एकता का विचार
एकता का विचार
फिर एक रात गयी फिर से एक नया सवेरा आ ही जायेगा, ये सोचकर एक छोटा सा लड़का अपनी किस्मत को कितना कोसे ?
जब तक उसके साथ कोई अपना उसके बगल नही खड़ा होता, उसका अर्द्ध विकसित दिमाग कितनी दूरी तक सोच सकता है ?
ऐसा कुछ मैं कई सालों से देखता चला आ रहा हूँ, अमित नाम का किशोर अपने बिगड़े हुए भाइयों की बुरी आदतों की भेंट चढता जा रहा था।
उसके पिता को अपने बेटो की लड़ाई से ज्यादा अच्छा नरक चले जाना ही लगा। हालांकि उनको भी पता था कि अमित का जीना और भी मुश्किल बना देने वाला ये फैसला लेना आसान नही लेकिन जब आत्मा रोज़-रोज़ के शोषण से तंग आ जाए तो फिर उसको ऐसा कायरतापूर्ण और राहतदायक रास्ता ही सूझता है।
असल में बात ये थी कि मेरे गाँव के एक बूढ़े चाचा के चार बेटे थे राम, लक्षमण, भरत और अमित।
इन चारो में शुरू के तीनो एक दम काल थे।
शायद इन्ही करणों के चलते उन्होंने चौथे बेटे का नाम शत्रुघ्न नही रखा, और पारिवारिक क्लेश की सारी हदें पार कर चुका चाचा का घर हमेंशा से शोरगुल का केंद्र रहा।
बात शुरू हुई तब जब एक भाई अपनी पढ़ाई के लिए खेतों में आने से मना करने लगा, फिर क्या था वो नही आता तो मैं ही क्यों के नारे उनके घर में लगने लगे। क्रोध में आकर उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी तो एक ने सबसे बात करना।
दोनो एक दूसरे के शक्ल तक के दुश्मन बन चुके थे, रोज़ किसी ना किसी कारण किसी एक का तो भूखे पेट सोना तो तै रहता था।
एक दिन दोनो हाथापाई पर उतारू हो गए और बूढा बाप बीच में आया तो उसको ही माँ की मौत का कारण बता कर उसको धकियाने लगे। वो बेचारे चुप चाप सुनते रहे और कुछ देर बाद जाकर सो गए।
सुनते रहे लड़ते हुए भाइयों को जो कभी माँ को गाली देता तो कभी बाप को ही उसमे घसीटता।
स्थिति इतनी दयनीय बन चुकी थी कि घर से शांति का नामोनिशान मिट चुका था।
और इन सब बातों पर आँसू बहाने वाले अमित अपने तीसरे भाई के साथ रहता था, वो अपने भाइयों को एक देखना चाहता था, पर ऐसा क्या संभव था ?
इस बात का जवाब मिला तब जब गाँव का अमीर सेठ उनके खेतों पर कब्जा करने लगा।
लोग उसके नाम से डरते थे, उसने पैसों से अपना बल पूरे गाँव में स्थापित कर रखा था।
अब सारे भाइयों की कठिनाई ये थी की पहले कौन जाता उससे लड़ने ?
और ये भी की अगर किसी की प्रतीक्षा में बैठेंगे तो पूरे खेत चले जायेंगे। इसपर काम आया अमित का मासूम चेहरा और उसकी कोशिश उसने खुद ही सेठ से लड़ने की ठानी। वो चला गया सेठ पर अपने छोटे हाथों से वार करने और जैसा कि होने वाला था उसके पीछे सेठ डंडा लेकर पड़ गया। फिर क्या था अमित सबसे छोटा उसपर तो साभी भाइयों का प्यार उमड़ता था एक ज़माने में।
जब उन्होंने देखा कि उसकी चिकनी नँगी पीठ पर डंडे बरस रहे हैं तो किसी से रहा ना गया। सबने एक साथ सेठ को मारना शुरू कर दिया, इसी बीच अमित ने पुलिस को भी बुला लिया।
पुलिस आई और उनके सामने सभी ने जब एक ही सुर में उस सेठ की करतूतों का पर्दाफ़ाश किया तो उसकी एक ना चली, वो गया जेल की कोठरी में और जाते जाते छोड़ गया चारो को शर्मिंदगी से सिर झुकाए।
अमित ने फिर से दोनो के पैर पकड़े कि वो उनको मना सके लेकिन उन लोगों ने अपना मन पहले ही बादल दिया था। राम ने बचपन की बात दोहराई, "बचपन में हम एक आर एक को जोड़ ग्यारह बताते थे पर उसका असली नमूना तो अमित ने हमे दिखाया।"
लक्षमण ने कहा,"अरे भाई किसका है ? "
वहीं पर खड़े भरत और अमित साथ कितने दिनों बाद मुस्कुरा रहे थे,
ऐसा दृश्य कितने सालों बाद देख मुझे तो अत्यंत हर्ष हुआ आशा है आसमान में चाचा को भी हुआ होगा।
