बदमाश कंपनी-3
बदमाश कंपनी-3
वो पुलिसिया अपनी बाइक से उतरा और उस कबाड़खाने में इधर उधर नजर दौड़ाते हुए चांद सेठ की तरफ बढ़ने लगा। चांद सेठ की नजर जैसे ही उस पुलिसिये पर पड़ी उसने पलक झपकते ही उस मोबाइल को अपनी जेब के हवाले किया और चरसी को खामोश रहने का इशारा किया। तब तक वो पुलिसिया भी उन दोनो तक पहुंच चुका था।
"चांद सेठ..धन्धा पानी कैसा चल रहा है तुम्हारा"उस पुलिसिये ने आते ही एक बनावटी मुस्कराहट के साथ चांद सेठ से पूछा।
"धन्धा तो क्या बताये साहब...बहुत मंदा चल रहा है...साला खरीदने जाओ तो कोई सस्ता बेचने को तैयार नही और बेचने जाओ तो कोई महँगा खरीदने को तैयार नही..धन्धे की वाट लगी पड़ी है साहब"चांद सेठ ने उस पुलिसिये की ओर बुरा सा मुंह बनाकर दुखी स्वर में बोला।
"साले आज तक कभी तुमने बोला है कि मेरा धन्धा मस्त चल रहा है...जब देखो साला रोता ही रहता है"उस पुलिसिये ने चांद सेठ को हड़काते हुए कहा।
"हे हे हे साहब..ज्यादा धंधे का ढिंढोरा पीटने से जलने वालो की नजर लग जाती है"चांद सेठ ने झिड़की खाते ही पलटी मारी।
"क्यो बे चरसी!तू क्या माल ठिकाने लगाने आया है...साले
मोहल्ले के सारे मेनहोल के ढक्कन तो बेच खाये तूने अब क्या बेचने आया है"उस पुलिसिये की नजर चरसी पर भी पड़ चुकी थी।
"साहब...इस मोहल्ले में तो अब कुछ बचा नही तो बेचेगा क्या..चांद सेठ को बोलने आया था की अपने को एक कबाड़ी का रिक्शा दे दे..तो कल से अपन भी गली गली घूम कर कबाड़ इक्कठा करके कम से कम दो रोटी का जुगाड़ कर लेगा"चरसी ने एकदम से किसी शरीफ आदमी की माफिक बात की।
"अबे चांद सेठ ये सूरज आज किधर से निकला है बे! चरसी साला मेहनत करके रोटी खाने की बात कर रहा है"पुलिसिया तंज भरे स्वर में चरसी की ओर देखकर बोला।
"क्या साहब!काहे को अपना खिल्ली उड़ा रहे हों...अब भूखा मरने से तो अच्छा है..की अपन मेहनत करके ही रोटी खा ले"चरसी ने पुलिसिये के तंज का प्रतिकार करते हुए कहा।
"चल ये तो अच्छी बात है बेटा...चांद सेठ दे देना इसको अपना रिक्शा...कम से कम इलाके का एक ढक्कन चोर तो सुधरेगा"ये बोलकर वो पुलिसिया ठठाकर हँस पड़ा।
"क्या साहब कैसी बात कर रहे हो..ये साला चरसी कभी सुधरने वालो में से लग रहा है क्या...साला मेरी रिक्शा ले जाकर दूसरे मोहल्ले में दूसरे कबाड़ी को बेच देगा"ये बोलकर चांद सेठ भी उसी पुलिसिये के अंदाज में हँसा।
"चलो चांद सेठ! बातें बहुत हो गई! बड़े साहब ने भेजा है!इस महीने की एंट्री नही हुई तुम्हारी अभी तक साहब की डायरी में"उस पुलसिये ने अब मतलब की बात पर आते हुए कहा।
"अरे साहब!वो तो!मैंने कब से तैयार करके रखे हुए है!बस कोतवाली की तरफ आने की फुरसत ही नही हो रही थी"ये बोलकर चांद सेठ ने अपनी जेब मे हाथ डाला और जेब से एक नोटो की गड्डी के साथ ही वो मोबाइल भी बाहर आकर जमीन पर गिर कर दो चार पलटी खाकर उसी पुलिसिये के कदमो में लोट लगाने लगा। उस पुलिसए ने तुरंत झुककर उस फ़ोन को उठाया और उस फ़ोन को उलट पलट कर देखने लगा।
