Alok Singh

Tragedy


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Tragedy


दोस्ती

दोस्ती

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राज और फुरक़ान अली बचपन के मित्र है। दोस्ती अगर हुई हो और फिर किसी कारण से दोनों पढ़ाई के लिए एक दूसरे से बिछड़ गए हों और भाग दौड़ की ज़िंदगी में दोस्ती का हाथ छूटा न हो लेकिन आँखों की नज़रों से दूर सा हो गया हो, तो वह दोस्ती है, ही कही जाएगी, थी नहीं।

लंगोटिया यार की तरह दोस्त थे दोनों। ईद में आलोक फ़ुरक़ान के घर जाकर सबके पैरों को छूकर आशीर्वाद लेकर सेवाई खाता था तो फ़ुरक़ान भी होली पर राज के घर जाकर बड़ों के पैरों को छूकर दुआओं की तिजोरी भरता था। क्लास १ से लेकर ५ तक दोनों साथ साथ एक सरकारी स्कूल में पढ़े। बचपन में वैसे भी साथ पढ़ने वाले सिर्फ बच्चे होते हैं...और जैसे जैसे बड़े होते हैं तो दुनिया दारी वाले लोग इंसान बनाने की जगह पर हिन्दू मुसलमान बना देते हैं। हुआ भी वही उनके साथ। स्कूल तो बदल गया पर दोस्ती की खुशबू अभी भी सूखे पुष्पों में बची थी इसलिए कभी कभी मुलाकात हो जाती थी। फ़ुरक़ान क्योंकि ग़रीब था इसलिए उसने मदरसे में आगे की पढ़ाई के लिए दाखिला ले लेता है और राज एक मिडिल क्लास परिवार से था तो एक प्राइवेट स्कूल में आगे की पढ़ाई जारी रखा है

समय बदलता गया। दुनियादारी का रंग होली में लगाये जाने वाले सफेद वाले रंग से भी तेज़ चढ़ना दोनों पर शुरू करता है...जितना ज्ञान अध्यापक नहीं दे पाते उससे ज्यादा समाज के लोग दे देते हैं। हाँ फर्क बस इतना रहता है कि अध्यापक द्वारा दिए गये ज्ञान में अपना दिमाग नहीं लगाना पड़ता है पर समाज वाले ज्ञान को समझना पड़ता है कि क्या अनुकूल हो , क्या सही है।

दोनों के बीच में मुलाकातों का सिलसिला लगभग न के बराबर हो चुका है लेकिन एक ही शहर के होने के कारण एक दूसरे का हाल चाल रखा करते हैं। फुरक़ान आज कल एक मौलवी हो गया है वह अपने धर्म का ज्ञान बढ़ा रहा है और राज एक डॉक्टर है लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज में,

ज़िन्दगी के कई पड़ाव पार हो चुके हैं। लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज में आज कल कई कोरोनो के रोगी आ रहे हैं। मिडिया पर ख़बरे जोर शोर से चल रही हैं। कहीं तब्लीकी जमात की वजह से सारा भारत कोरोनो की पकड़ में, तो कहीं मुस्लिम मुल्लाओं की वजह से कोरोनो केस में तेजी। ऐसा लगने लगा था की जैसे मुसलमान मुसलमान न होकर कोरोना ही हो गया हो। कई लोग अगर झूठ को भी सच की तरह बोलने लगते हो तो वह झूठ भी खुद को सच समझने लगता है। कई क्लिप्स सोशल मीडिया पर ऐसी आई की लोगों ने दाढ़ी और एक खास तरह की टोपी वालों से सामान लेना ही बंद कर दिया। कहीं कहीं तो नाम पूछ कर लाठियों से स्वागत और धरा प्रवाह भाषा के साथ अपनी जाहिलियत का परिचय गालियों के साथ देने लगे हैं लोग।

हिन्दू भी कभी थाली बजाते बजाते सड़कों पर आजा रहे हैं और कहीं कोई अपने जन्मदिन की पार्टी देने में व्यस्त। प्रधानमंत्री जी भी समझाने में लगे हैं लेकिन कुछ ख़ास तरह के लोगों पर कोई फर्क नहीं पढ़ रहा है।

मेडिकल स्टाफ ने कुछ हॉटस्पॉट वाली जगह पर जा जाकर सैंपल लेने का प्लान तैयार किया है। एक टीम की कमान राज को दी गयी है वो भी वहां जहां मुस्लिमों की आबादी भी है और उसका दोस्त वहीँ की एक मस्जिद में मौलवी भी है।

