एक और एक ग्यारह होते हैं

एक और एक ग्यारह होते हैं

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कलवा की बीवी गुलाबो को हंमेशा शिकायत रहती थी की ओरों के मुकाबले कलवा उसे वो सब सुख सुविधा नहीं देता जो ओर सारे मर्द अपनी बीवी को देते है।

आसपास की औरतों को देख जलती रहती ओर कलवा को तानों के बाण से बींधती रहती, कलवा बड़े व्यापारी से सब्जियां खरीदकर घर-घर जाकर बेचता हर सब्जी पर एक दो रुपया मिलता शाम तक अस्सी रुपैये मुश्किल से मिलते उसमें क्या गुलाबों को एश कराता। 

आसपास की औरतें खुद भी कोई ना कोई काम करती थी कोई खेतों में, कोई मंडी में, तो कोई बड़े साहुकार के यहाँ खाना बर्तन वगैरह करके अपने पतियों की मदद करती थी जब दोनों कामकाज में एक दूसरे का हाथ बँटाते थे तब जाकर अपनी हैसियत के अनुसार ऐशो आराम से हंसी खुशी ज़िंदगी जीते थे। यहाँ गुलाबो की प्रकृति आलसी थी वो बस घर का थोड़ा बहुत काम करके पड़ी रहती थी अकेले कलवा की आमदनी पर चलता था जो की इतनी नहीं थी की गुलाबों के शौक़ पाल सके। 

एक दिन पडोसी चंदा गुलाबों के पास एसे ही हालचाल पूछने आ गई बातों बातों में गुलाबों कलवा की बुराई करने लगी की ओर सारे मर्द अपनी बीवी को कैसे रखते है ओर एक ये है जो मेरा एक भी शौक़ पूरा नहीं करते।

 तभी चंदा ने गुलाबों को असलियत बताई की यहाँ की लगभग सारी औरतें कोई ना कोई काम करती है तभी सब खुशहाली से रहते है अगर आप में कोई हुनर है तो आप भी कोई काम शुरू करके भैया की मदद कर सकती है चार पैसे ज़्यादा आएँगे तो आप भी सारे शौक़ पूरे कर सकती है बाकी गाँव में तो कोई पढ़ा लिखा अमलदार तो है नहीं की लाखों कमाता हो ओर ऐशो आराम से रहता हो।

गुलाबों को चंदा की बात हलक के नीचे उतर गई, 

गुलाबों खाना बनाने में माहिर थी ओर उसे ये काम पसंद भी था तो बस ठान लिया अब कुछ भी करके ज़्यादा पैसे कमा कर कलवा की मदद भी करनी है ओर खुद के सपने भी पूरे करने है।

ग्रामीण बैंक से छोटी सी लोन लेकर गुलाबो ने घर पर ही मैश खोल दिया धीरे-धीरे गुलाबो के खाने के चर्चे आसपास के गाँव तक पहुँचने लगे, फिर तो एक दो नौकर रखकर टिफ़िन पहुँचाने की व्यवस्था भी कर दी जहाँ से आर्डर मिलता वहाँ पहुँचा देती एक साल में तो लोन भी भरपाई कर दी ओर पैसे भी बचने लगे, अब गुलाबो खुश थी।

कलवा ने भी अब घर-घर जाकर सब्जी बेचना बंद कर दिया ओर गुलाबो के काम में ही हाथ बँटाने लगा दोनों की मेहनत रंग लाई ओर आज दोनों ऐशो आराम से हंसी खुशी ज़िंदगी बिता रहे हैं ओर गुलाबो जब कभी किसीके सामने अपने संघर्ष की बात करती है तब ये जरूर कहती है की, एक ओर एक मिलाकर दो नहीं होते एक ओर एक ग्यारह होते हैं।


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