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Arti jha

Abstract

5.0  

Arti jha

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बंदिनी

बंदिनी

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रात के ढाई बजे सीने में अचानक बहुत तेज दर्द होने लगा। हल्की-हल्की ठंड होने के बावजूद मैं पसीने से तर हो गई। मैंने कांपती आवाज में पुकारा,
"अंशुमन... जरा पानी देना..." अगले ही पल याद आया कि वह तो ऑफिस के काम से शहर से बाहर गए हैं। मैं कराहते हुए किसी तरह घिसटती हुई हॉल तक आ पाई, तभी अचानक किसी ने डोरबेल बजाई। इस सन्नाटे में रात के ढाई बजे कौन हो सकता है? मैं अभी सोच ही रही थी कि बाहर से एक भारी आवाज आई, "दरवाजा खोलो, मानवी!" मैंने डरते-डरते दरवाजा खोला। सामने का दृश्य देखते ही मेरी चीख निकल गई और मैंने डर से अपनी आँखें बंद कर लीं। "आँखें खोलो मानवी, और मेरे साथ चलो," वह रहस्यमयी आकृति बुदबुदाई। "कहाँ?... मैं तुम्हें नहीं पहचानती..." मेरे शब्द डर के मारे आधे-अधूरे ही रह गए। "असत्य में जीने वाले सत्य को नहीं पहचानते, मानवी!" यह कहते हुए उसने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर की तरफ खींचने लगा। "ओह! कहाँ ले जा रहे हो मुझे?" मैं पूरी ताकत से चिल्ला पड़ी। अब उसने अपने थैले से एक प्राचीन सी दिखने वाली किताब निकाली। उसके पन्ने पलटकर कुछ ढूंढते हुए मुझे दिखाने लगा, "देखो... अब तुम ऋणमुक्त हो। इस लोक में तुम्हारा कुछ शेष नहीं बचा। तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा।" उसका आशय समझते ही मैं सन्न रह गई, मानो काठ मार गया हो। अचानक ध्यान आया कि अंशुमन सुबह आने वाले हैं। घर में बेटा भी नहीं है, वह भी परसों ही दोस्तों के साथ बाहर गया है। मैं फूट-फूटकर रो पड़ी, "मैं चली गई तो मेरा घर बिखर जाएगा! मेरे पति मेरे बिना अधूरे हैं... मेरा बेटा... वह तो अभी बच्चा है, मेरे बिना तड़प कर रह जाएगा। नहीं रह पाएगा वह मुझ बिन।" वह देवदूत मंद-मंद मुस्कुराया, "एक और असत्य! कोई किसी के बिना अधूरा नहीं होता मानवी। इस संसार में सब स्वार्थ के रिश्ते हैं।" "चुप रहो! मेरे पति मुझसे बहुत प्रेम करते हैं और मेरा बेटा... उसकी तो जान बसती है मुझमें। मैं अभी कहीं नहीं जाऊँगी।" मैं उस देवदूत को पीछे धकेलकर भगाने का असफल प्रयास करने लगी। उसके अट्टहास से पूरा कमरा सिहर उठा। फिर उसने गंभीर होकर कहा, "चलो, मैं तुम्हारे लिए विधि के विधान में थोड़ा हस्तक्षेप किए देता हूँ... पर मेरी एक शर्त है।" "शर्त?" मैंने चौंककर पूछा। "हाँ, शर्त! तुम्हें प्रमाणित करना होगा कि जिसे मैं स्वार्थ कहता हूँ, वह स्वार्थ नहीं है; और जिसे तुम प्रेम कहती हो, वह सच में प्रेम है। चलो, खेल थोड़ा आसान कर देता हूँ—तुम्हें कल का पूरा दिन उसके साथ बिताना है जिसे तुम हृदय से अपना मानती हो, या जो तुम्हें हृदय से अपना मानता है। बस इतना ही। अगर तुम यह कर सकीं, तो मैं वचन देता हूँ कि तुम्हें मुक्त कर दूँगा। तुम्हारे पास चौबीस घंटे का समय है, पर स्मरण रहे... मैं इसी घर के एक कोने में रहकर तुम पर नजर रखूँगा।" यह सुनकर मैं खुशी से खिल उठी। यह तो बहुत आसान था! मैं हँस पड़ी। "जो चीजें सुनने में बहुत सरल लगती हैं, अक्सर वही सबसे मुश्किल हो जाती हैं। मुझ पर हँसने के बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान दो। और सुनो... यह बात बस मेरे और तुम्हारे बीच रहनी चाहिए। इन चौबीस घंटों के लिए तुम मेरी बंदिनी हो।" यह कहकर वह देवदूत कमरे के एक अंधेरे कोने में जाकर स्थिर हो गया। सुबह के ठीक छह बजे जब डोरबेल बजी, तो मैं समझ गई कि अंशुमन आ गए हैं। