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बंधुआ

बंधुआ

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बाबासा, अपने जैसा कहा मैंने कर दिया, अब तो मुझे आजाद कर दीजिए । मैंने आपकी हर बात, हर शर्त मानी है। प्लीज बाबासा इस गुलामी से मुक्त कर दीजिए, आपकी बड़ी कृपा होगी !

अरे कर दिया समझो पर तुम्हें जल्दी काहे की है अभी तो रिसेप्शन भी तो है तब तुम्हारा रहना जरूरी है। अगर तुम नहीं रहोगे तो तुम्हारे बिना कैसे होगा ? इस तरह तुम्हारा जाना सही नहीं होगा। हरि ओम तत्सत !

आपका कहना बिलकुल सही है बाबासा लेकिन अब यह मुझसे नहीं होगा।, उसका सामना मैं कैसे करूंगा ?

वैसे ही जैसे ब्याह किया। मुक्त्ति पाना चाहते हो तो यह करना ही पड़ेगा। हरि ओम तत्सत ! आगे उसकी बात सुने बिना ही बाबासा निकल गये और जय मन मसोस कर रह गया।, एक तो वैसे ही गिल्टी महसूस कर रहा था ! एक बार मिलकर प्रीति से बात करना चाहता था उसे सब साफ-साफ बताना चाहता था मगर उसे मौका ही नहीं मिल रहा था, किसी न किसी बहाने बाबासा ने रोके रखा था, वह वहां से हिल भी नहीं पा रहा था,,, उसके दिमाग में एक ही बात घुमड़ रही थी। कैसे भी करके वह प्रीति को सारी सच्चाई बता दे मगर कैसे ? इतने में डौली जो पहली में पढ़ती थी, उसके पास आई - जय चाचू, देखो ये सम मुझे समझ में नहीं आ रहा है। इतना सुनते ही सारे चौकीदार चौंकने हो गये पर जय ने कोई रियेक्शन नहीं दिया, सवाल समझने लग गया। कनखियों से देखा, पहरेदार आपस में बतिया रहे थे एक-दूसरे को बीड़ी सुलगा कर दे रहे थे । जय को मौका मिल गया, उसने जैसे-तैसे डौली को चार लाइनें लिखकर दी - मैं इनका बेटा नहीं बल्कि एक बंधुआ मजदूर हूं । जब इनके बच्चे पढ़ते थे तब दूर से ही देख-देख कर पढ़ना-लिखना सीख गया । बाबासा की कबसे तुम कर आंख थी इसलिए तुमसे मेरी शादी करवाई। कैसे भी करके वहां से निकलो बस स्टैंड के पास मिलूंगा, सारी बातें मिलने पर बताऊंगा। जितना जल्दी हो सके निकलो । और कागज फाड़कर दिया - ले, अपनी चाची को देना और कहना, जय चाचू ने कहा है ये सम राइट है ना ? जब चाची अकेली होगी तब देना, किसी से कुछ नहीं कहना, ना ही और किसी को देना न बताना, समझी। यह मेरा-तेरा सीक्रेट है दे के आओ, फिर बड़ी वाली चोकलेट दूंगा !   

किधर है बड़ी वाली चोकलेट ?  

देख ये है। है ना बड़ी अब जा । डौली देती है,, चाची - चाची, ये जय चाचू ने सम दिया है आप देखो मैं जाकर चाचू के पास दूसरा सम करती हूं और देकर भागने लगी तो अरे, रुक तो । लकीली उस समय कोई नहीं पास में। मुड़ा-तुड़ा कागज देख होंठों पर मुस्कान आ गई पर कागज की तहरीर पढ़कर मुस्कान उसी पल गायब हो गई।, हां सही है बेटा, मैं पास में रख लूं, मुझे भी सीखना है ना ! 

आपको भी सीखना है, चाचू को बता दूंगी !

कान में बताना और किसी को मत बताना, ठीक है बेटा। ये चोकलेट हमने तुम्हारे लिए रखी थी ।

अच्छा, चाचू ने भी बड़ी वाली चोकलेट रखी है आप किसी को बताना नहीं !

 आप मेरा भी किसी को मत बताना बेटा !

