसा कर सकता है। शक की सुइयाँ हालांकि उमेश की ओर ही जा रही थीं। केस जल्दी ही सी आई डी के सुपुर्द कर दिया गया।

राजन एक जाना माना नाम था , इस तरह के उलझे हुये केस की तह तक पहुँचने में उसी की मदद ली जाती थी।

जबसे केस उसके हाथ में आया, लोग केस सुलझने की उम्मीद करने लगे थे।

जब रीमा की डायरी राजन के हाथ लगी उमेश और भी फँसता नजर आया। क्योंकि उसमें रोजाना के झगड़ों का जिक्र था। कहीं रीमा ने आत्महत्या की बात लिखी थी तो कहीं कुछ और ऐसा ही। हत्या से दो दिन पहले तो उसने उमेश से जान का खतरा ही लिख दिया था। आखिरी पेज पर जब राजन ने यह पढ़ा कि 'उमेश ने सात लीटर दूध क्यों बोला दूधवाले को? क्या मेरे क्रियाकर्म पर लोग इकट्ठे होने वाले हैं?'

उसका माथा ठनका। अब शक की गुंजाइश कहाँ बची थी?

उमेश से सख्ती से पूछताछ की गयी परन्तु उसका कहना यही था कि ऐसा बोलने को रीमा ने कहा था।

पूछताछ में यह भी सामने आया कि घर में कई दफा अजीब अजीब आवाजें भी सुनाई देती थीं जिससे रीमा बहुत डर जाती थी। उसे किसी आत्मा के साये की आशंका भी होती थी घर में। उमेश ने बताया कि आवाजें तो उसने खुद भी सुनी थीं। पर इस बात पर राजन को यकीन नहीं हुआ उसने पूछा

    "रीमा डायरी में हर बात लिखती थी तो यह क्यों नहीं लिखा उसने"

  "पर रीमा को मैंने कभी डायरी लिखते देखा ही नहीं। वह डायरी लिखती थी यह तो मैं आपसे सुन रहा हूँ।" उमेश हैरानी से बोला।

राजन ने डायरी निकाल कर दिखाई। डायरी पिछले छः महीने से लिखी जा रही थी, मतलब इस घर में आने के बाद से।

जब उमेश ने डायरी देखी तो उसे रीमा की मानने से ही इंकार कर दिया। उसके अनुसार वह रीमा की हैंड राइटिंग थी ही नहीं। एकबार तो राजन चकराया फिर उसने रीमा की हैंडराइटिंग दिखाने के लिए कहा। उस डायरी के अतिरिक्त घर में रीमा के हाथ से लिखा हुआ कुछ नहीं मिला। उमेश ने कहा

    "वह सारे काम लैपटॉप और मोबाइल फोन पर करती थी। मैंने उसे घर पर कुछ लिखते कभी नहीं देखा।"

"फिर तुम कैसे ये दावा कर सकते हो कि राइटिंग उसकी है या नहीं?" राजन ने पूछा

 क्योंकि शादी से पहले उसने कुछ पत्र मुझे लिखे थे। और एक बार हमारी जोरदार लड़ाई हुयी तो गुस्से में खुद ही सब फाड़ डाले।" 

राजन ध्यान से उसके चेहरे को पढ़ता रहा। राइटिंग रीमा की है या नहीं ये साबित करना मुश्किल नहीं था उसके लिये पर उमेश जो कह रहा था उसमें क्या थोड़ी सी भी सच्चाई है? 

उमेश ने आगे कहा "और इस डायरी से तो ऐसा लगता है कि हमारे रिश्ते बेहद खराब थे। जबकि ऐसा नहीं है, हम लड़ते बेशक बहुत थे पर प्यार करते थे एक दूसरे से।

और यह राइटिंग भी मैंने कहीं तो देखी है। पर मुझे कुछ याद नहीं आ रहा"

