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Saroj Verma

Fantasy


4.5  

Saroj Verma

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चन्द्र-प्रभा--भाग(२४)

चन्द्र-प्रभा--भाग(२४)

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अपारशक्ति आज अपने परिवार के संग थे, उन्होंने जलकुम्भी की दशा देखी तो द्रवित हो उठे, उनकी जलकुम्भी कुम्हला गई थीं, जलकुम्भी ने अपारशक्ति के चरणस्पर्श किए और उन्होंने जलकुम्भी को शीघ्रता से अपने हृदय से लगा लिया और पिंजड़े को तोड़कर मैना बनी सूर्यप्रभा को अपनी हथेली में बैठाकर रो पड़े और बोले।

।ब्यथित ना हो मेरी पुत्री! मैं राजकुमार को अवश्य मुक्त करा लूँगा और हम सब अम्बिका और अम्बालिका का आज रात्रि ही सर्वनाश कर देंगें।

   मैं आज अत्यधिक प्रसन्न हूँ महाराज!कितने वर्षों से मै ये स्वप्न देख रही थीं कि आप अपने पूर्व रूप में आ जाएं और ये साहसिक कार्य राजकुमार भालचन्द्र ने पूर्ण किया है उन्होंने ही आपका कृत्रिम पुतला शीशमहल में रखा और आपको ले गए, उनके कारण ही ये सब सम्भव हो पाया है उन्होंने इस कार्य को पूर्ण करके अपने पूर्वजों का गौरव बढ़ा दिया कि वे कितने साहसी हैं, रानी जलकुम्भी ने महाराज अपारशक्ति से कहा।

।हाँ, महारानी जलकुम्भी! वो पूर्णतः अपनी पुत्री के योग्य हैं, महाराज अपार बोले।

 आज अपने कुटुम्ब को पुनः पाकर महाराज अपार की आँखें बार बार छलकी जा रहीं थीं, बहुत लम्बी प्रतीक्षा झेली थी उन्होंने इस क्षण के लिए।

।आइए महारानी जलकुम्भी आपका स्वागत है, नागरानी ने जलकुम्भी को हृदय से लगाते हुए कहा।

सोनमयी बोली, तो आप ही रानी हैं, अत्यधिक प्रसन्नता हुई आपसे मिलकर और उनके चरणस्पर्श किए, इसके उपरांत सूर्यप्रभा से बोली , तो आप राजकुमारी सूर्यप्रभा हैं और उसने सूर्यप्रभा से पूछा, कैसी हो बहन।

 सहस्त्रबाहु ने भी रानी के चरणस्पर्श किए।

इसके उपरांत रानी जलकुम्भी ने पुरोहित विभूतिनाथ जी के चरणस्पर्श किए और वैद्यनाथ से सुभागी के विषय में पूछा।

  तभी वैद्यनाथ जी बोले____

महारानी!ये हमारे नए सहयोगी छत्रसाल है, इन्होंने ही महाराज का कृत्रिम पुतला बनाने में मेरी सहायता की और इन्होंने अम्बालिका को नष्ट करने का भी उपाय बताया है, क्योंकि उसके यहाँ मूर्ति कार थे।

।बहुत बहुत आभार आपका, छत्रसाल जी! ये सब आपके कारण ही सम्भव हो पाया, जीवन भर आपका उपकार रहेगा, हमारे परिवार पर, रानी जलकुम्भी बोली।

 आभार किस बात का महारानी! ये तो मेरा कर्तव्य था, मै भी इस कार्य के लिए प्रसन्न हूँ कि मेरी कला आपलोगों के काम आई, छत्रसाल बोला।

   और महाराज अपारशक्ति ने सहस्त्रबाहु और वैद्यनाथ जी को आदेश दिया कि सैनिकों से कहो कि स्वर्णमहल चलने की तैयारी करें, आज रात्रि ही हम स्वर्णमहल पर विजय का पताका फहराएंगे, आज रात्रि हमें स्वर्णमहल से राजकुमार को मुक्त कराना है, इतने वर्ष प्रतीक्षा की है मैने इस दिन के लिए।

