बच्चे मन के सच्चे
बच्चे मन के सच्चे
बहू का नौवां महीना था अतः वह कुछ दिन के लिए मायके गई हुई थी। कुछ ही दिनों में दिवाली थी तो सास ने सोचा इस बार सफाई तो मुझे ही करनी है तो लग गई किचन की सफाई में। नन्हें पोते ने दादी को सफाई करते हुए देख तो पूछा।
"दादी आप इतना काम क्यों करती हो ,मम्मा जब आयेगी तब कर लेगी ना आप अगर इतना काम करोगे तो थक जाओगे ।
दादी ने कहा..."नही बेटा मम्मा के तो बेबी होनेवाला तो वो ये सब काम नहीं कर सकती। दिवाली आ रही है की सफाई तो करनी ही पडेगी वरना जब घर मे मेहमान आयेंगे तो क्या सोचेंगे घर कितना गंदा रखा है।
नन्हे पोते ने बडी सरलता से जवाब दिया दादी मेहमान आयेगे हॉल मे बैठेंगे वहीं से चले जायेंगे। हमारी अलमारी और ड्रोअर खोलकर थोड़े ही देखेंगे तो आपको इतनी सफाई करने की क्या जरूरत है।सोचो अगर आप बीमार हो गई तो फिर मेरे साथ कौन खेलेगा, मेरा ख्याल कौन रखेगा।
दादी आप यह सब काम मत करो मै जब बड़ा हो जाऊँगा तब आपके लिए एक रोबोट बनाऊँगा वो घर का सारा काम करेगा फिर आपको और मम्मा को किसी को काम करने की जरुरत नही पडेगी।
पोते का प्यार और चींता देख दादी ने उसे गले से लगा लिया।
तो दोस्तों बच्चे कई बार ऐसी बाते कह देते है जो हम बड़े सोचते भी नही इसिलिए कहते हैं बच्चे के मन को पढना आसान नही होता।
किसी ने ठीक ही कहा है-
"किसी ने भी अभी तक पूरी तरह से बच्चे की आत्मा में छुपे सहानुभूति, दया और उदारता के खजाने को नहीं जाना है। वास्तविक शिक्षा का प्रयास उस खजाने को खोलना होना चाहिए।
