एक फैसला
एक फैसला
ऋषिता ने घर आते ही एक तरफ स्कूल बैग पटका और हाथ पकड़ कर अपनी माँ से बोली, "मम्मा...!यहाँ बैठिए मेरे पास मुझे आपसे ज़रूरी बात करनी है।” मिसेज कपूर को लगा कोई स्कूल का सीरियस मैटर होगा।
“बताओ क्या कहना है ?”
“आप पहले तसल्ली से मेरी बात सुनिये। आपको पापा से बात करनी पड़ेगी। मैं अपने सीनियर राघव के साथ कमिटेड हूँ, औऱ उसके ट्वेल्थ के एग्जाम होते ही शादी कर लूंगी।”
मिसेज कपूर के तो होश उड़ गए। “बेटा अभी तेरी उम्र क्या है शादी का मतलब मालूम है कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी होती है। राघव क्या कमाता है।”
“ अगर अपने मुझे मना किया तो मैं सुसाइड कर लूँगी।”
“कब से चल रहा है ये?” सब मिसेज कपूर ने पूछा
“चार साल से हम रिलेशनशिप में हैं।”
ओह मै इसे कम्बाइंड स्टडी औऱ एक दूसरे की हेल्प समझती रही। उन्होंने ऋषिता को घर से बाहर भी जाने को मना कर दिया।
शाम को पति के घर आने पर उन्होंने जब समस्या बताई तो ठीकरा उन्हीं के सिर फोड़ दिया गया कि तुम मां हो आखिर इतनी छूट क्यों दी कि ये नौबत आ गयी। प्रोफेसर चोपड़ा कभी नहीं मानेंगे। दोनों परेशान थे कि गलती हमसे हुई कहाँ।
अगर हमने कुछ कड़ा कदम उठाया तो बेटी से हाथ धोना पड़ेगा। एक ही बेटी है हमारी, उधर राघव भी अपने घर मे बग़ावत किये हुए था।
ऐसे में मिसेज कपूर और मिसेज चोपड़ा ने मिलने का फ़ैसला किया। देखिए दोनों बच्चे उम्र के नाज़ुक दौर में हैं, सख्ती से नही समझदारी से काम लेना पड़ेगा। सो तो है, उन्होंने बच्चों से बात करने का फ़ैसला किया।
कपूर परिवार और चोपड़ा परिवार डिनर पर मिले। ऋषिता और राघव भी साथ आये थे। बच्चों हमे तुम्हारी पसंद से आपत्ति नहीं है, शादी से भी कोई प्रॉब्लम नहीँ। पर एक बात हमारी भी माननी पड़ेगी।
“देखो राघव घर तो पैसे से ही चलता है इसलिए तुम्हें नौकरी ढूंढनी पड़ेगी क्योंकि मैं तुम्हारे डिसीजन में दखल नहीं दूंगा पर घर चलाने के लिए कमाना तो पड़ेगा ही।” मिस्टर कपूर ने कहा
"और ऋषिता तुम्हें भी एक साल तक घर के काम करने होंगे।”
“ पर मुझे तो कुछ नहीं आता।"
तो सीखो न प्रोफेसर चोपड़ा ने कहा, “लुमिनियस ऑब्जेक्ट के बारे मे दोनों जानते हो जो खुद ही रोशन हों। तो फिर खुद रोशन होने की आदत डालो, तुम्हें टेलर, ब्यूटीशियन, डॉक्टर, सोल्जर, रेस्त्रां सब कुछ ट्रेंड पसन्द है। तो खुद साल भर ट्रेंड होने की सोचो। पेरेंट्स के पैसों पर फ्यूचर मत सोचना। सुसाइड की बात भी मत सोचना। आप दोनों हमारे लिये मायने रखते हो। अब आइसक्रीम खाओ जाकर।”
“वाह भाईसाहब, आपने तो चुटकियों में समस्या हल कर दी।”
“ कपूर साहब ये टीनएजर बच्चे थोड़े प्यार औऱ बड़ों की समझदारी से रास्ते पर आते हैं। हम भी इनका घर से निकलना बन्द कर सकते है पर कहीं ऐसा न हो हमारी सख्ती हमें पछताने पर मजबूर कर दे”।
खैर बच्चों का भी शादी करने का बुखार चार महीने में ही उतरने लगा। जब न ऋषिता घर संभाल पाई और न राघव पॉकेट मनी जितना कमा पाया।
लेकिन ऋषिता और राघव अपना खुद का काम और पैसे कमाने और बचाने की महत्ता ज़रूर सीख गए ।आज दोनों अच्छे मित्र भी हैं। अच्छे पद पर नौकरी भी कर रहे हैं।
कभी कभी बढ़ते बच्चों के साथ निर्णय सख्ती से नही समझदारी से भी लेने पड़ते है। यही उम्र है जब उन्हें हमे आत्म निर्भर भी बनना सिखाना होगा ।
बुनियाद तो बचपन से ही डालनी पड़ती है। जब हमें सब कुछ परफेक्ट चाहिए तो बच्चों को परफैक्ट बनाने में कोताही क्यों ?