। महाराज अपारशक्ति ने सैनिकों सहित स्वर्णमहल की ओर प्रस्थान करने से पूर्व एक रणनीति बनाई और सबसे कहा कि वहाँ हमें इसी योजना के अनुसार ही कार्य करना पड़ेगा, चूँकि अब तक अम्बालिका को ये समाचार तो मिल ही गया होगा कि शीशमहल पूर्णतः नष्ट हो चुका है, परन्तु ये ज्ञात नहीं होगा कि मैं अब तक जीवित हूँ क्योंकि उसे तो ये लग रहा होगा कि कदाचित मैं भी शीशमहल की अग्नि में भष्म हो गया हूँ, तो बात हमें उससे छुपाकर रखनी होगी और कोई भी पूछे तो ये कहना कि ये कार्य सहस्त्र ने किया है और इस कार्य में उनकी सहायता नागदेवता ने की है।

।परन्तु महाराज, आप स्वर्णमहल में किस वेष में प्रवेश करेंगें, सहस्त्र ने पूछा।

मैं एक साधारण सैनिक के रूप में प्रवेश करूँगा, जिससे दोनों बहनें मुझे पहचान ना सकें, अपारशक्ति बोले।

 हाँ, महाराज ! ये योजना ठीक रहेगी, सहस्त्र बोला।

।। और उधर स्वर्णमहल में जैसे ही अम्बालिका को ये सूचना मिली कि शीशमहल अग्नि में जलकर भष्म हो गया तो वो अत्यधिक प्रसन्न हुई, उसे लगा कि शीशमहल के संग संग राजा अपारशक्ति एवं उसका परिवार भी भष्म हो गया और ये सूचना देने वो भालचन्द्र के पास पहुँची.....

।राजकुमार! सुना तुमने, अम्बालिका ने राजकुमार से कहा।

अम्बालिका! मुझे ज्ञात है कि तुम शुभ समाचार तो देने नहीं आई होगी, भालचन्द्र बोला।

हाँ, राजकुमार! मैं यही तो तुम्हें बताने आई थी कि शीशमहल अग्नि में जलकर भष्म हो गया है और साथ में अपारशक्ति, जलकुम्भी और तुम्हारी राजकुमारी सूर्यप्रभा भी, आज में अत्यधिक आन्नदित हूँ, अम्बालिका बोली।

  क्या कहा तुमने? शीशमहल भष्म हो गया और मेरी प्रभा भी, ये कैसा अशुभ समाचार सुनाया तुमनें? भालचन्द्र बोला।

हाँ, वहीं तो, परन्तु ये तो मेरे लिए शुभ समाचार है, अम्बालिका बोली।

हाँ, सही कहा तुमने! अब मैं भी ये समाचार सुनकर प्रसन्न हूँ , भालचन्द्र बोला।

भालचन्द्र की बात सुनकर अम्बालिका को कुछ आश्चर्य हुआ और वो बोली___

 तुम और प्रसन्न, भला तुम्हें क्यों प्रसन्नता हो रही है इस बात से, अम्बालिका ने पूछा।

आज मुझे ज्ञात हो गया कि कदाचित तुम्हारे सोचने समझने की क्षमता अब जाती रहीं, या की तुम्हारे गर्व ने उसे नष्ट कर दिया है, इसलिए तुम दूर की नहीं सोच पा रही हो, भालचन्द्र बोला।

  तुम्हारा आशय क्या है? तुम कहना क्या चाह रहे हो, अम्बालिका ने भालचन्द्र से पूछा।

वो ये कि कहीं ऐसा तो नहीं कि महाराज अपारशक्ति अपने पूर्व रूप में आ गए हो और उन्होंने महारानी और राजकुमारी को मुक्त करा लिया हो शीशमहल से और इसके पश्चात शीशमहल में विस्फोट कर दिया हो, भालचन्द्र बोला।