उमेश ने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा।

रीमा की माँ को भी डायरी दिखाई गयी तो उन्होंने भी राइटिंग रीमा की होने से इनकार किया। आगे की पूछताछ में रीमा की माँ से पता चला कि रीमा की एक गहरी दोस्त थी जो अक्सर उससे मिलने आती थी और रीमा उससे बहुत प्रभावित थी। उसका नाम रूही था। पर रीमा का फोन खँगालने पर पता चला उस नाम से मोबाइल में कोई नम्बर सेव नहीं था। उमेश को उसके बारे में कुछ खास जानकारी ही नहीं थी। सिर्फ इतना ही पता था कि कुछ महीने पहले उसकी दोस्ती रूही नाम की किसी लड़की से हुयी थी। और वह दोनों अक्सर मिलती जुलती थीं। परन्तु उमेश की उपस्थिति में वह कभी नहीं आयी। उमेश ने उसका फोटो तक नहीं देखा था कभी। न उसने कभी देखने की इच्छा जाहिर की और न रीमा ने स्वयं ही दिखाया। हाँ यह अवश्य बताया था कि बाकी लड़कियों से बहुत अलग है रूही। उसे फोटो खींचना खिंचवाना पसन्द नहीं था। उमेश का घर पुराने बसे हुये मोहल्ले में था। दिन के समय यहाँ कोई गार्ड भी नहीं होता था। हाँ रात को अवश्य ही एक चौकीदार डंडा फटकारते हुये कभी कभी गली में चक्कर लगा लेता था। परन्तु पूछताछ में वह कुछ नहीं बता सका। सीसीटीवी कैमरा भी घर के सामने नहीं था। गली के कैमरे में देर रात कोई आता जाता दिखाई दिया भी नहीं फुटेज में।

शक बार बार उमेश पर ही जा रहा था सबका। पर रूही को ढूँढना भी जरूरी था। आखिर खास सहेली थी तो आई क्यों नहीं? खबर तो शहर भर को हो चुकी थी, क्योंकि टीवी चैनलों पर प्रसारित हो रही थी। उमेश बार बार डायरी उठा कर लिखावट पहचानने का प्रयास करता। अचानक याद आया ऐसी राइटिंग तो रेशमा की भी थी। रेशमा उसकी पुरानी महिला मित्र थी। परन्तु वह निश्चित तौर पर यह बात नहीं कह सकता था। रेशमा से रिश्ता खत्म हुये पाँच साल हो गये। रीमा से बात पक्की होते ही उमेश ने रेशमा के पत्र और उससे जुड़ी हर निशानी मिटा दी थी। पर उसकी मोती जैसी खूबसूरत लिखावट उसे रह रह कर आज याद आ रही थी जोकि डायरी वाली लिखावट से हूबहू मिलती थी। जब शक गहराया तो उसने राजन को बताना उचित समझा। 

राजन को जैसे ही एक दिशा मिली उसने फिर से सीसीटीवी फुटेज उमेश को दिखाई। शाम के करीब पाँच बजे एक लड़की गली में दिखी हाँलाकि उसने अपना चेहरा काफी हद तक ढक रखा था पर चालढाल से उमेश को वह रेशमा ही लगी। सामने वाली पड़ोसन ने भी पूछताछ में बताया कि उन्होंने कल तो किसी को आते नहीं देखा था पर यह फुटेज वाली लड़की ही अक्सर रीमा के पास आती थी। 

रेशमा अब कहाँ है उमेश को कुछ पता नहीं था। परन्तु उसके बारे में बाकी सब कुछ उसने राजन को बताया। करीब छः बरस पहले उसकी मुलाकात रेशमा से हुयी थी। उसका बिंदास स्वभाव उमेश को भा गया। धीरे धीरे दोस्ती बढ़ कर प्यार में बदल गयी।  उमेश ने उसे जीवनसंगिनी बनाने का फैसला भी कर लिया था कि कुछ विश्वसनीय सूत्रों से पता चला कि रेशमा सही लड़की नहीं है। उसका उठना बैठना आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के साथ है और वह स्वयं भी छोटी मोटी वारदात में लिप्त रहती है। दिल टूट गया उमेश का। उसने फौरन रिश्ता समाप्त करने का फैसला किया। रेशमा ने बहुत मनाया, बहुत समझाया। खुद को बदलने की बात भी की पर उमेश दृढ़ निश्चय कर चुका था। कुछ दिन बाद घर वालों ने ही उसके लिए रीमा को चुना था। छः महीने रिश्ता तय रहा। इस दौरान ही रीमा ने उमेश को कई पत्र लिखे। शादी के बाद रेशमा के बारे में उमेश ने रीमा को कुछ नहीं बताया था और उनके बीच सब ठीक था। रीमा को ही किसी ने इस सस्ते दामों में मिलने वाले घर के बारे में बताया था और उमेश ने इसे खरीद लिया। पता नहीं कैसे उसे रेशमा के बारे में भी पता चला और तबसे झगड़े शुरू हो गये।