"क्या चांद सेठ!लगता है आजकल मोटा माल लपेट रहे हो...तभी इतना महंगा आई फोन रखने लगे हो...ये सत्तर हजार से तो कम क्या होगा"ये बोलकर उस मोबाइल को उसने चांद सेठ की तरफ बढ़ा दिया और वो नोटो की गड्डी उसने हाथ से पकड़ ली। चरसी उस पुलिसिये की बात सुनकर चमकती हुई आंखों से अब चांद सेठ की ओर देख रहा था। चांद सेठ ने एक खिसयानी हँसी के साथ उस पुलिसिये की ओर देखा।
"साहब!इतना माल मिला है...इस गरीब को भी कुछ हरियाली देकर जाओ न..अपना नशा पत्ती अब टूटने लगा है"ये बोलकर चरसी अपने हाथ फैला कर उस पुलिसए की ओर देखने लगा।उस पुलिसए ने पहले खा जाने वाली नजरो से चरसी को देखा फिर पता नही उसके दिल में कौन सा दया का सागर उमड़ा की उसने सौ के दो नोट निकाल कर चरसी की हथेली पर रख दिए और बिना कुछ बोले अपनी बाइक की तरफ बढ़ गया।
"वाह चरसी बेटा!आज तक गिद्धों को मांस नोचते तो बहुत बार देखा है..लेकिन किसी गिद्ध का मांस नोचते हुए किसी को पहली बार देख रहा हूँ"चांद सेठ एक कुतिस्त सी हँसी हँसता हुआ बोला।उसके जवाब में चरसी बस मुस्करा कर रह गया।
"चांद सेठ चल अब एक गड्डी ऐसी ही अपने लिये भी निकाल...बहुत बड़ा आइटम मारकर लाया है तेरे लिये"अब चरसी अपने धन्धे की बात करने लगा था।
"तू कहा उस पुलिसिये की बातों में आ रहा हैं...ये दो नंबर में पांच हजार से ज्यादा का नही बिकेगा..तू दो हजार पकड़ और पतली गली से निकल जा"चांद सेठ ने पांच सौ के नोटो की हरियाली उसके सामने लहराते हुए बोला।
"नही चांद सेठ!अपन को दस हजार मांगता है...अपने को मालूम है...तू इसे पच्चीस हजार से कम में नही बेचेगा"चरसी की जिद भरी बात सुनकर चांद सेठ के चेहरे पर परेशानी के भाव उभर आये थे।
"इतना पैसा तो नही दे सकता तुझे..ज्यादा से ज्यादा तीन हजार दे सकता हूँ..लेना है तो बोल नही तो अपना मोबाइल पकड़ और फूट ले यहां से"चांद सेठ ने हिक़ारत भरे स्वर में बोला।
"वापस कर दे तू मोबाइल..मैं किसी और को बेच देगा..अभी अपने को ज्यादा जल्दी नही है..दो दिन की चरस के पैसे वो पुलिसिया अपन को दे गया है...दो दिन में कही और बेच दूंगा...लेकिन दस हजार से कम में नही बेचूंगा"ये बोलकर चरसी ने चाँद सेठ के हाथ से उस मोबाइल को लगभग झपटने वाले अंदाज में झपट कर अपनी जेब के हवाले कर लिया और वहां से बाहर की ओर चल दिया।
"आखिरी दाम पांच हजार... देना है तो बोल"चाँद सेठ ने न चाहते हुए भी भाव को बढ़ाया। लेकिन चरसी उसकी बात को अनसुना करते हुए बाहर निकल कर उसकी आँखों से ओझल हो गया।
"हमारी बिल्ली और हम ही से म्याऊं...देखता हूँ साले तू कैसे किसी और को ये मोबाइल बेचता है" ये बोलकर चांद सेठ ने अपना एक पुराना सा नोकिया का मोबाइल निकाला और उसी पुलिसिये को फोन मिला दिया जो अभी उससे इस महिने की एंट्री वसूल करके गया था।
**************
चरसी ने जिस युवक के मोबाइल पर हाथ साफ किया था। वो युवक इस वक़्त कोतवाली में एक रोजनामचा लिखने वाले सिपाही के सामने बैठा हुआ था।