 परन्तु मैने तो ऐसा सोचा ही नहीं, अम्बालिका बोली।

मैं तो केवल सम्भावना प्रकट कर रहा हूँ, हो सकता है कि ऐसा ही कुछ हुआ हो तो ये तुम्हारे लिए शुभ समाचार कहाँ हुआ?ये समाचार तो मेरे लिए शुभ हुआ, भालचन्द्र बोला।

 हाँ, ये भी हो सकता है किन्तु इसका भी उपाय हैं मेरे पास, अम्बालिका बोली।

वो क्या ? अम्बालिका!भालचन्द्र ने पूछा।

वो ये कि मैं तुम्हारा धड़ पाषाण का बना दूँगी, तो तुम कहीं भी नहीं जा सकते, यदि अपारशक्ति यहाँ सेना लेकर आ भी पहुँचा तो तुम्हें वो बचाने का प्रयास करेगा, किन्तु तुम्हारा धड़ यदि पाषाण का होगा तो तुम्हें बचाना उसके लिए कठिन होगा और मैं इसका लाभ उठाऊँगी, अम्बालिका बोली।

  तुम ऐसा कुछ नहीं करोगी अम्बालिका! मै असहाय हो जाऊँगा, भालचन्द्र बोला।

किन्तु मैं ऐसा ही करूँगीं, अम्बालिका बोली।

  तभी अम्बिका ने अम्बालिका को पुकारते हुए कहा____

अम्बालिका.... अम्बालिका... तुमने समाचार सुना।

हाँ, सुना कि शीशमहल नष्ट हो चुका है, अम्बालिका बोली।

नहीं, अम्बालिका! ये समाचार तो पुराना है, वो ये हैं कि सहस्त्रबाहु सेना की अगवानी करते हुए, स्वर्णमहल आ रहा है, भालचन्द्र को मुक्त कराने, अब शीघ्र ही कोई उपाय सोचो कि हम दोनों के प्राण बच सकें, अम्बिका बोली।

हाँ, अम्बिका! हम शीघ्र ही अपने सैनिकों को भी आदेश देते हैं कि वो भी आक्रमण हेतु तैयार रहें, अम्बालिका बोली।

 किन्तु ये भालचन्द्र! कहीं इसकी तो कोई योजना नहीं, अम्बिका बोली।

मैं कैसे कोई योजना बना सकता हूँ, बड़ी माँ! आपने तो मुझे बंधक बना रखा है, भालचन्द्र बोला।

  मैं तुम पर कैसे विश्वास कर लूँ? हो सकता है, यहाँ बंधक बनने की भी तुम्हारी कोई योजना रही हो ताकि हमारा ध्यान तुम पर रहें और वहाँ सहस्त्रबाहु अपनी योजना में सफल हो जाए, अम्बिका बोली।

हो सकता है बड़ी माँ! ये भी हो सकता है, भालचन्द्र बोला।

  आज तो मैं अवश्य ही तेरा धड़ पाषाण का बना दूँगीं और अम्बालिका ने भालचन्द्र का धड़ पाषाण में परिवर्तित कर दिया और दोनों बहने कारावास से बाहर आ गई और अँधेरे में महल के वातायन से देखा तो सच में दूर मैदान में सेना आती हुई दिख रही थीं, अब दोनों बहने अधीर हो उठीं, उनके पास ऐसी कोई योजना नही थी कि दोनों उन सब को पराजित कर सकें।

।। तब अम्बालिका ने कहा कि ऐसा करों अम्बिका तुम वेष बदलकर अभी स्वर्णमहल के पीछे वाले द्वार से बाहर जाओं और उन सब के मध्य इस प्रकार सम्मिलित हो जाओं कि सहस्त्रबाहु की सेना के सब लोगों को ऐसा प्रतीत हो कि तुम उनकी सेना की ही सदस्य हो।

