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देशद्रोह

देशद्रोह

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देशद्रोह के मामले आपने बहुत सुने होंगे। आए दिन कोई न कोई देशद्रोह के मामले मैं गिरफ़्तार किया जा रहा है। आज़ादी के आंदोलन के समय अंग्रेज़ सरकार नेताओं व स्वतंत्रता सैनानियों पर देशद्रोह लगाती थी। १८९७ में तिलक और १९२२ में गाँधी को अंग्रेज़ों ने देशद्रोह के मामले में गिरफ़्तार किया था।

नेता लोगों के साथ मिलके काम करते थे, उनके हक़ के लिए लड़ते थे। सरकार बोलती थी ये गैर-कानूनी है। पहले अगर कोई यूनिवर्सिटी में छात्र एक-जुट होने का भाषण मात्र दे दे , तो देशद्रोह का मुक़दमा लगा कर जेल में डाल देते थे।यदि सोशल मीडिया पर पाकिस्तान का ज़िक्र मात्र भी किया, तो दो साल की कैद। बिना सुनवाई।

पर अब ऐसा नहीं है। अभी देशद्रोही का ख़िताब माँगा जाता है। लोग खुद सोशल मीडिया और सड़क पर जाते हैं मांगने के लिए। कोई भरी सभा में 'पाकिस्तान ज़िंदाबाद' के नारे लगा देता है, तो कोई ग़रीबी से आज़ादी की मांग करने लगता है। तो कोई किसान को उचित दाम। सब कोशिश करते हैं, की नज़र में आ जाएँ, और गिरफ्तारी हो जाए। मैं भी सोचता हूँ, कोई इतना मूर्ख कैसे हो सकता है जो इन सब झंझटों में पड़े।

अभी कुछ दिन पहले की बात है, जब मैं एक सज्जन से मिला । बहुत जल्दी में थे। जिज्ञासा हुई तो मैंने भी झट से पकड़कर रोक लिया और पूछा

"इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हो भाई साहब? सब कुशल-मंगल ?"

"जी हाँ। सोच रहा था देशद्रोह में गिरफ्तारी दे आऊं।"

"देशद्रोह ? गिरफ्तारी ?" मैंने हैरानी से पूछा।

"हाँ"

"किसे देंगे गिरफ्तारी ?"

"चाहे जो ले ले । हमें तो देने से मतलब है।"

इतना कह कर वह गृह मंत्री के घर के बाहर जाकर शान्ति से बैठ गया। उसे बैठा देख, पुलिस दौड़ी चली आयी और पूछा

"यहां क्यों बैठे हो ? क्या चाहते हो ?"

"जी, देशद्रोह में गिरफ़्तारी देनी है।"

"तो यहां क्यों आये ? किसी यूनिवर्सिटी में चले जाते, हम वहीं से उठा लेते। खैर अब आ गए हो तो पीछे पार्टी कार्यालय के बाहर जाओ वहां से टोकन ले लो। जब नंबर आएगा, तब हम तुमपे देशद्रोह लगाकर गिरफ्तार कर लेंगे। तुम भी बाक़ियों के साथ लाइन में लग जाओ।"

"माफ़ कीजियेगा, पर यह तो सरासर नाइंसाफ़ी है! ३ हफ्ते हो गए चक्कर लगाते लगाते। कोई सुनवाई नहीं। इंस्पेक्टर साहब, आप समझ नहीं रहे। मुझे नौकरी के लिए आवेदन देना है और उन्हें देशद्रोह में गिरफ्तारी के कागज़ चाहिए। जब तक हम कागज़ नहीं दिखाएंगे, नौकरी नहीं मिलेगी ।"

"क्या करें भाई, जितनी हम एक दिन में ले सकते हैं, तो ले रहे हैं । अगर तुम स्टूडेंट होते, तो झट्ट से मिल जाती। अब आम नागरिक हो, तो थोड़ा तो टाइम लगेगा। ऊपर से बहुत प्रेशर है, कितने लोगो की लें ? लोग वैसे भी कम हैं काम करने की लिए। अच्छा ये बताओ, जात क्या है तुम्हारी ?"

वह चुप्प रहा। फ़िर चुपके से पुलिसवाले का बैच देखर बोला "जनाब, हम तिवारी हैं।"

"अरे, तो पहले बताना था न। दिखाओ अपने कागज़, तुम्हारी गिरफ़्तारी तो अभी ले लेते हैं।"

"जी कागज़ तो नहीं हैं। भला देशद्रोह के लिए कागज़ की क्या ज़रूरत ?"

"बिना कागज़ के गिरफ़्तारी ऐसे ही नहीं ली जायेगी। लगो तुम भी लाइन में।"

"अपनी जात के लोगों के साथ ऐसा व्यवहार!" बड़बड़ाता हुआ वह लाइन में लग गया। फ़िर २ घंटे बाद जाकर नंबर आया ।

"साहब, बस आप जल्दी से मुझे देशद्रोह में गिरफ़्तार कर लीजिये। बहुत दूर से आया हूँ। सुबह से शाम हो गयी। कुछ खाया-पिया भी नहीं। बहुत टाइम वेस्ट हो गया।"

उसी शाम मैं उनसे फ़िर मिला।

"क्यों जनाब, दे आये गिरफ्तारी ?"

"क्यों जले पे नमक छिड़कते हो। ये संसार किसी का नहीं। घोर कलयुग है, घोर कलयुग। लोग देशद्रोह में गिरफ़्तार होना चाहते हैं, और उनकी गिरफ़्तारी नहीं ली जा रही। बोले नाम और पता ले लिया है, जब जेल में जगह होगी, तो गिरफ्तारी के लिए बुलाएंगे । मैंने नाम बदलने की कोशिश भी करी। पुलिस वाला तिवारी था, हम दलितों की बात कहाँ मानता। हमें तो गिरफ्तारी भी नसीब नहीं।"

"खैर, आप धीरज रखिये।" मैंने उसके कंधे पे हाथ रखके कहा।

"क्यों गौरव, आपने देशद्रोह का आवेदन दिया के नहीं? कब देंगे आप भी गिरफ्तारी ?"

"जी नहीं, अभी तो नहीं । सरकार देशद्रोह में जेल में भरने के लिए सबको एक-एक बार अवसर देगी। अभी तक तो पता नहीं कितनी गिरफ्तारियां हो गयी हैं और कितनी पेंडिंग हैं। सरकार अगर प्रति गिरफ्तारी २ हज़ार लगा दे, तो देश संवर जाए। मोदीजी का ५ मिलियन टन का सपना पूरा हो जाए। और जो हालात हैं, लगता है पुलिस को कुछ खिला-पिला के ही गिरफ्तारी देनी पड़ेगी ।"

देशद्रोह से ही राजनीति में करियर बनता है। कल जब चुनाव में खड़े होंगे, और पता चलेगा एक भी देशद्रोह का मामला नहीं, सोचो कितनी बदनामी होगी। तो आप कब दे रहे हैं, देशद्रोह में गिरफ्तारी ?


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