Jeet Jangir

Drama


5.0  

Jeet Jangir

Drama


बस की एक यात्रा

बस की एक यात्रा

4 mins 314 4 mins 314

कुछ दिन पूर्व एक शादी में पास ही के गांव जाना हुआ। वापसी के दौरान बस स्टॉप पर बस का इंतजार कर रहा था। कुछ सवारियां और भी थी जो काफी वक्त से बस की राह तक रही थी। इनमें से कुछ लोग एक जत्थे के रूप में दृष्टिगोचर हो रहे थे। सफेद पटके और सिर पर सफेद पोत्ये बता रहे थे कि ये किसी नुकाण से आए थे। थोड़ी देर बाद पूछने पर पता चला कि ये सभी न्यात से लौट रहे हैं और काफी देर से यहां बस का इंतजार कर रहे हैं। वैसे इस रूट पर बसें कम ही चलती हैं। रोडवेज के लिए तो ये रास्ता अछूत ही हैं और बाकी निजी बसे जोधपुर के लंबे रूट की है जो डेढ़ दो घण्टे के अंतराल से चला करती हैं। कुछ देर बातचीत में गुजर गया। तभी दूर से धूल का गुब्बार उड़ता दिखाई दिया (चूंकि रोड़ का काम चल रहा हैं), एक उम्मीद की किरण दिखाई दिया, सभी ने अपने आपको व्यवस्थित किया मगर तभी एक बुजुर्ग बोला - 'मरो रे।

ओ तो टर्बो हैं।' धूल छंटी तो देखा दूर से बस की तरह दिखने वाला ये वाहन एक ट्रक था। हम वापिस रोड़ से दूर जाकर बैठ गए। कुछ ने तानसेन खाई, कुछ ने मिराज तो कुछ ने विमल (जिसके दाने दाने में है केशर का दम) कुछ बुजुर्गों ने बीड़ी जलाई और फिर बातचीत का दौर शुरू हुआ।

अबकी बार आधे घंटे के बाद दूर से एक बस आती दिखी। हां, ये बस ही थी। रडमड रडमड करती ये करुणा की पात्र कुछ ही देर में हमारे जस्ट आगे रुकी। रुकी क्या रुकने का उपकार किया था। पूर्ण रूप से भरी हुई ये बस जिसका प्रत्येक पुर्जा दया याचक सा प्रतीत हो रहा था। एक दो सवारी उतरी और फिर हमें चढ़ने को कहा गया। मगर चढ़ना कहां है। जहां तिल रखने तक की जगह नहीं थी वहां खड़ा होना तो नामुमकिन सा था। कुछ एक दूसरे के पैरों पर चढ़ रहे थे, कुछ दरवाजे पर लटक रहे थे तो एक एक सीट पर चार पांच सवारियां पसरी पड़ी थी।

यहां तक की कुछ तो ड्राईवर के पीछे अडे थे, कुछ बोनट पर खड़े थे। सभी अपनी अदमियत भूल रहे थे और दो अधेड़ दरवाजे से झुल रहे थे। खैर। इंतजार की घड़ियां टलने लगी, बस धीरे धीरे चलने लगी। चलती बस के दरवाजे पर खड़ा बुजुर्ग अचरज से झांक रहा था, पास खड़ा में उसे गौर से ताक रहा था। कुछ ही देर बाद आया हिचकोला, वो बुजुर्ग ड्राईवर से बोला - 'अा थारी बस किंरी रिस निकाल री हैं, अा वांकी वांकी क्यूं चाल री हैं।' इस पर ड्राईवर झल्लाया, कमबख्त लाउड स्पीकर की तरह चिल्लाया, बोला- 'थारे जेडी आठ दस सवारियां दरवाजे सुं टर री हैं अर तू बोले हैं कि थारी बस वांकी क्यूं हाल री हैं, बासा बस सूं भी प्रीत धारो रा अर दरवाजे सूं थोड़ा लारे पधारो रा।'

पर पीछे आने की सलाह रह गई महज बात थी क्यूंकि वहां से कोई हिल भी सके, ऐसी कहां हालात थी। खैर, बातो ही बातो में रस्तें में उड़ती धूल छंट रही थी, धीरे ही सही मगर राह जरूर कट रही थी। सोच रहा था मैं खड़ा खड़ा, कि कितनी आसानी से ले लेता है इंसान फैंसला बड़ा, हर हादसा लापरवाही नहीं होता मजबूरी भी होता है, अगर ऐसे हालात हो और कहीं जाना जरूरी होता है, फिर किसी हादसे की आशंका को सभ्य व्यक्ति भूल ही जाता है,

मजबूरी में रेल और बस के दरवाजे पर झूल ही जाता हैं। हर रोज एक तलाश घर छुड़वा देती हैं, कभी रिश्तेदारियां कहीं बुलवा देती हैं, काश कि आते जाते लोगों का सफर मुकम्मल हो जाएं, भटकन इनकी छूटे और घर मुकम्मल हो जाएं। मेरी कल्पना शक्ति मुझे झकझोर रही थी, इतने में पता चला बस शहर को आ गई थी। खैर ये सफर यहीं खत्म हो गया फिर से शुरू होने के लिए, मुस्कुराया मेरा मन ये बताने के लिए, कि इस छोटे से सफर का तुमने अंजाम क्या किया हैं, ये बस आने जाने का जरिया थी और तुमने काम क्या लिया है ?


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