"कहाँ हुई आपके साथ ये मोबाइल चोरी करने की घटना"उस सिपाही ने अपने हाथ मे बोलते बोलते तम्बाकू को चूने में मिलाकर रगड़ा और अपनी बात खत्म करते ही उस को अपने मुंह मे रख लिया।
"जी मेन बाजार में...एक तो उस बाजार में भीड़ इतनी होती है कि लोगो के लिये सांस लेने की भी जगह नही होती है..उस पर वहां पर आपकी पुलिस की भी कोई व्यवस्था नही है..जो भीड़ को कंट्रोल करके वहां पर ट्रैफिक को भी निकलने की जगह दिलवा सके"उस युवक ने उस सिपाही को तपे हुए स्वर में कहा।युवक की बात सुनते ही उस सिपाही ने ऐसा मुँह बनाया मानो कोई कड़वी बात उस युवक ने कह दी हो"
"भाई साहब!आप अपनी रिपोर्ट लिखवाने आये हो या पुलिस को ज्ञान पेलने आये हो...पुलिस के जिम्मे और भी बहुत काम होते है...बाजारों में सिर्फ डंडा फटकारने के लिए नही होती पुलिस"उस सिपाही ने उखड़े हुए स्वर में कहा।
"अच्छा!मुझे तो पता ही नही था कि यहां की पुलिस के ऊपर इतनी सारी जिम्मेदारिया होती है..मुझे तो किसी ने बताया था कि यहां की पुलिस सिर्फ उगाही में ही व्यस्त रहती है..दुकानदारों से महीना वसूलती है ताकि दुकानदार बेखौफ होकर अपनी दुकान से दो गुणी जगह बाहर लगा कर उस तीस फीट की जगह को दस फीट की कर सके....जो ऐसे जेबकतरों का काम आसान कर सके जो फिर वहां होने वाली भीड़ का फायदा उठाकर किसी की भी जेब काटकर बड़े आराम से निकल जाए...सच मे बहुत बड़ी जिम्मेदारी है आप लोगों के कंधे पर"उस युवक ने उस सिपाही की हवा खराब कर दी थी।
"भाई इतना क्यों बोल रहा हो तुम..पुलिस ने तुम्हारी जेब काटी है क्या जो उस जेबकतरे का गुस्सा पुलिस पर उतार रहे हो"तभी वहां पर वही पुलिसिया आकर बोला जो कुछ देर पहले ही चांद सेठ के पास से आया था।
"पुलिस ने तो नही काटी...लेकिन कही न कही पुलिस की वजह से मेरी जेब कटी जरूर है"वो युवक अभी भी अपनी बात पर अडिग था।
"जेब कतरे ने क्या उड़ाया है तुम्हारी जेब से"अचानक से उस पुलिसिये ने असल बात पूछी।
"एक आई फोन था..तकरीबन अस्सी हजार की कीमत का"उस युवक के बोलते ही उस पुलिसिये के चेहरे पर एक मुस्कान खिल उठी।
"जागेराम!इस भाई की रपट लिख लो!इन्होने अपने मोबाइल का जिम्मेदार जब पुलिस को ठहरा ही दिया है तो अब पुलिस वो मोबाइल जरूर ढूंढ कर देगी...बल्कि यू कहिए कि फोरन से पेश्तर ढूंढ कर दोगी"वो पुलिसया उस जागेराम नाम के सिपाही की ओर देखकर बोला।
"क्या बात कर रहे हो यादव साहब..पहले ही चालीस पचास शिकायत दर्ज है मोबाइल चोरी होने की...फिर इस आदमी का मोबाइल इतनी जल्दी कैसे ढूंढ दोगे"जागे राम ने हैरानी से यादव की ओर देखा।
"तू बोलता बहुत है जागे...तू इनकी रपट लिखो और इस केस को मेरे नाम करके इन साहब को मेरे कमरे में भेज दो...आगे की कार्यवाही मै देख लूँगा"ये बोलकर यादव वहां से रुखसत हो गया।जागे राम भी अब उस युवक की रपट लिखने में व्यस्त हो गया।
*************
चिलगोजा उर्फ चरसी अभी अड्डे से चरस की एक पुड़िया लेकर निकला ही था की उसकी नजर खम्बे के पास खड़ी फरजाना पर पड़ गई।चिलगौजे ने अपनी जेब पर हाथ मारा..जेब मे अब बमुश्किल सौ रु ही बचे थे।
