बिरोलिया डायरीज
बिरोलिया डायरीज
भाग -1
रेल यात्रा
कहानी 1980 की है जब अहमदाबाद से दिल्ली जाने के मीटर गेज लाइन हुआ करती थी.एक छोटी पटरी जिस पर सिर्फ डीज़ल या कोयला इंजन चला करते थे।
श्रीमान हरीश चौधरी एक 50 से 55 साल के बीच का आदमी जो की दिल्ली में प्राइम मिनिस्ट्रर ऑफिस का कर्मचारी था उस रात 8:30 बजे दिल्ली के लिए अपनी ट्रेन पकड़ता है अहमदाबाद से। ठण्ड का मौसम था सो वो अपनी ओढ़ने और बिछाने की चद्दरें निकल कर सोने की तैयारी करता है क्युकी वो रात का डिनर स्टेशन कैंटीन में ही कर चूका था तो अब उसे नींद आ रही थी और करीब 9 से. 9.15 बजे तक सो गया। अभी उसे सोये कुछ 3 घंटे हुए होंगे की अचानक उसकी आँख खुली कोई बड़ा स्टेशन था काफी स्टेशन वेंडर अजीब अजीब सी आवाज़ निकल कर अपना सामान बेच रहे थे। हरीश ने उठ कर देखा तो वो शायद आबू तोड़ था वह उठ खड़ा हुआ उसकी बर्थ लोवर थी सो उसने सोचा चलो थोड़ा बहार जाकर देखूं मौसम काफी ठंडा था पर उसे प्यास लग रही थी उसने उतर कर कैंटीन से एक पानी की बॉटल खरीदी और वापस लौट रहा था तभी पीछे से आवाज़ आई "अरे हरीश बाबू आप भी आज सफर पर है।"
हरीश ने पीछे मुड़ कर देख तो ये सज्जन सिंह था उनका पुराना दोस्त और रेलवे पुलिस दल का सब इंस्पेक्टर। हरीश ने उसका अभिवादन करते हुए कहा क्या बात है आज तुम्हारी ड्यूटी इस ट्रेन में है क्या।
सज्जन ने जवाब दिया हां आजकल इस लाइन में खास करके इस इलाके में ट्रेन लूटने की वारदातें बढ़ गयी है इसलिए ज्यादा एहतियात बरतनी पड़ रही है वैसे आप क्या दिल्ली जा रहे है जॉब पर। हरीश ने जवाब दिया हाँ कल मेरी छुट्टियां ख़तम हो चुकी है इसलिए अब जाना तो पड़ेगा ही पापी पेट का सवाल है इतना बोल कर दोनों हँस दिए और ट्रेन के हॉर्न ने उनका ध्यान अपनी ओर खींचा और हरीश अपने कोच की तरफ बढ़ गया जाते जाते उसे पीछे से सज्जन ने कहा हरीश बाबू यहाँ से आगे एक छोटा हाल्ट स्टेशन है बिरोलिया वहाँ अगर किसी वजह से गाड़ी रुके तो आप इस तरफ नीचे मत उतरना। हरीश ने पूछा क्यों तो सज्जन ने उड़ता सा जवाब दिया नहीं कुछ नहीं वो क्या है छोटा सा उज्जड स्टेशन है लूट पाट का खतरा बना रहता है।
ये सुनते सुनते हरीश अपने कोच में सवार हो गया और सज्जन सिंह भी पीछे किसी कोच में चढ़ गया और ट्रेन चल पड़ी. हरीश अपनी जगह आकर सो गया। वह अभी भी सज्जन की बात के बारे में सोच रहा था जो स्वाभाविक थी कुछ बेरोज़गार और खुरापाती नौजवान जो मेहनत नहीं करना चाहते उन्होंने ये लूट पाट का अच्छा धंधा खोल लिया था खास करके ऐसे पिछड़े इलाकों में जहाँ टेलीफोन भी अभी तक मुश्किल से पोस्ट ऑफिसो तक पहुँच पाए थे।
ये सोचते सोचते कब हरीश की आँख लग गयी उसे पता ही नहीं चला सुबह जब आँख खुली तो ट्रेन जोधपुर स्टेशन पर खड़ी थी। उस दिन शाम तक हरीश दिल्ली पहुंच गया और दूसरे दिन से अपनी ड्यूटी पर लग गया। हरीश यहाँ प्राइम मिनिस्टर ऑफिस में क्लर्क का काम करता था और सरकारी क्वार्टर में अकेला रहता था उसका परिवार गुजरात के नडियाद में रहता था उसकी बीवी को मरे अभी कुछ ही साल हुए थे और एक बेटा और बहु थी जो की अपनी नौकरी की वजह से नडियाद में रहते थे। हर चार या पांच महीनों में हरीश एक बार वहाँ जाता और कुछ दिन वहाँ रह आता बस यही उसकी रूटीन लाइफ थी।
क्रमशः