यहाँ शिफ्ट होने से पहले रीमा अधिक मिलनसार भी थी और पिछले पड़ोस में उसके रिश्ते भी लोगों से अच्छे थे। उमेश थोड़ा संकोची था और शुरू से ही ज्यादा दोस्त नहीं बनाता था। परन्तु यहाँ आकर रीमा ने पड़ोसियों से रिश्ते नहीं बनाए। बस उसका सारा ध्यान रूही की तरफ था। शायद उसी ने उसको ज्यादा दोस्त न बनाने की सलाह दी हो।

 रेशमा का आपराधिक रिकॉर्ड होने की वजह से राजन को उस तक पहुँचने में अधिक वक्त नहीं लगा। पड़ोसियों ने रीमा की सहेली के रूप में उसकी पहचान भी कर ली। जब पूछताछ की गई तो सारी साजिश की जिम्मेदार वही निकली। इस सब के पीछे उमेश से बदला लेना ही मकसद था।

पिछले चार बरसों में उसका सारा ध्यान उमेश और रीमा की हर गतिविधि पर रहा। तीन साल तक वह खामोशी से रही लेकिन पिछले एक साल में उसने रीमा से जान पहचान करके दोस्ती गाँठी। यह मकान भी उसीने दिलवाया क्योंकि वह ऐसी जगह उन्हें रखना चाहती थी जहाँ सुरक्षा व्यवस्था उतनी अच्छी न हो। रीमा को ऐसी पट्टी पढ़ाई कि उसने किसी और से दोस्ती ही नहीं की। रूही बन कर रेशमा और उमेश के रिश्ते के बारे में नमक मिर्च लगा कर खूब भड़काया और बताया कि रेशमा उसकी रूममेट थी कॉलेज में , और उमेश से मिले धोखे के बाद सब छोड़ छाड़ कर कहीं चली गयी। यहाँ तक कि उमेश द्वारा लिखी चिट्ठियाँ भी पढ़वा डालीं। रीमा उमेश की लिखावट पहचानती थी और उसके बाद ही गुस्से में उसने अपनी लिखी चिट्ठियाँ फाड़ डालीं या कह सकते हैं ऐसा करने के लिए भी रूही ने उकसाया क्योंकि वह रीमा की राइटिंग के सबूत मिटाना चाहती थी। उस घर में किसी की छाया होने का वहम भी पैदा किया। इसके लिए उसने कभी कभी रिकॉर्ड की हुयी साँसों की आवाज और कुछ अन्य आवाजें चलाने का इंतजाम किया। इस सिलसिले में वह उसकी मददगार भी बन रही थी। दूधवाला सात लीटर दूध इसलिये लाया था कि भूत भगाने के लिये घर में पूजा रखवाई गयी थी और उमेश के लिये ये पूजा सरप्राइज थी। सब कुछ योजनाबद्ध था। एकदिन पहले शाम को उमेश के घर पहुँचने से पहले वह प्रसाद के नाम पर नशीली खीर दे गयी थी और खाना खाने के बाद उमेश और रीमा ने वह खीर खायी थी। दोनों गहरी नींद सो गये। उस दिन वह घर में ही छुपी रही। रात को रीमा को खींच कर हॉल में ले आई जिससे उमेश की नींद न खुले। अपने ही दुपट्टे से उसका गला घोंटकर इत्मीनान से सारे सबूत मिटा डाले। मोबाइल फोन से नम्बर व मैसेज सभी कुछ डिलीट किया। रीमा की दराज में वो डायरी रखी। फिर बाहर आकर सुबह की प्रतीक्षा करने लगी। साढ़े पाँच बजे जब उमेश का नशा टूटा तो उसे प्यास लगी। रीमा बगल में नहीं थी। उसे लगा वाशरूम में होगी। पानी लेने वह बाहर आया तो उसकी चीख निकल गयी। उसने हिलाडुला कर देखा तो डरकर कुर्सी पर खुद को समेट कर बैठ गया। यह सब रेशमा ने बाहर से देखा था। जब रोशनी के साथ सड़क पर आवागमन शुरू हो गया तो चुपचाप छोटा गेट खोल कर निकल गयी।

उसने पूरी कोशिश की थी कि हत्या के इल्ज़ाम में उमेश फँस जाये और सजा पाये जिससे उसका बदला पूरा हो सके। पर ऐसा नहीं हो सका। बड़े से बड़ा अपराधी भी कोई सबूत छोड़ ही देता है वह तो फिर भी उतनी शातिर नहीं थी। उस पर राजन जैसा जासूस सामने था जिसने निर्दोष को सजा मिलने से बचा लिया।


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