एक दिन मेरे हिस्से भी
एक दिन मेरे हिस्से भी
"तुम्हारी बहू बहुत भली है भाभी! ज़रूर तुमने कोई पुण्य किए होगे जो इतनी आज्ञाकारी और सुगढ़ बहू मिली है!"विमला बुआ ने वृंदा की प्रशंसा करते हुए कहा।और... इधर...
"काश...मुझे कुछ सुकून के पल मिल जाएं तो मैं अपनी पसंद के गाने सुनूं और किताबें पढूं!"
वृंदा ने फिर से वही बात कहा जो वह अक्सर रविवार या किसी छुट्टी के दिन कहा करती थी कि,
"हम गृहिणियों का कभी कोई रविवार या छुट्टी का दिन ही नहीं होता। काश... हमें भी कभी दो तीन दिनों के लिए घर गृहस्थी के कामों से छुट्टी मिल सकती!"
और यह बात हमेशा पुष्पा जी और गिरधर जी को चुभ जाया करती थी।
पर आज बात कुछ और थी। आज सारा परिवार इकट्ठा हुआ था। गिरधर जी और उनकी पत्नी पुष्पा जी के साथ में उनकी बहन विमला भी आई हुई थी। और उन्होंने घर की बहू से जब ऐसा कहते हुए सुना तो उन्हें अपने दिन याद आ गए।
सच ...वह भी कितना तरस जाती थीं कि एक दिन छुट्टी का हमें भी मिलता।
विमला जी ने छूटते ही कहा,"बहू ऐसा क्यों कहती हो अब तो तुम्हारे बच्चे भी बड़े हो गए किसी दिन तुम भी छुट्टी कर दिया करो!"
गिरधर जी की बहन विमला जी का परिवार में बहुत मानदान था। तीन बेटों के बाद पैदा हुई बेटी तो वैसे ही खानदान में बहुत ही ज्यादा भाग्यशाली मानी जाती है। उसके ऊपर से उनका ब्याह बहुत ही नामी-गिरामी घराने में हुआ था। साल में एक तो चक्कर वह सीतापुर का लगा ही जाती थी। मायके का मोह किसी भी उम्र में कहां छूटता है भला। उन्हें अपने भाई भाभी से तो लगाव था ही , उनकी बहू वृंदा से भी वह बहुत स्नेह भाव रखती थीं। जब भी सीतापुर आतीं अपने भाई भाभी की खोज खबर के साथ वृंदा को भी गृहस्थी के कुछ न कुछ नए गुर सिखा जाती थी।
वृंदा भी विमला जी की बहुत इज्जत करती थी। क्योंकि स्वभाव से सौम्य और स्पष्टवादी विमला जी कभी भी उसके साथ सास वाला बर्ताव नहीं करती थी।
हां तो वृंदा ने तो अपने मन की बात कह दी कि,"काश मेरे हिस्से भी सुकून का पल आता!"
और इतना कहकर वृंदा ने नाश्ता परोसा और रसोई में चली गई। पर विमला जी थोड़ी देर के लिए सोच में डूब गई।
धीरे से अपनी भाभी पुष्पा से कहा,
"बहू सही कहती है भाभी! मुझे भी लगता है कि वह घर के काम से परेशान हो गई है। मैं जब भी आती हूं तब उसे काम करते ही देखती हूं। शायद वह मायके भी कम जाती है। फिर तो उसे कभी आराम नहीं मिलता होगा!"
पुष्पा जी को वृंदा का ऐसा कहना थोड़ा बुरा तो लगा आखिर वह सास थी। और एक तरह से अपनी ननद के सामने अपनी बहू से ऐसा सुनना उन्हें अच्छा तो नहीं लगा था। पर अब घर की बहू का साथ घर की बेटी दे रही थी तो ऐसे में उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा।
सामने से सिर्फ इतना ही कहा,
"आप सही कह रही हैं विमला जीजी! वैसे वृंदा को तो मायके में भी उसे आराम नहीं मिलता। उसकी भाभी थोड़ी कर्कश स्वभाव की है। और उसके माता पिता के देहांत के बाद भाई भी उसे कभी-कभी ही वृंदा से मिलने आता है। और दो साल से तो वृंदा मायके भी नहीं गई है!"
