बोरोलिया डायरीज 3
बोरोलिया डायरीज 3
अब हरीश को कुछ अजीब लगा ये औरत यहाँ क्या कर रही है वह भी इतनी रात गए उसने उसे फिर भी उसने उसे नज़र अंदाज़ करते हुए चलना शुरू ही किया था की फिर इस महिला की आवाज़ आई क्या आप मेरी मदद करेंगे प्लीज और हरीश उस तरफ पलटा वहां अब थोड़ी थोड़ी धुंध नज़र आने लगी। हरीश ने सोचा शायद सच कोई महिला मुसीबत में हो और उसे मदद चाहिए वो उस तरफ पलटा और जैसे ही उसने झाड़ी में पैर रखा उसे लगा वहाँ फिसलन है और वह अपना संतुलन खो बैठा और झाड़ियों की अंदर की तरफ गिर गया उसने देखा उसके कपड़े पूरी तरफ खराब हो चुके थे वह कीचड़ के बीच पड़ा था और तभी उसके कानों में उस औरत की फुसफुसाहट सुनाई दी "आप ने सही सुना था" यह सुनते ही जैसे ही हरीश ने अपना सिर ऊपर उठाया तो वह दंग रह गया उसने देखा वह औरत तो है पर उसका सिर गायब है हरीश का चेहरा फक्क पड़ गया और इतने में उसे लगा जैसे किसी मच्छर ने उसके कंधे पर जोर से डंक मारा हो और धीरे धीरे उसकी आँखें भारी होने लगी और वो दर्द और दहशत के मारे बेहोश हो गया लेकिन बेहोश होने के पहले उसने झाड़ियों से बाहर निकलने की नाकामयाब कोशिश की पर वो कामयाब नहीं हो पाया।
तक़रीबन 2 घंटे बाद दूसरा इंजन आया और ट्रेन चल पड़ी और उस ट्रेन में किसको नहीं पता था की वह यात्री जो फर्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट में सफर कर रहा था वह अब आगे उनका हमसफ़र नहीं रहा।
दूसरे दिन सुबह जब ट्रेन अहमदाबाद पहुंची तो अपने मुँह में पान दबाये खड़ा अमित ट्रेन और उसमें आ रहे अपने पिता हरीश की राह देख रहा था। वह नडियाद नगर निगम कार्यालय में अफसर था उसे ये बिलकुल अच्छा नहीं लगता था की उसके पिता सब कुछ होते हुए भी अपने परिवार से इतनी दूर अकेले अपना जीवन यापन करे पर हरीश की भी जिद थी की जब तक रिटायर ना हो जाऊँ घर पर नहीं बैठूंगा.
ट्रेन प्लेटफार्म पर आ गयी जैसा की उसके पिता ने उसे बताया था फ़ोन पे वह उस कोच के वह जाकर अपने पिता के उतरने की राह देखने लगा पर उसे कहाँ पता था की उसके पिता अब कभी नहीं आयेंगे। .......