 अच्छा बाबा नहीं बताऊंगी ओहो मुझे देर हो रही है चाची कहते हुए भाग जाती है। इतने में उसकी जेठानी डौली की मां आ जाती है, पेपर अभी तक हाथ में ही था लेकिन जेठानी को देख कर बोली - भाभी जी मुझे बाथरूम जाना है। उसकी तरफ बड़ी ही घृणित निग़ाहों से देखती हुई बोली - ठीक है किसी को बोलती हूं वैसे मुझे भी हेल्प की जरूरत है तुम्हारी सुहागरात रात की तैयारी जो करनी है कहते हुए व्यंग्यात्मक रूप से हंसते हुए बाहर जाती है । प्रीति उसकी हंसी में छुपा व्यंग्य और आंखों में घृणा साफ देख रही थी।, क्यों ? यह देख प्रीति सबकुछ समझ रही थी ! खैर उसके जाते कागज़ अपने पर्स में रख दिया और चुपचाप बैठी रही,,,, कुछ ही देर में जेठानी आ गई साथ में छाया थी, चलिए भाभीसा हम आपको ले चलते हैं । उसने आते-जाते दोनों साथ में चारों तरफ सब अच्छी तरह से देखा मगर थोड़ी देर बाथरूम के पास रुक कर इधर-उधर देखने लगी।, उसे इस तरह देखते हुए छाया ने कहा - भाभी, आपके साथ धोखा हुआ है, सुहागरात के लिए बड़े मालिक आयेंगे अगर आप चाहो तो किसी भी तरह उनके चंगुल से निकल जाना।, मैं पीछे का दरवाज़े की कड़ी खुली रखूंगी अभी निकलेंगे तो सबको पता चल जाएगा फिर बहुत मुश्किल होगा। पीछे का दरवाजा यहीं बाथरूम के पीछे ही है,,,, ये देखिए, थोड़ी देर में सारे काम हो जायेंगे जब दूध रखने आऊंगी तब छोटी टार्च भी ला दूंगी !

लेकिन आपको ये सब। ? जय भैया बहुत अच्छे हैं मेरे भाई से भी बढ़ कर है, पग-पग पर मेरी रक्षा की है, उन्होंने कहा था कि मैं आपकी हेल्प करूं,,,, भाभीसा आपसे एक रिक्वेस्ट है भैया को ग़लत न समझें उनके जैसा जीवनसाथी नसीब वालों को ही मिलता है ! दोनों वापस कमरे में आई तो जेठानी बोली - क्या थे इतनी देर कैसे लगाई ?

भाभी का पेट थोड़ा गड़बड़ है मैंने गोली दी है, सुबह तक ठीक है जायेगा !

बस-बस,आई बड़ी डाक्टर। कौनसी गोली ? 

वो भी एंटामेजोल दस्त बंद होने की !

अच्छा, अब ये सब करना है, मेरी मदद कर, जैसे मैं बताती वैसे सब कर। पंद्रह मिनट में हो जाना चाहिए बाद में तुझे खाना भी बनाना है। ये सब सुनकर छाया ने सवालिया निगाहों से देखा तो उसने कहा - रामसिंह बाऊजी के काम से बाहर गया है उसे आने में देर हो जायेगी वो और प्रीति दोनों समझ गई कि उसे दुबारा आने से क्यों रोका जा रहा है पर उसे एक बार तो हर हाल में आना ही था । थोड़ी देर में दोनों बाहर गई और प्रीति अकेली रह गई, सोच रही थी इस सिचुएशन से निपटा कैसे जाये ? पांच मिनट बाद छाया आई, भाभीसा टार्च लीजिए और भैया ने ये अपार भी दी है।,,, अब मैं आ नहीं पाऊंगी। आप संभलकर जाना यह कहते हुए निकल गई । 

     ज्यों-ज्यों समय बीत रहा था उसकी धड़कने बढ़ रही थी फिर भी खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी, कटार उसने इस तरह रखी कि निकालने में भी आसानी हो और किसी को पता भी न चले । खाना जेठानी ले आई पर उससे खाया नहीं जा रहा था फिर भी खाना तो था ही क्या पता कैसी स्थति हो ! प्रीति को आने वाला समय बहुत ही तकलीफ देने वाला महसूस हो रहा था उसे कैसे भी आने वाली संकट की घड़ी से छुटकारा पाना था हर हाल में। जरा भी कोई आहट होती दिल की धड़कनें बढ़ने लगती ! बस ऐसी ही मानसिक स्थिति से दो-दो हाथ हो रही थी। कुछ देर में। फिर आहट हुई, अब यही आहट दरवाजे तक आई तो एकदम अनजान बन घूंघट निकाल कर बैठ गई ! आने वाला दरवाजा खोला कर अंदर आया और दरवाजा बंद करके पलंग पर आकर बैठ गया । प्रीति का उसने घूंघट उठाया वह नीची नजरें किये बैठी रही। वाकई तुम कितनी खूबसूरत हो ! आवाज़ सुनकर उसने ऊपर देखा - आश्चर्यचकित होकर बोली - बाऊजी आप।,, ये कहां है ? 