अब तक चुप गिरधारी जी भी बोल पड़े,"रमन की मां! अगर बहू का मन रुचता है तो रमन से कहकर दोनों को कुछ दिनों के लिए बाहर घूम आने के लिए कह दो। दोनों बच्चे अब इतने समझदार हो गए हैं कि अपना ख्याल रख सकते हैं। बाकी हमारी निगरानी में रहेंगे तो इन दोनों को भी घर की फिक्र नहीं रहेगी!"तो...यह प्रस्ताव सर्वसहमति से पास हो गया कि रमन के दफ्तर से आते ही इस बात को उसके समक्ष रखा जाएगा। और उसे कहा जाएगा कि शनिवार , इतवार के साथ और दो-तीन दिन और छुट्टी लेकर वह बहू को साथ लेकर कहीं घूम आए। तब तक उसके दोनों बच्चे चारु और चेतन दादा दादी के पास रह लेंगे। ऊपर से अभी विमला जीजी भी आई हुई है तो सबका मन लगा रहेगा।
उस रात रमन जब बाजार से आया तब खाना खाते हुए जानबूझकर विमला जीजी ने फिर से वृंदा की बात छेड़ी,"रमन ! तू कब से कहीं बाहर घूमने नहीं गया है?"
रोटी का कौर तोड़ते हुए रमन अचकचा गया कि बुआ यह क्या पूछ रही हैं। कौर मुंह में डालते हुए बोला,। "बुआ जी ! पिछले रविवार ही तो बच्चों को लेकर में म्यूजियम दिखाने ले गया था!"
विमला जीजी हंसने लगीं,
"अरे मैं तुम दोनों पति-पत्नी के बाहर घूमने की बात कर रही हूं!"
"दशहरा मेला में गए थे हम सपरिवार। अम्मा बाबूजी भी गए थे । सबसे पूछ कर देखो हम सब गए थे घूमने? "
अब विमला बुआ को रमन की इस मासूमियत पर प्यार भी आया और मन किया कि अपना सिर धुन लें।अब विमला बुआ खुलकर बात करने के अंदाज में बोली,"मैं कह रही थी कि,
तुम और वृंदा दो-चार दिन कर के लिए कहीं हो आओ। अभी मैं भी यहां पर हूं और दोनों बच्चों चारु और चेतन के लिए तो कुछ दिनों के लिए ज्यादा फिक्र करने की जरूरत नहीं है। दोनों बच्चे अब थोड़े समझदार हो चुके हैं। काफी दिनों से बहू कहीं गई नहीं है। और तुम दोनों को भी थोड़ा एक दूसरे के साथ एकांत मिल जाएगा। और बाहर जाओगे तो अच्छा लगेगा।"
"पर...बुआ, अभी ऑफिस में काम है। और कहां जाएं ये समझ नही आ रहा!"
"काम तो होता रहेगा।ना हो तो मैं तुम दोनों का भुवनेश्वर का टिकट करा देती हूं। पूरी, भुवनेश्वर , कोणार्क मंदिर देख आना। अभी कोरोना के बाद थोड़ी सावधानी बरतना। लेकिन घूम कर आओगे तो तुम दोनों को अच्छा लगेगा खासकर वृंदा बहू को थोड़ी घर के कामों से राहत मिलेगी!"
"क्या वृंदा , ने आपसे कहा है कि , "वह घर का काम करके थक जाती है!" रमन ने प्रश्न किया।
"अरे नहीं बेटा ? वह तो इतनी सीधी है कि अपनी जुबान से कभी नहीं कहेगी। मुझे लग रहा था काफी दिनों से वह थोड़ी थकी थकी रहती है। और शायद घर के काम से उब भी गई होगी !"
अब पुष्पा जी ने मुंह खोला और गिरधारी जी भी पत्नी की हां में हां मिलाकर बोले कि,
"वैसे तो बहू अक्सर कहती रहती है कि उसे भी घर ke कामों से फुरसत मिले तो वह भी कहीं घूम आए। बेटा रमन! तुम दोनों चार-पांच दिन के लिए कहीं हो आओ। बहू का मन भी लग जायेगा और उसकी शिकायत भी दूर हो जाएगी!"