शुक्रवार का दिन दिन में २ बज रहे हैं। और दिनों की तरह आज पुराने लखनऊ में भी चहल पहल नहीं है। राज अपनी टीम के साथ मस्जिद के पास घनी आबादी वाले इलाके में पहुंच चुका है..उसकी टीम जैसे ही अपने टेस्टिंग किट को पहन कर एम्बुलेंस से बाहर निकलती है ...वहां के कुछ लोगों के दरवाज़े खुलने लगते हैं। खाली समय में कुछ अलग सा नज़ारा दिखे तो लोग लालसा की वजह से बाहर निकल कर देखना ही चाहते हैं।.

एक दो घर से सैंपल इकट्ठा करते हैं और अपने काम में पूरी तन्मयता से लगे हुए होते हैं।..कि अचानक से कहीं से एक पत्थर राज के सर में आकर लगता है। अल्लाह हो अकबर के नारे लगते कुछ लोग उनकी टीम की तरफ आ रहे होते हैं। वो जिनके हाथों में भारत देश का भविष्य सुरक्षित होना चाहिए था उन्ही हाथों के पत्थर मज़हबी खून बहाने के लिए उठ खड़े हुए हैं। वो जो अल्लाह हो अकबर का असल मतलब भी नहीं जानते धर्म के आका की तरह दिखला रहे थे..

अपनी टीम को बचाते हुए राज को बहुत चोट आ जाती है और उसको ICU में एडमिट करना पड़ता है।

प्रशासन को जब ये बात पता चलती है तो पुलिस को भेज कर वहां पर दंगायिओं को पकड़ने की धर पकड़ शुरू हो जाती है। अच्छा बुरा लोग नहीं सोचते हैं। कहीं भी अगर कोई एक कुछ भी करने लगे तो भेड़ चाल चलते हुए बहुत सारे लोग वहीँ करने लगते हैं, फिर उनको चाहे कुछ उसके बारे में पता हो या नहीं। गलत करने वाले कम होते हैं उनका साथ देने वाले उनसे ज्यादा और ऐसा उल्टा भी होता है अगर आप कुछ अच्छा करना शुरू करो तो कई और हाथ आपसे जुड़ते चले जाते हैं।

पुलिस की लाठियाँ जब चलती हैं तो उनके पास इतना समय नहीं रहता की वो चेक करें कि ये सही लाठी, सही पर पड़ी या गलत पर

बरगलाने के आरोप में फुरक़ान को भी पुलिस पकड़ कर लाती है और अच्छे से धुलती है। धुलाई कुछ ज्यादा हो जाने कि वजह से उसको भी ICU में एडमिट करना पड़ता है..पुलिस के ऊपर भी फिर उल्टा लगनी चाहिए थी पर लॉक डाउन की वजह से कौन जानता है कि मौलवी जी के साथ क्या हुआ है

कुछ दिन के बाद दोनों को जब होश आता है तो वो एक दूसरे को अपना पड़ोसी पाते हैं। ज़िंदगी है न जाने कब कहाँ कैसे मिलाये।

दोनों दोस्त एक दूसरे को पहचान तो गए लेकिन एक दूसरे को गले न लगा सके। पर उनकी आँखें बहुत कुछ बयां कर रही थी। दोनों की आँखें निर्दोष थी।बहते आँसू उनकी पाक दोस्ती बताने के लिए काफी थी।

आज दोनों को अस्पताल से जाने की इजाज़त थी। पर फुरक़ान तो नहीं जा सकता था उसको तो जेल जाना था। पुलिस आ चुकी थी। राज ने पुलिस वालों से बात की पर सारी मेहनत उसकी बेकार सी गयी...उसकी बेबसी देखर कर फ़ुरक़ान कहता है दोस्त रहने दे...अब वह जमाना नहीं...आज कल लोग ये दाढ़ी और टोपी देखर कर मान लेते हैं की ये गलत ही होगा..बहुत लोग गलत हो सकते हैं..पर सभी तो नहीं।

चल बैठ गाड़ी में।...फिलॉसफी बाद में।

वह चुप चाप पुलिस वालों के साथ चला गया। और राज सही समय का इंतज़ार करने लगा...


क्रमश: 


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