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला, मैं उनसे लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगी। "अंशुमन! तुम्हें पता है कल रात क्या हुआ? मैं..." "हटो यार! आते ही ऐसे लिपटकर रोने लगीं जैसे मैं कोई युद्ध लड़ने गया था।" उनका स्वर बेहद उदासीन और रूखा था। वह मुझे किनारे कर सीधे सोफे पर पसर गए और बोले, "जरा चाय बनाना।" मैं भारी कदमों से रसोई की तरफ बढ़ी और जल्दी से चाय बनाकर ले आई। मेरा काउंटडाउन शुरू हो चुका था। चाय का कप बढ़ाते हुए मैंने फिर कोशिश की, "तुम्हें पता है, कल रात अचानक क्या हुआ था?" "यार! थोड़ा चैन तो लेने दो। आते ही शुरू हो गईं! मैं पहले ही सफर से बहुत थका हुआ हूँ।" उनकी आवाज में अब भी वही बेरुखी थी। "कल रात मेरी तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी अंशुमन। मुझे ऐसा लगा जैसे... जैसे अब मैं नहीं बचूँगी।" "अच्छा? पर अब तो ठीक हो न?" उन्होंने अखबार से नजरें हटाए बिना, मुझ पर एक सरसरी निगाह डाली। "ठीक तो हूँ, पर मैं चाहती हूँ कि आज तुम ऑफिस से छुट्टी ले लो। आज का पूरा दिन मेरे साथ बिताओ ना, प्लीज!" "मजाक है क्या? आज ऑफिस में मेरा बहुत इंपॉर्टेंट प्रेजेंटेशन है। अगर सब सही रहा, तो मेरा प्रमोशन पक्का है।" "पर मेरी तबीयत सचमुच ठीक नहीं है..." "पर अब तो तुम ठीक दिख रही हो न?" "प्लीज, अंशुमन! आज के लिए छुट्टी ले लो।" मैं विनती करती रही। "यार, कैसी जिद है तुम्हारी! छुट्टी ले लो, छुट्टी ले लो... नहीं ले सकता मतलब नहीं ले सकता!" वह झुंझला उठे। "तुम्हारे लिए पैसा, प्रेजेंटेशन और प्रमोशन... बस यही सब कुछ है? मेरा कोई अस्तित्व नहीं? मैं कहीं नहीं हूँ इसमें?" मेरी आँखों में आँसू आ गए, मैं उनके पैरों के पास बैठ गई। "हाँ तो यह सब मैं किसके लिए कर रहा हूँ? तुम सबके लिए ही तो कर रहा हूँ!" "नहीं चाहिए मुझे कुछ भी! मुझे सिर्फ तुम्हारा साथ चाहिए अंशुमन। बस आज मत जाओ... प्लीज रुक जाओ।" मैंने उनके आगे हाथ जोड़ दिए। वह खड़े हुए और बैग उठाते हुए बोले, "कभी बाहर निकलकर चार पैसे कमातीं, तब पैसे की कीमत पता चलती! यह सब कितनी मेहनत से आता है, तुम्हें अंदाजा भी नहीं है।" उनका वही रटा-रटाया पुराना डायलॉग। "जब मैं इस घर में नहीं रहूँगी तब तुम्हें मेरी कीमत पता चलेगी!" मेरे मुँह से अचानक निकला। इस बात पर हम दोनों की बहस और बढ़ गई। अंत में वह बड़बड़ाए, "इससे तो अच्छा था कि मैं स्टेशन से सीधा ऑफिस ही चला जाता... बेवकूफ औरत!" और वह नाराज होकर पैर पटकते हुए बाहर निकल गए। मैंने धीरे से मुड़कर कमरे के उस कोने की तरफ देखा। देवदूत वहाँ खड़ा मंद-मंद मुस्कुरा रहा था, मानो मुझसे पूछ रहा हो—'यह कैसा प्रेम है, मानवी?' "हाँ तो ऑफिस भी तो जरूरी है! काम भी तो जरूरी है न... घर में बैठे-बैठे खाली प्यार से पेट तो नहीं भरता!" मैंने रसोई के बर्तन माँजते हुए, एक स्टील का गिलास उस देवदूत की तरफ दे मारा। "अपनी ऊर्जा बर्बाद मत करो मानवी, कोशिश करती रहो।" वह पूरी तरह निश्चिंत होकर मुस्कुराया, मानो उसकी जीत सुनिश्चित हो। मैंने झटपट अपना मोबाइल उठाया और अब अपने बेटे पार्थ को कॉल लगाया। तीन बार पूरी घंटी गई, पर उसने फोन नहीं उठाया। मैं अंदर से पूरी तरह झेंप गई थी। दिल को तसल्ली देने के लिए खुद से ही बुदबुदाई—'ये आजकल के बच्चे भी न... मोबाइल बैग में होगा, शायद इसलिए सुन नहीं पाया।' मैं चेहरे पर एक बनावटी हँसी