कौन ये ? 

आपके बेटा ! 

बेटा ? वो कोई मेरा बेटा नहीं, बंधुआ है ! हम तो तुम्हें अपने लिए ब्याह कर लाये हैं, रोज तुम्हें देखते थे हमारे कलेजे में भूकंप सा उठता था दिल को सुकून ही नहीं मिल रहा था ! हम तो तुम्हें ब्याह नहीं सकते थे तुम्हारे घर वाले भी नहीं मानते एक तो हम ठहरे उम्रदराज। ऊपर से चार बेटे तीन बेटियां सब शादी-शुदा और नाती-पोते, एक बरस पहले हमारी पत्नी भगवान को प्यारी हो गई अब किसी का बंधन भी नहीं था।, बस अब तुम ही तुम थी और हो ! काश। दो-चार साल पहले ही पत्नी स्वर्ग सिधार गई होती तो हमें इतना तड़पना न पड़ता ! भूल जा उसको तू उसकी नाम की लुगाई है असल में तो मेरी है।, वो अब दिखने वाला भी नहीं, भगा दिया उसको ! उसने आजादी चाही हमने दे दी आजादी ! नहींईईई वो बेतहाशा चीख पड़ी और जो कटार थी उसे कमर से निकाल कर खचाखच मारना शुरू कर दिया।, संभलने का मौका ही नहीं दिया, ऐसी उम्मीद भी नहीं थी कि नाजुक दिखने वाली छुई-मुई सी और इस तरह।,,,, बचाव का या किसी को आवाज देने का मौका ही नहीं मिला बेहोश होकर गिर पड़ा ! वह वार पे वार करती रही जब तक वो थक न गई ! सोचा, किसी भी तरह यहां से निकलूं इसी ख्याल से दरवाजे की ओर बढ़ने लगी, नजर कपड़ों पर गई। ख़ून से सने हुए थे, हाथ-मुहं धोकर कर सलवार-कमीज पहन लिए। ननंद रजनी ने सलवार-कमीज दिए थे हंसते हुए बोली - भाभीसा यह सलवार-कमीज पहन लो भैया आपको सूट में देखेंगे तो हैरान हो जायेंगे। अरे ये कॉलेज गर्ल कौन है ? दुपट्टा गले में इस तरह डाला जैसे कि रजनी डालती थी ताकि कोई देखे तो रजनी ही समझे !

जल्दी से बाहर निकल गई बस अड्डे का पता था फिर भी कुछ सूझ नहीं रहा था कि किस तरफ जाये।, यूं ही सामने की ओर भागने लगी। बेतहाशा भागती रही।, भागती रही ! रात के साढ़े बारह बज रहे थे, ऊपर से कृष्ण पक्ष की काली रात। धुप अंधेरा, रास्ता दिख ही नहीं रहा था भागते-भागते थक भी गई थी इसलिए थोड़ी देर के लिए बैठ गई । अभी कुछ ही देर हुई थी।,, उसे किसी के कराहने की आवाज आई, बहुत धीमी थी।, कुछ सोचते हुए उस आवाज की ओर बढ़ने लगी, बीस-पच्चीस कदम ही चली होगी लगा जैसे यहीं कहीं मगर किसी गढ़े से आ रही थी, उसने चारों तरफ देखा।, सामने ही गढ़ा था।, आंखें अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हो गई थी ! डरते-डरते गढ़े के पास पहुंची, ज्यादा गहरा नहीं बस ढलान की तरह था इसलिए पास जाने पर साफ दिखाई दिया, कोई था वहां ! ढलान होने के बावजूद गढ़ा ही था क्योंकि दूसरी तरफ भी जमीन उठी हुई थी, उठाव दोनों तरफ़ काफी ऊंचा था सो निकालना उसके बस में नहीं था । अच्छा हुआ अपना एटीएम कार्ड, दस हजार रुपए और मोबाइल पहले ही सब पर्स में डाल दिया था । मोबाइल की लाइट में देखा, उसका पति जय था।, काफी चोटें लगी हुई थी, लाइट देखकर घबरा गया । घबराहट भी लाजिमी थी, वो ऐसी जगह था जहां किसी की मदद मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता । डरों मत जय मैं तुम्हारी प्रीति हूं।, प्रीति की आवाज सुनकर तसल्ली हुई। प्रतीति तुम ?