"साला क्या जिंदगी है..जेब में हजारों रु का माल पड़ा है और फिर भी अपुन फक्कड़ का फक्कड़ है...ये आइटम पता नही चलेगी भी या नही साथ में..जेब मे सिर्फ़ सौ रु ही बचे है"चरसी बड़बड़ाते हुए भी फरजाना की तरफ ही बढ़ा जा रहा था।
"आज कोई मिला नही क्या अभी तक"चरसी फरजाना के पास जाकर शहद से भी मीठे स्वर मे बोला।
"चल बे फुट साले यहां से नशेड़ी कही का...पिछली बार हरामी काम के वक़्त ही सो गया....साला नशे में ऐसा बेहोश हुआ कि चमड़ी बेच कर भी दमड़ी नही मिली"फरजाना उसे देखते ही भड़क उठी थी।
"कितना रोकड़ा मांगती है तू बोल..अपन तुझे कुछ दिनों में नोटो का हार पहना देंगा"चरसी उसे मनाने वाले अंदाज में बोला।
"साले दो रु का फूलों का हार खरीदने की तेरी औकात नही है और तू मुझे नोटो का हार पहनाएगा"फरजाना ने एक बार फिर से उसे झिड़कते हुए बोला।
"देख मेरी जान...अब तू हद से ज्यादा बोल रही है...तू अपनी पसंद की लड़की है...इसलिए अभी तक सहन कर रहा हूँ...नही तो तू मेरे को जानती है ना...मुझे नही तो मेरे मस्ती गुरु को तो जानती है ना"चरसी ने अब मस्ती के नाम की उसे हूल दी।
"जा जा फुट यहां से क्या जान जान लगा रखी है..साले फरजाना सिर्फ उसकी जान बनती है...जिसकी जेब मे रोकड़ा होता है...तेरे जैसे फुकरो को तो मैं अपनी जूती की नोंक पर रखती हूं"फरजाना हर बार चरसी को जलील कर रही थी।
"अच्छा बहुत हल्के में ले लिया तुमने इस चरसी को...साली दो टके की छिनाल...अभी यही से घसीट कर ले जाऊंगा तुझे और दोबारा इस जगह पर कभी नजर नही आयेगी"चरसी ने इस बार उसके हाथ को पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया था।लेकिन तभी फरजाना ने उसे एक जोर का धक्का दिया और नशे में धुत वो नशेड़ी पीछे की ओर लुढ़कता चला गया। लुढ़कते ही उसका सिर एक दीवार से टकराया और वो वही बेहोशी के आलम में खोता चला गया। लेकिन इसके साथ ही उसकी जेब से निकल कर वो आई फ़ोन बाहर गिर चुका था।आई फोन पर फरजाना की नजर पड़ चुकी थी। उस फोन पर नजर पड़ते ही उसकी आंखों में चमक बढ़ चुकी थी..उसने दौड़ कर फोन को उठाया। उसके बाद उसने चरसी के मुंह पर हाथ लगाकर देखा कि उसकी सांस चल रही है या नही। उसकी सांस को चलता हुआ देखकर उसने उस मोबाइल को एक बार फिर से गौर से देखा।
"फरजाना आज तो तेरी किस्मत खुल गई.....इस फुकरे के पास इतना महंगा फोन कहां से आया..जरूर साले ने किसी का उडाया होगा"ये बोलकर उसने उस मोबाइल को अपनी जीन्स की जेब मे डाला और वहां से नौ दो ग्यारह हो गई।चोर को मोर पड़ चुके थे।
************
यादव साहब!इन जनाब का पूरा नाम फूल चंद यादव था और पुलिस में सिफारशी भर्ती हो पाए थे। लेकिन वो सिफारिश भी तभी लग पाई थी...जब अपने खेत को गिरवी रख कर तीन लाख उस सिफारशी के पास पहुंचा नही दिये थे। बस जब से पुलिस डिपार्टमेंट में भर्ती हुए थे..तब से इनका एक ही ध्येय था कि गांव की जमीन को जितना जल्दी हो उतनी जल्दी साहूकार के कब्जे से छुड़वाना है...