लाई और फिर कॉल करने लगी, इस बार उसने फोन उठा लिया। "बोलो मम्मा!" उधर से आवाज आई। "पार्थ बेटा, तू कहाँ है? जहाँ भी है, फौरन घर आ जा मेरे पास।" "क्या मम्मा! आते ही मूड खराब मत करो। मैं आपकी परमिशन लेकर ही तो आया हूँ ना? मैं अभी वापस नहीं आ सकता, हमारी पूरी प्लानिंग हो चुकी है दोस्तों के साथ घूमने की।" "अरे, 'नहीं आ सकता' का क्या मतलब है? कल रात से मेरी तबीयत बहुत खराब है बेटा, तू फौरन आ जा, मुझे डॉक्टर के पास जाना है।" "आप तो हमेशा बीमार ही रहती हो मम्मा! तो क्या मैं कहीं बाहर भी न जाऊँ? क्या मुसीबत है यार!" पार्थ चिढ़कर बोला। "अरे! यह क्या तरीका है अपनी माँ से बात करने का? मैं तेरे लिए मुसीबत हूँ?" मेरा गला रुँध गया। "अच्छा मम्मी सुनो, मैं न शर्मा अंकल को कॉल कर देता हूँ, वो आपको डॉक्टर के पास ले जाएँगे।" "मैं किसी और के साथ क्यों जाऊँ? मुझे इस वक्त तेरी जरूरत है पार्थ, तू समझता क्यों नहीं?" मेरी आवाज रोने जैसी हो गई। "क्या यार मम्मा... अब प्लीज अपना मेलोड्रामा शुरू मत करना। मैं कल आ जाऊँगा।" और उसने फोन काट दिया। देवदूत मेरी तरफ देखकर शांत स्वर में बोला, "मैं अब तक तुम्हारे इस 'प्रेम' की परिभाषा नहीं समझ पाया, मानवी। खैर... कोशिश करो, शायद कोई और अपना हो तो..." "वह... वह सच में पहली बार दोस्तों के साथ बाहर गया है न, इसलिए..." मैं रोते हुए बुदबुदाई। "पर तुमने भी तो उससे जिंदगी में पहली बार कुछ माँगा है।" देवदूत ने कहा, "खैर, समय बीत रहा है, कोशिश जारी रखो।" मैंने तीसरी कोशिश की। अपनी पूरी कॉन्टैक्ट लिस्ट पर नजर दौड़ाई। जिन दो लोगों पर सबसे ज्यादा अभिमान था, जब उनसे ही हार गई, तो अब किस पर भरोसा करूँ? मन बुरी तरह बेचैन था और समय रेत की तरह हाथों से फिसलता जा रहा था। तभी मुझे अपनी सबसे पक्की सहेली 'सिया' का ख्याल आया। मैंने उसे कॉल लगाया। इधर से घंटी जाती, उधर से फोन कट जाता। लगातार तीन बार कॉल डिक्लाइन करने के बाद उसने एक रूखा सा मैसेज भेजा— “बार-बार फोन काट रही हूँ, इसका मतलब समझ नहीं आता कि मैं बिजी हूँ?” “मैं भी बार-बार कॉल कर रही हूँ, इसका मतलब मैं बहुत बेचैन हूं तुझे समझ नहीं आता?” “ओह प्लीज! मैं तुम्हारी तरह घर पर खाली नहीं बैठी हूँ।” खाली..... निठल्लापन यानी बरसों तक उसका दुख-सुख सुनना उसके लिए समय निकालना मेरा प्रेम नहीं था? वाह री दुनिया! अब उसका फोन 'नॉट रीचेबल' बताने लगा। मेरे अंदर कुछ टूटकर बिखर गया। इस बार देवदूत को शायद मुझ पर दया आ गई। उसने मेरे पास आकर धीमे से कहा, "उसने फोन को फ्लाइट मोड पर डाल दिया है मानवी, ताकि तुम उसे दोबारा परेशान न कर सको। अब तो समझो... यह दुनिया ऐसी ही है। यहाँ निस्वार्थ प्रेम जैसा कुछ नहीं होता, सब केवल अपनी जरूरतों और स्वार्थ के धागों से बंधे हैं। देख लिया न?" मैं पूरी तरह निशब्द थी। आँखों से बहते आंसू गालों पर सूखने लगे थे, मैं अपनी बची-खुची उम्मीदों पर उँगलियाँ फिराने लगी। बस आज का एक पूरा दिन किसी अपने के साथ बिताना था, बस इतनी सी ही तो शर्त थी। पर कोई 'नॉट रीचेबल' था, किसी के फोन की घंटी बजती रही, तो किसी ने व्यस्तता का मैसेज छोड़ दिया— I'll call you later... मैं हताश और निराश होकर घुटनों के बल बैठकर रोने लगी। मैं इसलिए नहीं रो रही थी कि मैं अपनी हार के बिल्कुल करीब थी, बल्कि इसलिए रो रही थी कि उसे जीतना कितना आसान था मैं फिर भी हार गई। क्रोध, ग्लानि और हताशा के आवेग में आकर मैंने पास पड़ा एक भारी फूलदान उठाया और पूरी ताकत से उस देवदूत के सिर पर दे मारा।

