गुप्तदान

गुप्तदान

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शहर में किराये का कमरा लेकर पढ़ने वाले उन दो नवयुवकों के कमरे से ठहाकों की आवाजें आ रही थी। "भाई..चल जल्दी से तैयार हो जा। कालेज के पास वाले विवाह स्थल में शादी है आज की दावत वहीं है।" - राहुल ने अपनी शर्ट पर इत्र डालते हुए कहा। "बस पाँच मिनिट रुक..मैं जरा बाल बना लूँ...वहाँ लड़कियाँ भी तो आयी होगी।"- एक आँख दबाते हुए रजत राहुल से बोला। और कुछ ही देर बाद पीतल पॉलिश करके चमकाये हुए वो दो सुनहरे चेहरे विवाह स्थल की चार-पाँच सौ की भीड़ में जाकर शामिल हो गये। हाथ में खाने की प्लेट लिये मैगी और पोहे खाने वाले दो बिन बुलाये मेहमान, अब चुन चुन कर व्यंजन खा रहे थे। पेट भरने की जल्दी में नयन प्यासे रह गये तो वो खा पीकर हाथ में आईस्क्रीम-कप लिए हुए महिलाओं के समूह की तरफ आ गये। मेजबान द्वारा तैनात क्षेत्ररक्षक ने क्षेत्र विशेष में आने पर टोका तो दोनों साइड में हो गये। सहसा पीछे किसी के फुसफुसाने की आवाज आयी तो फोकट का मनोरंजन जानकर दोनों उधर मुड़े। वहाँ खड़े बुजुर्ग दम्पति उम्मीद से ज्यादा भीड़ आने की वजह से खाना कम पड़ने की समस्या से चिंतित होकर बतिया रहे थे। अपने समधी के कहने पर उन्होंने इतना बड़ा विवाह स्थल बुक तो कर लिया पर अब इस समस्या से रोआँसे थे। उनकी रोनी सूरत देखकर दोनों पलटकर अंदर आ आये। कुछ सोचकर दोनों ने पर्स निकालकर रुपये गिने। कुल रकम जोड़कर पन्द्रह सौ हुई तो उसमें से ग्यारह सौ रुपये दरवाजे के पास बैग लेकर बैठे व्यक्ति को देते हुए कहा "कन्यादान लिखिये।" "किस नाम से?"- कापी सँभालते हुए व्यक्ति ने पूछा। "जी, गुप्तदान.." बोलते हुए तेज कदमों से दोनों विवाह स्थल से बाहर आ गये।

 


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