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Arunima Thakur

Inspirational

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Arunima Thakur

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धन्यवाद सर

धन्यवाद सर

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मैं शिक्षक/शिक्षिकाओं की बात करूँ और मुनीन्द्र सर का नाम ना आये यह तो हो ही नही सकता। वो हमारे गणित के शिक्षक थे और बहुत ही प्यारे इंसान भी। न न इसका मतलब यह नही है कि बाकी सारे शिक्षक अच्छे नही थे। पर मुनीन्द्र सर हम सब उन्हें पसंद करते थे। हम उनका आदर तो करते थे पर उनसे डरते नही थे। आज मैं गणित की शिक्षिका हूँ, गणित मेरा पसंदीदा विषय है इसका पूरा श्रेय उनको ही जाता है। पर आज मैं जो संस्मरण साझा कर रही हूँ उसका गणित से कुछ लेना देना नही है। यह सिखाता है कि एक शिक्षक चाहे तो अपने शब्दों से शिष्य को पारस बना दे।


हाँ तो बात उन दिनों की है मैं नौवीं कक्षा में थी । हमारी परीक्षाएं चल रही थी। हमारी इतिहास विषय की परीक्षा थी। वैसे तो मुझे अंको से बहुत प्यार है गणित पसन्द होने के कारण अंको से दोस्ती भी है। पर इतिहास के सारे वर्ष , लड़ाईयां, कार्यकाल यह सब मेरे आँखों के आगे नाचने लगते और सारे एक मे मिल जाते। मतलब यह कि मैं वो सब याद नही रख पाती थी। 


मैं गाँव से पढ़ने के लिए शहर आती थी । मेरी बस थोड़ी जल्दी आ जाती थी तो मैं कक्षा में बैठ कर पढ़ती रहती थी। तभी मैंने देखा अक्सर कुछ बच्चे जल्दी आकर अपनी मेज पर कुछ लिखते थे हाँ नकल करने के लिए (नकल का यह प्रकर उस समय नया नया ईजाद हुआ था)। उस दिन तारीखे सन याद ना होने के कारण मैं बहुत डरी हुई थी । मैंने भी किसी को अपने ओर देखते ना पाकर कुछ तारीखे सन अपनी मेज़ पर लिख दिए। उस दिन पर्यवेक्षक के रूप में मुनीन्द्र सर आये। और ऐसा कई दिनों से चल रहा था, इस लिए शायद हमारे शिक्षकों को भी इस नकल के तरीक़े की खबर हो गयी थी। उन्होंने आते ही सब बच्चो को मेजे बदलने के लिए कहा। मैं भी अपनी मेज बदलने जा रही थी कि उन्होंने बच्चो को ना बोलते हुए कहा, "अरुणिमा की मेज मत बदलो। वह बहुत ही अच्छी लड़की है। वह नकल कर ही नही सकती"।


 उनके इन शब्दों से मेरे ऊपर घडो पानी पड़ गया। मैं इतना शर्मिंदा महसूस कर रही थी कि मेरी यह कहने की हिम्मत भी नही थी कि नही सर मेरी मेज भी बदल दीजिये। मैंने भी मेज पर लिखा है। और ऐसा बोल कर ना तो मैं उनका विश्वास तोड़ना चाहती थी ना ही यह कि उन्हें पूरी क्लास के आगे शर्मिंदा होना पड़े। आप विश्वास मानिए उस दिन मेरे पास नकल सामग्री होते हुए भी, वो प्रश्न परीक्षा में आने के बावजूद भी मैने नकल नही की। मेरी हिम्मत ही हुई। नही, नकल करने की नही, उनका विश्वास तोड़ने की हिम्मत नही हुई। 


आज भी नही होती है। कई बार ऐसी परिस्तिथियां आती है। जहाँ चुनाव करना होता है, कदम डगमगाते है फिर कानो में सर की आवाज़ गूंजती है, "अरुणिमा ऐसा कर ही नही सकती"। मेरा रोम रोम कृतज्ञता से भर जाता है । धन्यवाद सर मुझ पर विश्वास करने के लिए। धन्यवाद सर मुझ पर मेरा विश्वास कायम रखने के लिए। और सबसे बड़ी सीख देने के लिए कि बहुत बार बच्चो को दंड देने की जगह उन पर विश्वास करके भी उनका सर्वोत्तम रूप हम सामने ला सकते है।



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