रमन बचपन से अपने माता-पिता का आज्ञाकारी बेटा था। पुष्पा जी और गिरधर जी के तीन बच्चे थे। रमन के बाद उनकी बेटी पुनीता और उसके बाद अमन। अमन बेंगलुरु में अपनी पत्नी रुचिका के साथ रहता था।
रमन यहां सीतापुर में अपने माता पिता के साथ रहता था। सीतापुर जैसी छोटी जगह में घूमने के लिए कोई खास जगह नहीं थी। और वृंदा विवाह के बाद एक आध बार मायके के कुछ समारोह के अलावा कहीं गई भी नहीं थी।
उनके विवाह को लगभग चौदह साल हो गए थे। बारह साल की बेटी चारु और दस साल का बेटा चेतन। इन दोनों बच्चों की परवरिश में वृंदा इतनी व्यस्त रहती थी और फिर सास-ससुर की सेवा भी करती थी। घर का भी काम काज था। तीज त्यौहार नाते रिश्तेदार भी लगे रहते थे। जब तब ननद और देवर भी आ जाते तो वृंदा को अपने लिए तो बिल्कुल समय नहीं मिलता था। लेकिन उसने आज तक अपनी तरफ से कुछ नहीं कहा था। वह तो आज चाय के समय उसके मुंह से अचानक निकल गया कि आज रविवार था और सब अपनी पसंद पसंद थे नाश्ता बनाने कह रहे थे। तब उसे लगा कि," काश...! एक रविवार उसका भी होता काश उसे भी कभी घर गृहस्थी के काम से छुट्टी मिलती! "
वृंदा के मन की बात विमला जी ने सबसे पहले समझी थी। क्योंकि वह भी अपने ससुराल में इस बात से सालों परेशान रही थीं कि उन्हें कभी कहीं घर से बाहर जाने का अवसर नहीं मिलता था। और वह एक तरह से घर में रहकर वह ऊब चुकी थीं। अपनी जिंदगी से जब वह मिलान करने लगीं तब वृंदा के जीवन से बड़ा साम्य नजर आया। वह वृंदा के जीवन के उबाऊपन का और इस खालीपन का एहसास भलीभांति कर पा रही थीं।
तभी उन्होंने आज अपने भाई और भाभी को उनकी बहू और बेटे को कुछ दिनों के लिए बाहर जाने देने का आग्रह करते हुए भुवनेश्वर भेजने का प्रस्ताव रखा था।
उस रात पुष्पा जी भी अपने अतीत को याद कर रही थीं कि उनका भी कितनी बार मन करता था कि कहीं घूमने जाए। लेकिन घर गृहस्थी में उलझ कर वह भी नहीं जा पाती थीं। आज जब विमला जी ने वृंदा के मन की बात उनको समझाना चाहा तब उनको याद आया कि काश... उस समय जब वह जवान थीं और पति के साथ कुछ वक्त बाहर जाकर घूम फिर कर बिताना चाहती थीं। तब किसी ने उसे भी इस तरह घर से बाहर भेजने के लिए कोशिश की होती।
खैर...देर आए दुरुस्त आए ...!
कम से कम उनकी बहू को तो अपनी जिंदगी से शिकायत नहीं रहेगी। यही सोचकर पुष्पा जी ने अपने बेटे और बहू को पांच दिन के लिए भुवनेश्वर भेजने में बहुत ही ज्यादा उत्साह दिखाया और तैयारी कराकर उनको भेजा।
जाते हुए वृंदा के चेहरे की खुशी और दो दोनों पति पत्नि के एक दूसरे के साथ रहने का ललक तो रमन के चेहरे पर भी देख रही थी। एक तरह से इन बुजुर्गों के लिए यह एक बहुत बड़ी खुशी की बात थी कि उनकी आगे की पीढ़ी को वह वह खुशी दे पा रहे थे जो खुशी उन्हें नहीं मिल पाई थी। यह एक ऐसा बदलाव था जिसमें पूरे परिवार की खुशी थी । अब पुष्पा जी ने और गिरधर जी ने एक संकल्प लिया था कि...
साल में एक बार वह अपने बेटा और बहू को बाहर घूमने जरूर भेजेंगे । वहां से खिली खिली जब बहू आएगी तो घर गृहस्थी में उसका मन पहले से ज्यादा लगेगा।
और साथ ही एक और संकल्प लिया कि ...
साल में एक बार बार सपरिवार भी घूमने जाएंगे। भले ही एक या दो दिन के लिए ही सही। जहां घर गृहस्थी के झंझट से मुक्त होकर सब एक दूसरे के साथ प्रेम भरे कुछ पल बिता पाएंगे। जो उनकी जिंदगी में कुछ रंगीनी लाएंगे । और उन पलों की याद में उनका जीवन पहले से कुछ ज्यादा खुशहाल हो जाएगा।
अक्सर रोजमर्रा की जिंदगी में गृहिणियां कहीं बाहर नहीं जा पातीं। और लोग इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि उन्हें छुट्टी क्यों चाहिए। दिन भर तो वह आराम करती हैं ...यह सुन सुनकर हर गृहिणी शायद अपने आपको ऐसा ही समझने लग जाती है लेकिन उन्हें भी हक है छुट्टी का उन्हें भी हक है अपने आप को कुछ वक्त अकेले रहने देने का। तो आप भी यह कदम उठाइए और अपने परिवार को चार-पांच दिनों के लिए घर गृहस्थी झंझट से दूर छुट्टी बिताने दीजिए।
