STORYMIRROR

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Crime Inspirational

4  

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Crime Inspirational

बदचलन

बदचलन

12 mins
401


उर्मि ने सुबह की चाय बनाई और अपने जीजू अवध बिहारी और जीजी वैदेही को जगाने के लिए जोर से आवाज लगाने लगी 

"चाय गरम । चाय तैयार है । जीजू , दी दोनों आ जाइये और गरम गरम चाय की चुस्कियों से दिन की शुरुआत कीजिए" । उर्मि डायनिंग टेबल पर चाय की ट्रे सजाने लगी । 

इतने में उसके जीजाजी अवध बिहारी अपने कमरे से निकल कर डायनिंग टेबल पर आ गये । वैदेही को नहीं देखकर उर्मि ने पूछा 

"दी कहां है जीजू" ? 

"रूम में तो नहीं थी वह । शायद बाथरूम में होगी" । 

उर्मि ने जीजू को चाय का कप पकड़ाते हुए कहा 

"दी तो बैड टी के बिना फ्रेश होने जाती ही नहीं है जीजू" । उसने अपने लिए भी चाय बना ली थी । 

"अरे तो टॉयलेट गई होगी" । अवध बिहारी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा । 


थोड़ी देर बाद भी जब वैदेही नहीं आई तो उर्मि पुन: जोर की आवाज लगाते हुए बोली 

"आ जाओ ना दी ! चाय ठंडी हो रही है" । 

पर कहीं से कोई आवाज नहीं आई तो उर्मि उठी और सीधे बाथरूम के सामने खड़ी होकर कहने लगी 

"जल्दी बाहर निकलो दी , चाय ठंडी हो जायेगी" । 

लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो उर्मि को शक हुआ । उसने बाथरूम का दरवाजा खोला तो वह खुलता चला गया । बाथरूम में कोई नहीं था । 

"जीजू ! दी यहां नहीं है" ! वह जोर से चीखी और डायनिंग टेबल की ओर भागी । अब अवध बिहारी के माथे पर भी चिंता की लकीरें उभर आईं थीं । कहीं कोई अनहोनी होने की आशंका में उसके चेहरे पर पसीना आ गया । उर्मि दौड़ती दौड़ती पूरे घर में वैदेही को ढूंढने लगी । मगर वैदेही कहीं नहीं मिली । 

"क्या रात में दी आपके साथ नहीं थीं" ? 

"मेरे साथ ही थी । मेरे साथ ही सोई थी वह" । अवध बिहारी परेशान होते हुए बोले । 

"फिर कहां गई वे" ? उर्मि लगभग चीखते हुए बोली । 

"मैं भी यही सोच रहा हूं" ? परेशान होते हुए अवध बिहारी ने कहा । 


अचानक उर्मि को कुछ ध्यान आया और वह ऊपर छत की ओर भागी । अवध बिहारी उसके पीछे पीछे भागे । ऊपर छत पर एक कमरा बना हुआ था । उर्मि ने उस कमरे का दरवाजा अंदर की ओर धकेला पर वह खुला नहीं । शायद अंदर से बंद था । उर्मि जोर जोर से आवाजें लगाने लगी 

"दी , दी , दरवाजा खोलो दी ! यहां पर क्या कर रही हो दी" ? और वह दरवाजा पीटने लगी । मगर अंदर से कोई आवाज नहीं आई । 


इतने में अवध बिहारी कमरे की खिड़की के पास चले गये और उन्होंने कमरे के अंदर झांक कर देखा तो डर के मारे उनकी चीख निकल गई । "वैदेही ऽऽऽऽ" 

उर्मि भी दौड़कर खिड़की के समीप आ गई और उसने भी खिड़की से अंदर झांक कर देखा तो उसकी भी चीख निकल गई । कमरे में वैदेही की लाश पंखे से लटकी हुई थी । उसे देखकर अवध बिहारी और उर्मि दोनों सन्न रह गये । उर्मि विक्षिप्तों की तरह चीखने लगी और अवध बिहारी भी पागलों की तरह दरवाजा पीटने लगे । 


रोने पीटने की आवाज सुनकर आस पड़ोस के लोग इकट्ठे हो गये और उन्होंने मौके की नजाकत को देखते हुए अवध बिहारी को पुलिस बुलाने की सलाह दे दी । अवध बिहारी भी समझदार थे इसलिए उन्होंने 100 नंबर पर डायल कर पुलिस को सूचना दे दी । पुलिस अपनी ख्याति के विपरीत तुरंत ही वहां आ गई और मौके का जायजा लेने लगी । पुलिस ने दरवाजा तोड़कर अंदर प्रवेश किया और लाश की फोटोग्राफी करने के बाद उसे पंखे से उतार लिया । फिर अवध बिहारी को एक कमरे में ले जाकर पूछताछ करने लगी 

"आपकी पत्नी ने ऐसा क्यों किया" ? 

