एहसास
एहसास
अमावस की रात्रि में चारों और अंधेरा छाया हुआ था, इस अंधेरे को चीरती हुई रेलगाड़ी एक छोटे से स्टेशन पर रुकी। कुछ यात्री रेल के डिब्बे से उतर गए कुछ नए मुसाफिर आ कर खाली सीट पर बैठ गए। कुछ देर बाद छुक छुक करती गाड़ी अपनी मंजिल की ओर चल पड़ी। बहुत से मुसाफिर नींद के आगोश में चले गए थे। मेरे सामने की ऊपर और नीचे की सीट खाली थी, तभी टी टी ने अधेड़ उम्र के पति पत्नी को बैठने के लिए कहा शायद वो जल्दी में गलत डिब्बे में चढ़ गए थे। थोड़ी देर बाद उन्होंने खाना खाया और सोने की तैयारी में लग गए। पत्नी ऊपर की सीट पर लेट गई और वो जनाब समय काटने के लिए मुझसे बातें करने लगे।
मैंने उन्हें अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं एक राइटर हूं, लिखना मेरी हॉबी है। बचपन से लिखने का शौक था, आसपास होने वाली घटनाओं को शब्दों का रूप देकर मन को तसल्ली होती है
उस सज्जन ने बताया कि वो एक लाइब्रेरियन हैं। उनके दोनों बेटों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की और विदेश में अपने बीवी बच्चों के साथ रहते हैं। कभी कभी उनके पास चले जाते हैं। पर हमारा दिल वहां नहीं लगता। हमें तो इस उम्र के पड़ाव में अपने घर ही रहना है। बातों बातों में पता चला कि वो अब घर वार बेच कर किसी वृद्ध आश्रम में दो कमरे का सेट खरीद कर रहने लगे हैं। कम से कम हम - उम्र लोगों के साथ हंसी - खुशी में वक्त गुजरेगा दुख- सुख में उनका साथ रहेगा। "
जीवन जीने की सोच का यह पहलू मुझे बहुत अच्छा लगा। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने एक बार मौत को करीब से देखा था। "बहुत साल पहले जब वो शिमला घूमने गए थे तो एक सुरंग में फंस गए थे। वो रेलवे ट्रैक के साथ - साथ चलते हुए एक सुरंग के पास थे मन में इच्छा हुई कि अंदर जाकर देखा जाए। सुरंग काफी लंबी थी। अभी वो बीच रास्ते में थे कि उन्हें गाड़ी के इंजन की सीटी सुनाई दी। अब न वो आगे जा सकते थे न पीछे। दोनों पति पत्नी घबरा गए । आखिर दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा, आंखें बंद करके, सुरंग की दीवार की ओर मुंह करके दीवार से चिपक कर खड़े हो गए। जैसे - जैसे इंजन सुरंग में आया उन्हें लगा कि मौत उनके सामने खड़ी है। धड़कन मुंह से बाहर आने को थी । जब ट्रेन निकल गई तो सांस में सांस आई। "
सफर अभी भी लंबा था सो समय बिताने के लिए मैंने भी उन्हें एक किस्सा सुनाया जब मौत को करीब से देखा था। हुआ यह था "एक बार किसी काम से मुझे दूर के पहाड़ी गांव जाना था। मैंने जो ट्रेन ली वो पहाड़ के स्टेशन पर शाम के सात बजे पहुंचती थी, तकनीकी खराबी की वजह से ट्रेन छह घंटे देरी से स्टेशन पर पहुंच गई। यह एक छोटा सा स्टेशन था। इंसान के नाम पर, स्टेशन मास्टर और मैं ही था। स्टेशन मास्टर ने मुझे सलाह दी कि दिन निकलने तक मैं उसके पास ही रुक जाऊं। उसने बताया भी था कि स्टेशन और गांव के बीच जो घुमावदार पहाड़ी रास्ता है वहां रात को कुछ आत्माएं घूमती हैं, नाम से पुकारती हैं , ऐसा यहां के लोग कहते हैं कि जो भी पीछे मुड़ कर देखता और उनकी बात का जवाब देता है वो जिन्दा नहीं बचता।
मैंने स्टेशनमास्टर को कहा कि मैं इन भूत प्रेत में विश्वास नहीं रखता। कोई भूत नहीं होते यह अपने दिल का वहम है और इसके साथ ही मैं वहां से चल दिया। रात का एक बजा होगा चारों ओर घना अंधेरा था, रास्ते में एक पुल से गुजरते हुए जैसे ही पहाड़ी चढ़ने लगा तो मुझे लगा कि कोई मुझे मेरा नाम लेकर पुकारने लगा कि "रुको मैं भी आ रहा हूं, मुझे याद आया कि यह जरूर कोई आत्मा होगी तीन बार बुलाने पर अगर कोई नहीं बोलता या रुकता तो आत्मा कुछ नहीं कहती "मुझे लगा कि कोई मेरे साथ चल रहा है , कभी पीछे से आवाजें लगा रहा है, मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा । एक बार तो लगा कि मेरी मौत मेरे सामने है। मैं अपने दिल में हनुमान चालीसा पढ़ते हुए चलता रहा। कुछ देर बाद मैं पहाड़ी के दूसरी ओर ढलान पर था यहां से मुझे गांव के खंबे की लाइटें दिखाईं दी तब जान में जान आई। " मेरी बात सुन कर वो बोले सच है आप जो कह रहे हो कि मौत के मुंह से बच कर आए।
सुबह होने वाली थी। मैंने सामने की सीट की ओर देखा वहां कोई नहीं था। सोचा रास्ते में किसी स्टेशन पर वो जोड़ा उतर गया होगा। मैं अपनी सीट से उठा और बैग से टूथ ब्रश निकाल कर टॉयलेट की ओर जाने लगा। सभी यात्री जाग चुके थे। तभी सामने से टी टी आया। मैंने उससे उन मुसाफिरों के बारे पूछा तो वो बोला कि लॉन्ग रूट की ट्रेन कहीं नहीं रुकी अब जो स्टेशन आयेगा वहां यह ट्रेन रुकेगी। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, कोई सपना समझ कर, मैं अपना बैग लेकर स्टेशन पर उतर गया।
