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Priyanka Mudgil

Tragedy Inspirational Children

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Priyanka Mudgil

Tragedy Inspirational Children

दर्द का रिश्ता

दर्द का रिश्ता

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कमलनाथ जी के घर में खूब जोर- शोर से दीवाली की तैयारियां चल रही थी। नौकर- चाकर इधर-उधर घूम रहे थे ।पूरे घर को लाइट्स और फूलों से सजाया गया था। खाने की खुशबू चारों तरफ फैली हुई थी। उनकी पत्नी संगीता जी को खाना बनाने का बहुत शौक था ।वह तरह-तरह के व्यंजन घर में ही बनाने में लगी थी।

तभी कमलनाथ जी घर में प्रवेश करते हैं, और साथ में बहुत सारा सामान और मिठाई लेकर आते हैं। कमलनाथ जी के दो बेटे 15 वर्षीय रोहन और 13 वर्षीय चिराग... ।

कमलनाथ जी के हाथ में ढेर सारा सामान देखकर दोनों बच्चे खुश हो जाते हैं और दौड़ते- दौड़ते अपने पापा से चिपक जाते हैं। दोनों बच्चे सामान देखने के बहुत ज्यादा उत्साहित होते हैं।

तभी रोहन, "पापा! दिखाइए ना, आप क्या-क्या लेकर आए हैं कौन-कौन से पटाखे लेकर आए..? "

फिर चिराग ,"पापा ! दिखाओ ना जो मैंने कहा था आप वह पटाखे मेरे लिए लाये के नहीं । और मेरी पसंद की मिठाई लेकर आए कि नहीं ।

कमलनाथ जी ,"हाँ! हाँ!बेटा सब लेकर आया हूँ। थोड़ा सब्र रखो"

लेकिन पापा इतने सारे पैकेट हमारे लिए है क्या ?

नहीं! इनमें से आधे तुम्हारे हैं और आधे अनाथ आश्रम के बच्चों के लिए ....

ये बात सुनकर रोहन नाराज हो जाता है और नाराजगी जताते हुए कहता है ,"क्या पापा, आप हमेशा अनाथ आश्रम के बच्चों को ही कभी मिठाई, कभी कपड़े ,कभी खिलौने देते रहते हैं.."


रसोई में काम काम करते-करते कमलनाथ जी की पत्नी संगीता जी भी अपने पति और बच्चों की बातें सुन रही थी ।

बाहर आकर संगीता जी ने अपने दोनों बेटों को बुलाया और कहा, "बेटा !! जैसे तुम दोनों हर दीवाली पर मिठाई ,नए कपड़े और पटाखे चाहते हो...इसी तरह हर बच्चे की इच्छा होती है कि उसके पास ये सब हो। तुम्हारे लिए तुम्हारे मम्मी- पापा सब लेकर आते हैं। जितने चाहे उतने पटाखे तुम्हारे लिए लाते हैं।तुम्हारे मनपसंद मिठाइयां, तुम्हारे मनपसंद कपड़े लेकर आते हैं।

लेकिन वो बच्चे तो अनाथ है...उनका इस दुनिया में कोई नहीं ...अगर उनके माता-पिता उनके साथ होते तो उन्हें भी किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं होती .."

संगीता जी के इतना सब कहने के बाद भी दोनों बच्चे कुछ भी समझने को तैयार नहीं थे । उनको तो बस अपने लिए ही सब सामान चाहिए था। वो अपनी कोई भी चीज किसी के साथ भी नहीं बांटना चाहते थे । उनकी हर ख्वाहिश पूरी होने के कारण थोड़े जिद्दी भी हो गए थे।

दोनों नाराज होकर अपने कमरे में चले गए ।।


अगले दिन कमलनाथ जी कुछ और कपड़े और मिठाइयां लेकर आए ।

दोनों बच्चों को बुलाते हुए कहा, "तुम दोनों मेरे साथ चलो..मैं तुम्हें कहीं लेकर जाता हूँ"

दोनों बच्चे घूमने के नाम से खुशी-खुशी जाकर कार में बैठ गए।

उन्हें लगा कि उनके पापा उनके लिए और सामान लेने जा रहे हैं। थोड़ी देर बाद गाड़ी अनाथ- आश्रम के बाहर रुकी।

चिराग ने कहा, "पापा! यह आप हमें कहां लेकर आए हैं. .? हमने तो सोचा, आप हमें और शॉपिंग करवाने ले जा रहे हैं...पर ये तो...."

फिर कमलनाथ जी ने कुछ सोचते हुए कहा ,"हाँ! हाँ! लेकर चलता हूँ। पहले मुझे तुम्हारी सहायता की जरूरत है ।इतना सारा सामान जो पीछे गाड़ी में रखा हुआ है, उसे उठाने में मेरी थोड़ी मदद तो करो।

चलो अंदर! पहले बच्चों को यह सब दे देते हैं । उसके बाद तुम जो चाहो तुम्हें वो सब खरीदवा दूंगा।

दोनों बच्चे बेमन से आश्रम के अंदर प्रवेश करते हैं।


जैसे ही कमलनाथ जी अंदर पहुंचे, तो बच्चे खुले मैदान में बैठ कर पढ़ रहे थे ।उन्हें देखकर सब बच्चों के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ आई क्योंकि वो समय-समय पर वहां जाते रहते थे और उन बच्चों के लिए उनके पसंद के खाने की और पहनने की चीजें लेकर जाते थे ।

फिर जब मिठाइयां बच्चों में बांटी गई तो बच्चे इतनी जल्दी जल्दी खा रहे थे जैसे उन्होंने बहुत दिन बाद कुछ अच्छा खाया हो। उनके लाये हुए कपड़े सब बच्चे एक- दूसरे को पहन- पहनकर दिखा रहे थे।

सब एक- दूसरे से खुश होकर बातें कर रहे थे कि अबकी बार तो हम भी दीवाली मनाएंगे, पटाखे भी छोड़ेंगे....हमारे पास भी नए कपड़े और पटाखे हैं ।।


यह सब रोहन और चिराग दोनों दूर खड़े -खड़े देख रहे थे ....