"मुझे पता नहीं इंस्पेक्टर । कल दोपहर को हमारी कुछ कहा सुनी हो गई थी । साथ में मेरी साली उर्मि भी थी । चाहो तो उससे भी पूछ सकते हो । कहासुनी भी बहुत मामूली हुई थी । और तो कुछ नहीं हुआ था" । घबराते हुए अवध बिहारी ने कहा । इंस्पेक्टर ने उर्मि को भी अंदर कमरे में बुला लिया था और उसके सामने ही पूछताछ करने लगा 

"क्या कहा सुनी हुई थी" ? 

"अब क्या बताऊं इंस्पेक्टर साहब ? पति पत्नी में तो छोटी मोटी बातें चलती ही हैं । घर की इज्जत का मामला है इसलिए कहने में शर्म आती है । वैदेही तो चली गई पर सोचता हूं कि उसकी इज्जत तो न जाये कम से कम" ? 

"पहेलियां मत बुझाइये, पूरी बात बताइये मिस्टर । यह पुलिस केस है । सत्य जानने का हक है पुलिस को । जल्दी बोलिए कि क्या बात हुई थी आप दोनों में" ? इंस्पेक्टर के स्वर में रुखापन और दृढ़ता दोनों ही थे । 


अवध बिहारी सोचने लगे कि बताऐं या नहीं ? इतने में इंस्पेक्टर ने अपने हाथ का मुक्का तानते हुए कहा "सीधी तरह से बता दो नहीं तो टेढ़ी तरह से मालूम करना हमें भली भांति आता है" । अब तो कोई विकल्प बचा ही नहीं था अवध बिहारी के पास । वह नीची गर्दन करके कहने लगा


"साहब , वैदेही एक बदचलन औरत थी । मुझे शक तो पहले से था पर कल उसकी पोल खुल गई । जब उसकी पोल खुल गई तो उसने आत्म हत्या कर ली । बस यही बात है" । 

"तुम ये कैसे कह सकते हो कि वह बदचलन थी । क्या सबूत है आपके पास" ? 

"मेरी वैदेही से अभी चार पांच महीने पहले ही शादी हुई थी । मुझे वह एक अच्छी लड़की लगी इसलिए मैंने उससे शादी कर ली । पर मुझे उसके अफेयर का पता नहीं चल पाया । शादी के बाद जब हम लोग एक दिन एक मॉल में शॉपिंग करने गये तब वहां पर उसका पुराना प्रेमी खड़ा हुआ था । वह वैदेही को लगातार देखे जा रहा था और उसके आस पास ही मंडरा रहा था । एक दिन उसी लड़के को मैंने अपने घर के बाहर ताक झांक करते देखा था । एक दिन मैं और उर्मि कहीं जा रहे थे । हमारी गाड़ी वैदेही के स्कूल के सामने से गुजरी तो वही लड़का वहां पर भी खड़ा था । वैदेही "मानसी पब्लिक स्कूल" में सामाजिक ज्ञान पढ़ाती थी । इससे सिद्ध होता है कि उसका पुराना आशिक उससे मिलने स्कूल भी जाता था । एक दिन तो वह हमें सिनेमा हॉल में भी मिला था । हमारी सीट के पास ही बैठा था वह । क्यों है ना उर्मि" ? अवध बिहारी ने अपनी बात को पुष्ट कराने के उद्देश्य से उर्मि की ओर देखा 

"हां, इंस्पेक्टर साहब ! मैंने अपनी आंखों से देखा है उस लड़के को । एक बार नहीं , कई कई बार देखा है उसे दीदी के आसपास मंडराते हुए । दरअसल इसमें गलती हमारी ही है" । नीची गर्दन करते हुए उर्मि ने कहा । 

"वो कैसे" ? इंस्पेक्टर ने पूछा । 

"दीदी का उस लड़के से शादी से पहले से ही चक्कर चल रहा था । अक्सर वह हमारे घर के आसपास दिखाई देता था । एक दिन मैंने दीदी को उसके साथ बातें करते हुए देख लिया था । दीदी ने भी मुझे देख लिया था । दीदी का चेहरा डर के मारे पीला पड़ गया था । तब दीदी ने मुझे अपनी कसम दिलाकर इस बात को मम्मी पापा को बताने से रोक लिया था" । सुबकते हुए उर्मि ने कहा । 