हां मैं मगर तुम यहां और इस हालत में कैसे ? तुम तो मेरा इंतजार बस अड्डे पर करने वाले थे ? तुम्हारी उन चार लाइनों ने सावधान कर दिया था मुझे ! पर तुम यहां कैसे?

लेकिन तुम बस अड्डे के बजाय यहां कैसे पहुंच गई ?

घबराहट में मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि किस तरफ जाऊं,,, पर तुम। ?

जो बाबासा तुम्हारे साथ करना चाहते थे वो मुझे कतई गवारा न था । किसी तरह तुम्हें उनके चंगुल से मुक्त करना चाहता था इसलिए तुम्हें बस अड्डे पहुंचने को कहा था । मुझे तो बंधुआगिरी से आजादी मिलने वाली थी तुमसे शादी के बाद । एक बार तुमसे मिलकर सब बताना चाहता था मगर चार-चार पहरेदार मुझे घेरे रहते थे, ऊपर से कहा - पार्टी के बाद छोड़ेंगे तब तक तुम्हारा रहना जरूरी है जबकि पार्टी वगैरह कुछ नहीं सब घर-घर के लोग ही थे । खाने के बाद मुझे कहा - अब तुम जाओ तुम्हारा पैसा और सामान छोटू-मोटू लेकर चलेंगे।, वे साथ में आये बस अड्डे के बजाय जंगल की ओर जाने लगे तब मैंने टोका भी।,, भैया हम जंगल की तरफ कहां जा रहे हैं लेकिन उनका जवाब भी पूछो मत।, अरे जय भैया, यहां के होकर भी तुम्हें नहीं मालूम ? अरे जय बाबू जंगल से तो बहुत ही ही शाॅर्टकट है।, देखना यहां से जल्दी पहुंचेंगे ! आज बाबासा की कार खराब है ना नहीं तो इधर से ही चलते, बातों-बातों में मेरे सिर पर इतनी जोर से लाठी मारी कि मैं गिर गया फिर न जाने क्या हुआ, मुझे कुछ भी पता नहीं। बस होश आया तो खुद को इस गढ़े में पाया ! मेरे पास एक पैसा नहीं सब ले गए और तुम्हें इस तरह सामने पाकर बहुत ही खुशी हुई लेकिन यहां से निकलेंगे कैसे बेहोशी के बाद भी कितना समय ऐसे ही रहा पता नहीं। मुझसे दर्द के मारे हिला भी नहीं जा रहा है। पास में एक धेला भी नहीं ।

पैसे की चिंता मत करो, मेरे पास काफी है और एटीएम कार्ड भी है । जानते हो सुहागरात के लिए कौन आया था,,,, तुम्हारा बाबासा उसे तो मैंने ऊपर भेज दिया सुहागरात के लिए ।, ऐसे में भी दोनों को हंसी आ गई । लेकिन एक-दूसरे के बारे में जानकर आंखें भी बह रही थी मानो अपने दर्द का हिसाब दे रही है । जय प्रीति से हाथ जोड़कर माफी मांग रहा था। मैं तुम्हारा अपराधी हूं प्लीज माफ कर दो मुझे ।

माफी तुम्हें एक ही शर्त पर मिलेगी। जय ने उसके चेहरे पर नजरें टिकादी उन नजरों में सवाल था, कैसे ?

तुम शीर्षासन करो अभी इसी वक़्त और हंस पड़ी।, मगर सच में जय शीर्षासन करने लग गया। प्रीति ने मना भी किया, वो नहीं- नहीं कहती रही मगर उसने तो ऐसी उबड़-खाबड़ ज़मीन पर कर ही लिया ! अरे यार, तुम भी ना।, मैंने मज़ाक किया और तुमने सच में करके भी दिखा दिया।,, ग्रेट !