  परन्तु अम्बालिका! ये कैसे सम्भव होगा, मुझे किसी ने पहचान लिया तो, अम्बिका बोली।

  ऐसा करो तुम किसी सैनिक का रूप ले लो और जो भी तुम्हें रहस्य ज्ञात हों तुम शीघ्रता से यहाँ आकर कहो, इस प्रकार ही हम उनकी योजना को विफल कर सकते हैं, नहीं तो आज तो कदाचित अपनी मृत्यु ही समझो, अम्बालिका बोली।

  ऐसा नहीं होगा अम्बालिका! अभी तो मुझे नागदेवता और सहस्त्र से अपना प्रतिशोध लेना है और उस दिन नागरानी ने छल करके मेरा रूप धारण किया और स्वर्णमहल से नागदेवता को ले गई, नागरानी को भी अभी इसका दण्ड मिलना शेष है, अम्बिका बोली।

   हाँ, मैं वही कहने का प्रयत्न ही तो रही थी कि निर्रथक वार्तालाप से कोई लाभ नहीं, तुम शीघ्र वही करो जो मैने कहा है, तभी हम दोनों सफल हो सकते हैं क्योंकि यदि उन्हें हमारे विषय में सारे रहस्य ज्ञात हुए तो वे हमे नहीं छोड़ेगे, अम्बालिका बोली।

 हाँ, अम्बालिका! यही उचित रहेगा, अम्बिका बोली।

और हाँ , ये अवश्य ज्ञात करना कि अपार जीवित है या नहीं, अम्बालिका बोली।

।ठीक है, अब मैं जाती हूँ और इतना कहकर अम्बिका ने अपना वेष बदला और स्वर्णमहल के पिछले द्वार से निकल गई।

   इधर स्वर्णमहल में अम्बालिका ने अपने सभी सैनिकों को आदेश दिया कि स्वर्णमहल के मुख्य द्वार पर कड़ा पहरा रखों, यदि कोई भी स्वर्णमहल के भीतर आने का प्रयास करें तो उसे जीवित ऐमत छोड़ना, अभी महल की सुरक्षा हेतु मैं और भी कड़े प्रबन्ध करना चाहती हूँ और तुम सबको शीघ्र ही इस कार्य को पूर्ण करने में लग जाना चाहिए क्योंकि हमारे पास और अधिक समय नहीं है, क्या पता शत्रु हम पर कब आक्रमण कर दें।

।अम्बालिका को आज कुछ भय का अनुभव हो रहा था क्योंकि उसे ये लग रहा था कि यदि अपारशक्ति और उसका परिवार जीवित है तो अवश्य ही कैसे भी करके आज अपारशक्ति कपना प्रतिशोध लेकर रहेगा।

।  उधर अम्बिका वायु के वेग से सहस्त्रबाहु की सेना में छुपकर सम्मिलित हो गई और सबसे कुछ ना कुछ वार्तालाप करके रहस्यों को ज्ञात करने का प्रयास करने लगी, अब वो सैनिक बने अपारशक्ति के निकट पहुँची और उससे कुछ ना कुछ ज्ञात करने का प्रयास करने लगी।

।  तभी अपारशक्ति को कुछ संदेह सा हुआ और उसने भी मंद मंद स्वर में कहा कि मैं इनका मित्र नहीं हूँ, मैं तो इनका शत्रु हूँ और यहाँ रहस्यों को ज्ञात करने आया था, मुझे अपना प्रतिशोध लेना है नागदेवता से , इसलिए मैनें ये सैनिक का रूप धरा है, मैं तो एक सपेरा और तांत्रिक हूँ, अपनी तंत्र विद्या से नागदेवता और नागरानी को वश में करके बंधक बनाकर ले जाऊँगा और इनकी नागमणियाँ चुराकर उनका उपयोग करूँगा।

। तभी अम्बिका भी बोली, हाँ मैं भी इसी प्रकार के एक व्यक्ति को जानती थी परन्तु नागदेवता ने उसे मृत्यु दे दी और उसमे किसी और ने भी सहयोग किया था।

।जानती थी....इसका क्या तात्पर्य है? तुम एक स्त्री हो और यहाँ सैनिक के वेष में आई हो, अपार ने अम्बिका से पूछा।

 हाँ, अब मुँख से निकल ही गया तो सुनो, मैं भी तुम्हारी भाँति यहाँ के रहस्य ज्ञात करने आई थी ......