 "मैं इन भौतिक चीजों से परे हूँ मानवी, चोट सिर्फ तुम्हें ही लगेगी।" इस बार उसकी आवाज में एक अजीब सी सख्ती और गूंज थी। और सचमुच, वह फूलदान हवा को चीरता हुआ दीवार से टकराया और उछलकर सीधे मेरे सिर पर आ लगा। सिर से खून की एक गरम धारा बह निकली। उस खून के साथ ही बह गईं मेरी सारी इच्छाएँ, मेरे सारे झूठे भ्रम, मेरा अभिमान और अपनों के प्यार की वह पट्टी, जो बरसों से मेरी आँखों पर बंधी थी। मैंने जीवन भर सबको सिर्फ प्रेम दिया, सम्मान दिया, अपना अमूल्य समय दिया... और आज जब मुझे एक दिन की जरूरत थी, तो सबने अपने हाथ खड़े कर दिए। मैंने नम आँखों से पूरे घर को घूमकर एक बार देखा, जिन दीवारों को कभी प्यार से सजाया था, आज उन्हीं को निहारते हुए मन ही मन उनसे अपनी आखिरी विदा ली। इस रंगमंच पर मेरा किरदार यहीं खत्म होता है। अब कहीं और का पड़ाव था, कोई नया किरदार मेरी प्रतीक्षा में था। मैंने मुस्कुराकर देवदूत की तरफ हाथ बढ़ाया,
 "चलो देवदूत..." सीने का दर्द अब तेज हो चला था, पर इस बार मेरी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। मैंने देवदूत का हाथ थामा और इस झूठे संसार को पीछे छोड़कर एक शाश्वत यात्रा पर निकल गई। पर जाते-जाते मुझे अहसास हो गया था कि मैं तो आजीवन उम्मीदों और झूठे रिश्तों की बंदिनी थी...

आरती


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