एक विडंबना
एक विडंबना
वो तारीख थी 03.04.2018 जब मुझे कक्षा 9 में हिंदी या संस्कृत चुनना था एक तरफ हिंदी जो मेरे जुबान पे हमेसा रहती
तो दूसरी तरफ संस्कृत जो मेरे मित्र चुन रहे थे ।
इन सबके बीच मैं सही निर्णय लेने में असमर्थ था और वक्त भी कम था दो घंटे सोच विचार करने के बाद आखिर मैने मित्रो को एक तरफ रखा और अपनी प्रतिभा को ही चुना।
हालांकि मेरे और भी मित्र दूसरे दोस्तो के कहने पर संस्कृत चुना
यह जानते हुए भी की उनकी प्रतिभा हिंदी में है।
मैन उन्हें बहुत समझाया परंतु वो न समझे । मै उनका रास्ता नही बदल सका पर वक्त रहते में ने अपना रास्ता बदला।
मैंने औपचारिक पत्र पर हस्ताक्षर किया और हिंदी का विद्यार्थी बन गया ।
मेरे सारे मित्र दुखी थे और कुछ तो मुझे धोखे बाज कह रहे थे
मैन कहा मित्रता से भविष्य निर्मित नही होता वर्तमान निर्मित
होता है और मैं वही चुनूंगा जो मेरे लिए सही है।
महीनों बीत गए परीक्षा का दिन भी आ गया परीक्षा हुई
और साल के अंत मे परिणाम भी आया ।
और यह क्या परीक्षा के परिणाम में मैं प्रथम स्थान था।
वही दूसरी तरफ जो मित्र दोस्तो के कहने पर अपने प्रतिभा के विरुद्ध विषय चुना था उनका परिणाम भयानक था क्यो की उन्होंने अपनी प्रतिभा मित्रो के कहने पर दबा दी ।
कभी कभी दिल की नही दिमाग की भी सुन लेना चाहिए यह
सिख मेरे दोस्तों ने सिख ली थी ।