  और अम्बिका ने जैसे ही कहा तो अपार ने उससे पूछा___

कहीं तुम अम्बालिका की बड़ी बहन तो नहीं, जिसका नाम अम्बिका है।

 हाँ, मैं वही हूँ, अम्बिका बोली।

  और जैसे ही ये रहस्य अम्बिका ने खोला, अपार ने शीघ्र ही अपने सैनिकों को आदेश दिया कि ये अम्बिका है, यहाँ रहस्य ज्ञात करने आई है, इसे शीघ्र ही बंधक बनाकर साथ ले चलो, सारा निर्णय वहीं होगा कि इसे क्या दण्ड देना हैं।

   नहीं महाराज! इसकी जीवनलीला यही समाप्त होनी चाहिए, नहीं तो क्या पता ये कौन सा संकट खड़ा कर दें, मुझे ज्ञात है, जब मैं स्वर्णमहल में अम्बालिका की मूर्तियाँ तैयार कर रहा था तो मुझे इसकी मृत्यु का भी कारण ज्ञात हो गया था, छत्रसाल बोला।

   वो क्या है छत्रसाल? वैद्यनाथ जी ने पूछा।

 इसके गले मे जो( तनुत्राण)ताबीज है, किसी जीवित पंक्षी के के पंख तोड़कर उसके संग अग्नि में प्रज्वलित कर देने से इसके प्राण चले जाएंगे, छत्रसाल बोला।

  और छत्रसाल ने ऐसा कहा ही था कि अम्बिका ने क्रोधवश छत्रसाल के हृदय में तलवार घोंप दी और बोली , मेरी मृत्यु का कारण बताएगा , ले तो तू भी अब मृत्यु को प्राप्त हो जा, तलवार का प्रहार अत्यधिक गहरा था जिससे छत्रसाल ने उसी क्षण अपने प्राण त्याग दिए।

   सहस्त्र और सोनमयी ने शीघ्रता से अम्बिका को बंधक बनाया और महाराज अपारशक्ति ने अम्बिका के गले से तनुत्राण निकाला, उसके उपरांत मैना बनी सूर्यप्रभा का एक पंख तोड़ कर दोनों को अग्नि मे प्रज्जवलित कर दिया, कुछ ही क्षण में अम्बिका भी चीखती चिल्लाती हुई , जलकर भष्म में परिवर्तित हो गई, उसके भयानक स्वर से सारा वातावरण गूँज उठा और छत्रसाल की मृत्यु के लिए सबको अत्यधिक दुःख हुआ, उसका भी अंतिम संस्कार करके सबने आगें बढ़ने का विचार बनाया।

।   अब नागरानी ने सबके समक्ष आकर कहा कि अम्बिका का तो अब नाश हो चुका है औ स्वर्णमहल में अभी भी अम्बालिका इस प्रतीक्षा में होगी कि अम्बिका स्वर्णमहल जाकर उसे हम सब के ज्ञात हुए रहस्य बताएंगी तो महाराज अपार इस कार्य को मैं पूर्ण करना चाहूँगी, मैं स्वर्णमहल अम्बिका का रूप धरकर जाऊँगी , तब तक आप सब भी वहाँ पहुँच जाएंगें, मैं तब तक ज्ञात कर लूँगीं की राजकुमार किस स्थान पर हैं और किस अवस्था में हैं।

। परन्तु, नागरानी! इसमें तो बड़ा संकट है, अपारशक्ति बोले।

 परन्तु महाराज!राजकुमार को तो बचाना होगा, नहीं तो सूर्यप्रभा का क्या होगा?नागरानी बोली।

 इस कार्य के लिए और सबने भी अपनी सहमति जताई, इसके उपरांत अपारशक्ति भी सहमत हो गए।

क्रमशः


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