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Suresh Mistry

Crime Thriller

3  

Suresh Mistry

Crime Thriller

बिरोलिया डायरीज

बिरोलिया डायरीज

4 mins
144

भाग -2


उत्सुकता 


एक ऐसा शब्द है जो हर किसी में होता है जैसे कोई हमें कह दे की हमें उस रास्ते पर नहीं जाना है तो हमारा ध्यान सब से पहले उसी तरफ जाता है 


बात अब जुलाई महीने की थी हरीश आज अपना काम जल्दी जल्दी ख़तम करना चाहता था ताकि समय से शाम को जाकर कल सुबह घर जाने की तैयारी कर सके।इस बार खली होने की वजह से उसने अपना रिजर्वेशन फर्स्ट क्लास में करवा लिया और दूसरे दिन सुबह वह अपनी ट्रेन के समय पर स्टेशन पहुंच गया बारिश का मौसम था हलकी हलकी बातिश हो रही थी पर अभी तक बारिश जोरों से हुई नहीं थी तो तापमान अभी गरम लग रहा था 

ट्रेन अपने समय से 15 से 20 मिनट देरी से लगी पर रवाना सही समय से हुई।हरीश कुछ न्यूज़ पेपर और मगसिने अपने साथ लाये थे तो उसमें मशगूल हो गए कुछ देर बाद एक स्टेशन पे गाड़ी रुकी तो उन्होंने चाय नास्ता किया और खिड़की के सहारे बैठ कर बहार का नज़ारा देखने लगे हरे भरे खेत अब पीछे छूट गए थे और अब ट्रेन राजस्थान के रेगिस्तान से पसार हो रही थी लेकिन यहाँ बारिश जम कर हो रही थी और रेत की भीनी भीनी खुशबू वातावरण को तरोताज़ा कर रही थी।बारिश की तेज़ी की वजह से हरीश ने अपनी खिड़की के कांच चढ़ा लिए।


करीब रात 9.30 बजे खाना खाने के बाद हरीश ने सोने की तैयारी कर ली और सोने की कोशिश करने लगा पर उसे नींद नहीं आ रही थी सिर्फ इसलिए की जब दो दिन पहले उसके बेटे का कॉल आया और 

उसने उसे बताया की हरीश दादा बनने वाला है तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था और इसलिए अपनी बहु की गोद भराई के लिए वो नडियाद जा रहा था। ख़ुशी भी कभी कभी हमारी नींद चुरा लेती है है ना।

     रात करीब 12.45 को अचानक ट्रेन के ब्रेक चरमरा उठे और एक झटके से ट्रेन रुक गयी और इस झटके के साथ हरीश की नींद टूटी।

उसने देखा बहार ट्रेन किसी जंगल में रुकी है शायद बारिश भी अपने जोरों पर थी हरीश अपनी जगह उठ कर बैठ गया।काफी देर गाड़ी रुकी होने की वजह से उसने अपने खिड़की का कांच नीचे किया और बहार की तरफ देखने लगा। बहार रेलवे गार्ड उनके पास से गुजर रहा था वो कुछ परेशान सा दिख रहा था तभी हरीश ने उससे पूछा क्या हुआ साहब तो उसने चलते चलते ही जवाब दिया इंजन फ़ैल हो गया है साहब थोड़ा टाइम लगेगा इतने कहते हुए वह तेज कदमों से आगे बढ़ गया.

हरीश ने अपने कम्पार्टमेंट का दरवाजा खोला और बहार की तरफ देखने लगा उस तरफ जहाँ वो गार्ड गया था।ट्रेन एक सुनसान इलाके में रुकी थी पर वह से सामने कुछ दूरी पर स्टेशन दिख रहा था शायद वो गार्ड उसी स्टेशन पर गया होगा ताकि इंजन फ़ैल की जानकारी किसी बड़े स्टेशन पर पहुंचा सके टेलीफोन द्वारा और वह से दूसरा इंजन आके गाड़ी को यहाँ से ले जा सके।लोग अब पटरियों पर उतरने लगे थे और कुछ एक्का दुक्का लोग प्लैटफॉर्म की तरफ भी जा रहे थे तभी उत्शुकता वश हरीश भी ट्रेन से नीचे उतरा और दूर दिख रही स्टेशन की रोशनी की तरफ चल दिया उसने चलने के पहले एक टॉर्च अपने बैग से निकल ली फिर उस टॉर्च की रौशनी में वो धीरे धीरे आगे बढ़ गया।कुछ दूर चलने के प्लेटफार्म आ गया जो की ज़मीन से मात्रा एक फ़ीट ऊँचा उठा हुआ था और वह प्लेटफार्म पर जगह जगह घास उगी हुई थी रात के अंधेरे बारिश तो रुक गयी थी पर थोड़ी थोड़ी देर में बिजली कड़कने थोड़ी रोशनी हो जाती ऐसी ही एक छन भर की रोशनी में घास के भींच लगे उस स्टेशन के बोर्ड पर उसकी नज़र पड़ी "बिरोलिया "और कुछ देर के लिए उसके पैर थम गए उसे सज्जन सिंह की बात याद आ गयी लेकिन जैसा मैंने कहा "उत्सुकता "बस उसी के वश वो आगे चल दिया।

    वो आगे चलते हुए स्टेशन मास्टर ऑफिस के बहार आकर खड़ा हो गया वो एक पुराना पत्थरों का बना हुआ क्वार्टर टाइप बड़ा कमरा था शायद अंग्रेजों के ज़माने का अंदर स्टेशन मास्टर ,गार्ड और कुछ और लोग थे शायद ट्रेन के मोटरमैन फ़ोन के आस पास जमे हुए थे।स्टेशन मास्टर इंजन फ़ैल की खबर किसी को फ़ोन पे दे रहा था तभी पीछे से आवाज़ आयी साहब आप ट्रेन में जाकर बैठे ये जगह अकेले घूमने के लिए ठीक नहीं है।

हरीश ने पीछे देखा एक वर्दीधारी हवलदार कंधे पर राइफल लटकाये उसे घूरते हुए यह कह रहा था

हरीश ने उससे कुछ नहीं कहा और वह से चल दिया। अच्छी बारिश की वजह से मौसम में थोड़ी ठंडी आ गयी थी।कुछ आगे बढ़ने के बाद झाड़ियों में कोई चीज़ हरीश को चमकती हुई दिखाई दी फिर उसने वहाँ ध्यान से देखा तो उसे लगा वह कोई खड़ा है कोई आदम कद और अब वह उसे ही घूर रहा है हरीश ने कहा वहाँ अँधेरे में क्यों खड़े ही भाई चलो ट्रेन में बैठो सुना है ये जगह काफी खतरनाक है तब सामने से एक सर्द और रूखी महिला की आवाज़ आई "सही सुना है अपने ।"


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