लेकिन मैंने तो सजा के तौर पे किया।,, यह सजा भी कोई सज़ा मुझे सच में सज़ा मिलनी ही चाहिए ! तुमसे शादी करने के बदले ही बंधुआगिरी से मुक्ति थी सच कहूं तब तो मेरे मन में अपनी आजादी ही मेरे लिए महत्वपूर्ण थी लेकिन तुम से शादी की बात पक्की होने के बाद मुझे तुमसे मिलने नहीं दिया पर अब मेरा मन मुझे कचोट रहा था जैसे मैं बहुत बड़ा पाप और अपराध करने जा रहा हूं तुम्हें बचाने का भी मुझे यही तरीका आसान लगा मगर उस राक्षस ने तुमसे अकेले में मिलने का मौका ही नही दिया फिर भी बचाना तो था ही हालांकि शुरुआत में मैंने मना किया तो धमकी भी करारी थी - तुम शादी नहीं करोगे तो उसे तो हम हासिल कर ही लेंगे। फिर बस,,,, भूल जाओ अपनी आजादी, तुम्हारे पास सुनहरा मौका था और हमारे लिए भी आसानी हो जाती वरना तरीके बहुत है अब तुम सोचो और कल तक बताओ जो भी तुम्हारा निर्णय होगा । इस तरह तो मुझे तुम्हारी सेफ्टी खतरे में लगी शादी पहले तुमसे मिलने भी मुमकिन नहीं था इसलिए सोचा शादी के बाद तुमसे मिलना आसान होगा सुहागरात को तो मिलना होगा ही तभी वहां से निकल लेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ उसने तो यह मौका भी नहीं दिया बड़ा ही कांइया था राक्षस।,, इस लिए तुम्हें वो ख़त लिखा छाया को बता दिया था तुम्हारी हेल्प के लिए फिर भी मैं तुम्हारा अपराधी हूं माफी के लायक भी नहीं। फिर भी मुझे तुम माफ कर सको तो। कहते-कहते रो पड़ा इतनी रुलाई आ रही थी कि सिसकियां भी बंद नहीं हो रही थी। प्रीति को भी रोना आ रहा था । कुछ देर में रुलाई रुकने के बाद जय बोला - तुम चाहो तो तुम अपने घर जा सकती हो, मैं छोड़ने चलूंगा लेकिन तुम मेरे लिए मेरी सबकुछ हो मेरे दिल और मेरी जिन्दगी का हिस्सा हो और रहोगी, चाहे तुम कहीं भी रहो ! तुमने उस राक्षस का खात्मा किया तुम देवी हो, साक्षात काली मां हो !

नहीं जय, नहीं, ऐसा कहकर मुझपर पाप न चढ़ाओ।, मां काली ने मुझे वो शक्ति दी और तुम्हारी वो कटार साक्षात मां का खंजर थी, मां की शक्ति थी इसलिए मुझे देवी मत कहो। मैं तुम्हारी प्रीति हूं और तुम मेरे जय ! तुम्हारी जिन्दगी का सच एवं ईमानदारी ही मेरे लिए ऊपर वाले की दी हुई बहुत बड़ी नियामत है । मेरे सबकुछ हो मेरी जिन्दगी हो, तुम उन चंद पलों में ही मेरी जिन्दगी बन गए थे। तुम मिलते। नहीं मिलते यह अलग बात थी ! इसलिए किस्तम से मिले हो तो दूर होने की बात मत करो !

मैं तुमसे अलग होने की बात सोच भी नहीं सकता लेकिन तुम्हारे साथ धोखा हुआ है, जबरदस्ती हुई है विवाह के नाम पर वो भी मुझे लेकर, मैं भी तो बराबर का गुनहगार हूं ! 

देखो, ऐसा कहकर दुखी मत करो मेरे गुनहगार।,,,अब तो खुश मिस्टर गुनहगार ( ठहाका मारकर ) ! लेकिन जय फिर भावुक हो गया।, यार मैंने कौनसे अच्छे कर्म किए थे कि तुम मुझे मिली कहते हुए प्रीति को अपनी बाहों में भर लिया प्रीति भी उससे लता की तरह लिपट गई।, कुछ मत सोचो सब सपना समझकर भूल जाओ, बस इतना याद रखो कि मैं तुम्हारी प्रीति हूं तुम मेरे जय !


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