"मुझे यह बात क्यों नहीं बताई आपने ? अगर मुझे यह बात पता होती तो मैं उससे शादी हरगिज नहीं करता । इससे सिद्ध होता है कि नौकरी के बहाने से वह बाहर खूब गुलछर्रे उड़ाती थी" । घृणा से अवध बिहारी ने कहा । 

"कैसे गुलछर्रे उड़ाती थी" ? इंस्पेक्टर को भी वैदेही की कहानी में रस आने लगा था । 

"आप खुद ही देख लीजिए" । कहकर अवध बिहारी कमरे के अंदर गये और वैदेही का पर्स लेकर आ गये । उसे इंस्पेक्टर को देते हुए बोले "सबूत आप खुद देख लीजिए" । 

इंस्पेक्टर ने उस पर्स को उल्टा कर दिया तो उसमें से बहुत सा सामान फर्श पर बिखर गया । उस सामान में एक "कंडोम" का पैकेट भी था । 

"क्या अभी भी कोई शक है उसके बदचलन होने में ? वह अपने पर्स में "इसे" क्यों रखती थी" ? उस पैकेट को उठाते हुए अवध बिहारी ने कहा 

"कल क्या हुआ था , वापिस उसी मूल सवाल पर आते हैं" । इंस्पेक्टर तफसील से पूछने लगा । 

"हुआ क्या था । कल शाम को एक दो भिखारी आये थे भीख मांगने । मेरे पास खुले पैसे नहीं थे जबकि वैदेही अपने पर्स में खुले पैसे रखती थी । मैंने खुले पैसे निकालने के लिए वैदेही के पर्स में हाथ डाला तो ये पैकेट मिला । अब आप ही बताइए इंस्पेक्टर साहब कि पर्स में "कंडोम" रखने का क्या मतलब है ? इसे उसके पर्स में देखकर मेरी क्या हालत हुई होगी, सोचकर देखिए ? फिर भी मैंने उसे कुछ नहीं कहा , सिर्फ बदचलन कहा था । एक बदचलन औरत को बदचलन नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ? ऐसा भी नहीं है कि उसने मुझे कुछ उल्टा सीधा कहा हो ? वह बैठकर चुपचाप रोने लगी । मैंने और कुछ नहीं कहा । वह बहुत देर तक रोती रही । उर्मि ने उसे शांत कराया । फिर वह नॉर्मल हो गई । रात को वह मेरे साथ मेरे ही पलंग पर सो गई थी । रात में कब उसकी नींद खुली और कब उसने यह कदम उठाया, मुझे तो पता ही नहीं चला ? इस घटना का यह अंजाम होगा यह हमने सोचा ही नहीं था" । अवध बिहारी की रुलाई फूट पड़ी थी । 


इंस्पेक्टर ने लाश का मुआयना किया तो उसके दुपट्टे से एक कागज निकला । उसमें लिखा था "अपने पति की निगाह में बदचलन होने का शक एक स्त्री के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है । इस अभिशप्त बदन को लेकर मैं जी नहीं सकती हूं । मैं अपनी मर्जी से आत्म हत्या कर रही हूं इसमें मेरे पति और मेरी बहन उर्मि का कोई दोष नहीं है" । उस स्यूसाइड नोट से सब कुछ क्लीयर हो गया था और पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था । 


उस घटना के बाद उर्मि अपने घर आ गई । लगभग तीन महीने पश्चात अवध बिहारी अपनी ससुराल में आये । इधर उधर की बातें करने के बाद उन्होंने मुद्दे की बात पर आते हुए कहा "पापा, यदि आप बुरा ना मानें तो एक बात कहूं" ? 

"जी, अवश्य कहिए । बुरा मानने की क्या बात है" ? 

"जी, बात ऐसी है कि मुझे विवाह तो करना ही पड़ेगा । मेरे पापा भी जोर दे रहे हैं और एक दो रिश्तेदार भी मेरे पीछे पड़ रहे हैं विवाह के लिए । मैं पहले आपकी राय जानना चाहता हूं । क्या आप उर्मि का विवाह मुझसे करेंगे" ? सीधा सपाट प्रश्न किया था अवध बिहारी ने । 


उर्मि के पापा ने कोई जवाब नहीं दिया । बस इतना ही कहा "एक बार उर्मि से बात करूंगा फिर बताऊंगा" 

शाम को उन्होंने इस संबंध में उर्मि से बात की तो उर्मि ने लजाते हुए कहा "जैसा आप उचित समझें वैसा करें" । मतलब उर्मि को इस संबंध से एतराज नहीं था । उसी दिन दोनों का रोका हो गया । विवाह की तिथि भी तय हो गई । 