क्योकि उस तीन लाख की रकम का हर महीने ब्याज अलग से देना पड़ता था। अब पुलिस में जितनी तनख्वाह मिलती थी उसमें तो बस घर बार का खर्चा ही मुश्किल से चल पाता था। ऊपर से इन जनाब की शादी शहर में हुई थी और इनकी उन शहरी बन्नो फूलमती ने इतनी कम तनख्वाह के ताने मार मार कर इनका जीना हराम किया हुआ था।अपनी इन्ही दुश्वारियों के चलते हुए वो अपने महकमे के सबसे भ्रष्ट पुलिसियो में गिनती होने का सौभाग्य प्राप्त कर चुके थे। इस वक़्त वही युवक इस वक़्त हवलदार फूलचंद यादव के सामने बैठा हुआ था और यादव साहब उस युवक के चेहरे की ओर ही देख रहे थे।उन्होंने उस युवक से कुछ बोला था जिसके जवाब पाने के इंतजार में यादव साहब एकटक उस युवक को देखे जा रहे थे।
"आप कह रहे हो कि अपने ही मोबाइल को पाने के लिए मैं आपको दस हजार रु दूं....तो आप एक ही रात में मेरा मोबाइल ढूंढ कर मुझे दे देंगे"वो युवक हैरानी भरें स्वर में बोला।
"देखो राज भाई...ये जो राजनगर है ना बहुत छोटा सा शहर भले ही हो लेकिन ससुरी यहां आबादी बहुत है...अब इतनी बड़ी आबादी में आपका मोबाइल ढूढ़ना बिल्कुल ऐसा है जैसे भूसे के ढेर में सुई को ढूंढना...पूरी रात मुझे अपनी बाइक को दौड़ाना पड़ेगा...अब आपने जिस प्रकार के आदमी के बारे में बताया है..तो ये काम जरूर किसी नशेड़ी भंगेड़ी का है...सोचो आपके लिए पूरे मोहल्ले के नशेडियों को रात भर में ही उठाना पड़ेगा...उसके बाद अगर उसने किसी को वो मोबाइल बेच दिया होगा तो फिर उस आदमी को ढूंढना..अब सरकार तो एक मोबाइल को ढूंडने के चक्कर में इतना पैसा हमे देने से रही..इसलिए आपको बोल रहे है"यादव ने अपने स्वर में मिश्री सी घोलते हुए कहा।
"मतलब!अगर मैं आपको दस हजार रु न दूँ तो आप मेरा मोबाइल नही ढूंढेगे"वो युवक अजीब से स्वर में बोला।
"अब आप खुद समझदार है राज भाई...आपसे पहले पचास आदमियों की रपट और दर्ज है..फिर आपको लाइन में आना पड़ेगा...और फोन मिले न मिले उसकी भी कोई गारन्टी भी नही है"यादव साहब एक मक्कारी भरी हँसी हँसते हुए बोला।
"इस कोतवाली के इंचार्ज कौन है...मुझें उनसे मिलवाओ...,मैं उनसे आपके इस गोरखधंधे के बारे में जानना चाहता हूँ"राज नाम के उस युवक ने यादव की तरफ देखते हुए बोला।
"अभी तो यहां का इंचार्ज मैं ही हूँ..कोतवाली के पुराने इंचार्ज साहब का ट्रांसफर हो गया है...नए इंचार्ज साहब कल यहां अपना पदभार संभालेंगे"यादव ने फंसे हुए स्वर में कहा।
"जो यहां नए इंचार्ज आने वाले है उनका नाम ही बता दो...मैं कल आकर उनसे ही मिल लूंगा"राज ने यादव की तरफ देखकर बोला।
"इन्स्पेक्टर राज मल्होत्रा"ये बोलते ही यादव की नजर रपट की उस कॉपी पर पड़ी जिंसमे शिकायतकर्ता का नाम भी राज मल्होत्रा का ही नाम दर्ज था यादव के चेहरे पर एक बार तो हल्की सी परेशानी के भाव उभरे लेकिन वो तत्काल ही संभल गया।
"आप कौन हो"उसने फंसे स्वर में कहा।