कि तभी एक 8 साल का बच्चा उनके पास आकर बोलने लगा, ""भैया आप कितने लकी हो ना...आपके पास तो यह सब चीजें रहती ही होंगी । आपका जब भी मन करता होगा आप मिठाई खा लेते होगे । आप इतने अच्छे कपड़े पहनते हो .. आपके पापा आपको सब लाकर देते होंगे ...मेरे मम्मी पापा नहीं है ..नहीं तो वो भी मेरे लिए सब लेकर आते। फिर हमें भी किसी का इंतजार नहीं करना पड़ता....""

ऐसा कहते कहते वो बच्चा रोने लगा।

ये सब देखकर रोहन और चिराग थोड़ा भावुक हो गए। उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वो दोनों कितना गलत है .


तभी दोनों अपने पिता के पास जाकर बोलते हैं ,"पापा! हमें माफ कर दीजिए, इन बच्चों को इतना खुश देखकर हमें बहुत सुकून मिल रहा है। हमने यह कभी सोचा ही नहीं था कि दुनिया में ऐसे भी बच्चे होते हैं ...।

फिर कमलनाथ जी बच्चों को लेकर एक गार्डन में जाते हैं। और सुकून से बैठकर कहते हैं, "बेटा!! आज तुम जिन बच्चों से मिल कर आए हो ना.... तुम्हारे पापा भी उन्हीं बच्चों में से एक थे"


अपने अतीत को याद करते हुए बोलते हैं ,मैंने भी यह जीवन जिया है....मुझे भी इंतजार रहता था कि कोई आए कुछ अच्छा खाने को दे...मुझे भी नए कपड़े पहनने को मिले ।। जैसे ही कोई अनाथ आश्रम में प्रवेश करता था, तो एक उम्मीद सी जगती थी कि शायद कोई हमारे लिए कुछ सामान लेकर आया है...शायद आज हमें कुछ पकवान खाने को मिले ....


यह बात मैंने तुम्हें कभी बताई नहीं, लेकिन आज बताता हूं...मैं भी एक अनाथ था। एक रोड एक्सीडेंट में मेरे माता-पिता की मृत्यु हो गई थी और तब मुझे भी मजबूरी में ऐसा जीवन जीना पड़ा। तब मैं सिर्फ 12 साल का था ।


तभी एक दिन शर्मा दंपति आए (तुम्हारे दादा दादी जिन्हें तुमने तस्वीरों में देखा है) दोनों दिल के बहुत अच्छे थे। लेकिन ईश्वर ने उन्हें नि:संतान रखा। जिस दिन वह आए थे...मैं आश्रम के एक कोने में बैठा हुआ था, उन्होंने प्यार से मेरे सिर पर हाथ रखा। थोड़ी देर मुझसे बातचीत की ।

पता नहीं, मेरे अंदर उन्हें क्या नजर आया कि उन्होंने मुझे गोद लेने का फैसला किया ।।


आज मैं जो कुछ भी हूं... सिर्फ उनकी वजह से हूं उन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया । मैं भी दिल से उनकी बहुत इज्जत करता हूँ। पर मेरे जैसी किस्मत हर बच्चे की नहीं होती है। और वो समय मैं कभी नहीं भूल सकता जो मैंने आश्रम में बिताया था।

हर बच्चे की तरह मेरा भी मन खाने की चीजों , नए कपड़ों को देखकर ललचाता था। पुरा दिन रोता रहता था ।लेकिन एक बच्चा सिर्फ अपने माता-पिता से ही अपनी अपनी इच्छा कह सकता है । फिर माता-पिता ही अपने बच्चे की खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं ।


आज मैं इन बच्चों के दुख- दर्द तकलीफ को अच्छे से महसूस कर सकता हूं। इनके मन में उठने वाली भावनाओं को अच्छे से समझ सकता हूँ क्योंकि कभी मैं भी इनमें से एक था...मैं जितना भी इन बच्चों के लिए करता हूं उतना कम लगता है ।।

बस यही चाहता हूं कि ये बच्चे भी तुम दोनों की तरह धूमधाम से दीवाली मनाएं इसीलिए इनके लिए यह सब सामान लेकर आया। और समय-समय पर लेकर आता रहता हूं ।।

अगर तुम मेरी जगह होते तो क्या करते

दोनों बच्चे रोने लग जाते हैं और अपने पिता से क्षमा मांगते है। फिर तीनों घर लौट आते हैं।


अगले दिन...

"रोहन और चिराग बेटा ! यह तुम दोनों क्या कर रहे हो?" संगीता जी ने पूछा ।।

"कुछ नहीं माँ! हम दोनों ये पटाखे पैक कर रहे हैं। हम दोनों आज अनाथ आश्रम जाएंगे पापा के साथ.....और वहां के बच्चों के साथ दीवाली मनाएंगे।।उनके साथ पटाखे फोड़ेंगे ताकि उन्हें अपने परिवार की कमी महसूस ना हो ।

तभी चिराग,"हां भैया!! हम जब साथ में दीवाली मनाएंगे तो बहुत मजा आएगा ...खूब मस्ती करेंगे.."

दूर खड़े - खड़े कमलनाथ जी यह बातें सुन रहे थे और मन ही मन खुश हो रहे थे।।



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