बुढ़ापे की सनक
बुढ़ापे की सनक
सुरेश जैसे ही आफिस से घर आया तो देखा माँ के कमरे से सुबकने की आवाज आ रही है। वह हैरान परेशान हो तेज कदमों से कमरे की बढ़ा तो कानों में पिताजी की तीखी आवाज सुनाई पड़ी-
"इतने बरस हो गये शादी को पर तुम्हें अभी तक अक्ल नहीं आई। कभी सब्जी में मसाला तेज कर देती हो, कभी कपड़े जला देती हो !"
तड़ाक तड़ाक !
सुरेश लपक कर कमरे की ओर बढ़ा और उंची आवाज़ मे बोला -
"पिताजी आपको शरम नहीं आती माँ पर हाथ उठाते ! आप का ये रुप देख कर तो मैं हैरान हूँ ! आज के बाद आपने माँ पर हाथ उठाया तो मुझसे बुरा कोई न होगा !"
"और यही बात तुझे तेरा बेटा बोले तो !"
पिताजी ने कटाक्ष किया तो सुरेश तिलमिला उठा।
"क्या मतलब !"
"आज सुबह जब मैं टीनू तो स्कूल के बस स्टाप पर छोड़ने के लिये गया तो वह बहुत उदास था। मैंने कारण पूछा तो रोते रोते बोला -
"पापा बहुत बुरे हैं मम्मी को मारते हैं।"
सुरेश का सिर शर्मिन्दगी से झुक गया।
"इसीलिये आज तेरे पिताजी और मैंने ये नाटक रचा। मुझे मार खाते देख तुझे बुरा लगा तो सोच उस नन्हीं सी जान और बहू पर क्या बीतती होगी। तुझे शरम आनी चाहिए अपनी पत्नी पर हाथ उठाते हुए ! क्या यही सिखाया है हमने तुझे !"
माँ ने रुंधे स्वर में कहा।
"माँ ये गलती दुबारा न होगी,
ये मेरा आपसे वादा है।"
सुरेश ने माता पिता के चरण स्पर्श करते हुए प्रण किया।