"मैं कौन हूँ...इसको छोड़ो...जब मोबाइल ढूंढने के आपने दस हजार रु रेट फिक्स किये हुए है तो बाकी चीज़ो के रेट भी आपने फिक्स किये हुए होंगे यादव साहब...अपना प्रिंट किया हुआ रेट कार्ड एक बार में ही दिखा दो...क़ातिल को पकड़ने के आपके रेट क्या है...रेपिस्ट को पकड़ने के क्या रेट है...और जब आपने पकड़ने के रेट फिक्स किये हुए है तो आपने छोड़ने के रेट भी जरूर फिक्स किये हुए होंगे यादव साहब...क्यो न हम आपकी ये रेट लिस्ट के बड़े बड़े होर्डिंग इस पूरे राजनगर में लगवा देते है..ताकि लोगो को भी पता रहे कि कोतवाली में आज के ताजा भाव क्या है"वो राज नाम का युवक इस वक़्त बोले चला जा रहा था..और यादव का किसी अज्ञात भय की वजह से मन लरज रहा था।
"अबे जागे राम!जल्दी से स्पेशल चाय लेकर आ बे....हमारी कोतवाली के नए साहब आये है"ये बोलकर खिसियाया सा यादव उस कमरे से निकलने लगा।
"यही रुको....अपनी बर्खास्तगी के आर्डर तो लेते जाओ"वही युवक उस कोतवाली का नया इंचार्ज इंस्पेक्टर राज मल्होत्रा था।
"साहब गलती हो गया ! माफ कर दो साहब!भारी मिस्टेक हो गया साहब..सस्पेंड मत करना साहब...अभी तो वो तीन लाख रु का कर्जा भी नही उतरा है जो इस नौकरी के लिए रिश्वत में दिए थे साहब..ऊपर से अगर सस्पेंड हो गए तो हमारी वाइफ फूलमती भी छोड़कर चली जायेगी साहब"यादव का मन तो इस वक़्त बुक्का फाड़ कर रोने का कर रहा था...लेकिन पुलिस की वर्दी उसे रोने भी नही दे रही थी।
"जब पुलिस में भर्ती ही रिश्वत देकर हुए हो तो अब जिन्दगी भर रिश्वत ही तो लोगे यादव साहब...अब इसकी सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी"राज ने उसकी तरफ हिक़ारत से देखते हुए बोला।
"साहब एक मौका दे दो..आपको फिर कभी शिकायत का मौका नही दूंगा"यादव इस बार हाथ जोड़कर राज के सामने खड़ा हो गया था।
"तुम्हे मौका कैसे दे दूं यादव...तुमने तो अपने भ्रष्ट कारनामो का काला चिट्ठा खुद अपने मुंह से मेरे सामने खोला है"राज मल्होत्रा यादव को बख्शने के मूड में बिल्कुल नही था।
"साहब बस एक मौका मांग रहा हूँ...आपसे पहले जो साहब थे यहाँ उनकी संगत में बिगड़ गया था..क्योकि वो अपनी उगाही मुझ से ही करवाते थे..अब आप आये हो तो आपकी संगत में सुधर भी जाऊंगा साहब...बस एक मौका दे दो"यादव बस किसी तरह से अपने लिए एक बार माफी चाहता था।
"एक शर्त पर तुम्हे माफी मिलेगी यादव...वो जेबकतरा जिसने मेरा मोबाइल उड़ाया है!वो चौबीस घँटे में मुझे कोतवाली की हवालात में चाहिए..अगर वो नही मिला तो तुम्हारी नौकरी गई समझो" इन्स्पेक्टर राज मल्होत्रा ने चेतावनी भरें लहजें में कहा।
"ठीक है साहब! मै सुबह होने तक ही उस नशेड़ी जेबकतरे को आपके कदमो में डाल दूँगा साहब..ये मेरा वादा है"यादव ने एक सैल्यूट ठोकते हुए कहा।
"अभी मेरी बात पूरी नही हुई है...पहले पूरी बात सुनो..इस कोतवाली में जितने भी केस अभी तक पेंडिंग है...उनकी पूरी लिस्ट सुबह तक मेरी टेबल पर होनी चाहिये...उनका निस्तारण कैसे करना है..ये लिस्ट देखकर प्लान करूँगा..अब तुम अपने काम में अभी से लग जाओ"ये बोलकर राज ने उसे बाहर जाने का इशारा किया। राज का इशारा मिलते ही यादव उस अंदाज में वहां से गायब हुआ...मानो कह रहा हो जान बची तो लाखों पाए।