एक दिन उर्मि एक मॉल में शॉपिंग करने गई । वहीं पर रेस्टोरेंट में उसने उस लड़के को बुलवा लिया जो वैदेही का पुराना आशिक बताया गया था । उसे पचास हजार रुपए देते हुए बोली "प्रखर , तुमने बहुत शानदार अभिनय किया है । दी के आशिक का । जैसा मैंने कहा , बिल्कुल वैसा ही किया है । अब अपना मेहनताना लो और फिर मुझे कभी अपनी शक्ल मत दिखाना" । 

उर्मि की बात सुनकर प्रखर वहीं बैठा रहा , गया नहीं । उसे बैठा देखकर उर्मि ताव में बोली "अब बैठे क्यों हो ? जाते क्यों नहीं" ? 

"मेरे मन में एक बात है , उसे सुन लो । फिर चला जाऊंगा" ।

"ठीक है , बोलो क्या कहना चाहते हो" ? 

"आप क्या समझती हैं कि मैंने ये सब पैसों के लिए किया था ? नहीं , मैं आपसे बेहद प्यार करता हूं और उस प्यार की खातिर मैं आपका आदेश मानकर आपका काम करता चला गया । ये लो आपके पैसे , मुझे नहीं चाहिए । अगर कुछ देना चाहती हो तो मुझे अपना प्यार दे दो , मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए" । प्रखर के चेहरे पर मासूमियत थी । उसका प्यार सच्चा था जो उसकी आंखों से प्रकट हो रहा था । 


प्रखर की बात पर उर्मि जोर से हंसी । कहने लगी "तू क्या मुझे मूर्ख समझता है ? ये सब जो मैंने किया है वो क्या तुझ जैसे "टपोरी" के प्रेम के लिए किया है ? जिस दिन मेरी दीदी वैदेही को देखने मेरे जीजू आये थे , उसी दिन वे मेरे दिल को भा गये । मेरी दीदी का दुर्भाग्य था जो उन्होंने मेरी दीदी को पसंद कर लिया । यदि वे मेरी दीदी को पसंद नहीं करते तो आज वे जिंदा होतीं । वे आत्म हत्या नहीं करतीं । पर होनी को कौन टाल सकता है ? 

जिस दिन जीजू और दी की शादी हुई वह दिन मेरे लिए सबसे बुरा दिन था । मेरा दिल टूट गया था । जिस व्यक्ति से मैं प्यार करने लगी थी , वह मेरा जीजा बन गया था । मगर मैं कुछ नहीं कर सकती थी । लेकिन मैंने उस दिन से ही जीजू को पाने का प्लान बनाना शुरू कर दिया था । 

मैं जानती थी कि दी बहुत भोली हैं, संवेदनशील हैं और जल्दी आवेश में आ जाती हैं । जीजू के समक्ष यदि उन्हें बदचलन साबित कर दिया जाये तो वे निश्चित रूप से आत्म हत्या कर लेंगी । बस , तभी से मैंने इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया । तुम्हें कभी मॉल में, कभी सिनेमा हॉल में तो कभी स्कूल के बाहर बुलाया । तुमसे ही मैंने कंडोम का एक पैकेट मंगवाया जिसे मैंने चुपके से दी के पर्स में रख दिया था । भिखारियों को भी मैं ही लेकर आई थी जिससे उन्हें पैसे देने के लिए जीजू दी का पर्स खोलें और उसमें से उन्हें कंडोम का पैकेट मिले । इसके बाद और कुछ करने की जरूरत नहीं थी । 

सारा काम मेरी योजना के मुताबिक हुआ । न दी को कोई भनक लगी और न जीजू को पता चला । मुझे जो प्राप्त करना था , मैंने कर लिया है । इसलिए अब तू भी चुपचाप अपनी तशरीफ ले जा नहीं तो मैं तुझे भी दी के पास पहुंचा दूंगी । समझे ? चल फूट यहां से ! और हां, इन बातों को किसी से कह मत देना नहीं तो मैं तेरा वो हाल करूंगी कि तू सारी उमर जेल में काटेगा" । 

प्रखर अपना सा मुंह लेकर चला गया और उर्मि विजय के उन्माद में मस्त हथिनी की तरह अपने घर को आ गई । एक चालाक लोमड़ी ने एक चरित्रवान स्त्री का सरेआम चीर हरण कर उसे बदचलन घोषित करवा दिया था । 



Rate this content
Log in

Similar hindi story from Romance