बाल मनोविज्ञान
बाल मनोविज्ञान
बात उन दिनों की है जब मेरे दोनो बच्चे छोटे थे।
मैं दो बेटों की माँ हूँ दोनो की परवरिश बड़े ही लाड़ प्यार से की है। बचपन में सासू माँ के रहते उन को रसोई में किसी भी सामान को बिना हाथ धोये, हाथ लगाने की इजाज़त नहीं थी। और चप्पल पहन कर रसोईघर में जाने भी नहीं देती थी। ये एक बहुत ही अच्छी बात थी।
स्वच्छता की दृष्टिकोण से मैं भी यही कहती कि बेटे हमेशा स्वच्छता का ध्यान रखो। खाना खाने से पहले भी हाथों को धोना चाहिए।
पर कभी कभी होता भी कि बच्चों के जाने अनजाने बिना हाथ धोयें किसी बरतन को हाथ लगा देते तो सांसू जी से डाँट पड़ ही जाती थी।
दोनों रूआसे हो जाते और बच्चों के मन में इस बात को लेकर एक बंधन की भावना बैठ गयी। अब हर चीज़ को लेकर मुझसे रसोई के बाहर से ही मांगने लगे।अब रसोई में आना भी बन्द कर दिया। मेरे बहुत समझाने पर भी नहीं माने छोटे छोटे काम भी मेरे से ही कराने लगे। मेरे उपर काम का भार और ज्यादा हो गया था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूँ। ना तो सासू जी को समझा सकती थी। सब ऐसे ही चलता रहा। दोनों की पढ़ाई को लेकर मैं चिंता करती। धीरे धीरे पढ़ाई का भार दोनों पर बहुत पड़ने लगा। कभी कभी तो पूरे दिन कमरे के बाहर नहीं निकलते थे। मन में संतोष था की चलो समय व्यर्थ नहीं करते है। कभी -कभी पढ़ते पढ़ते दोनों बहुत थक कर चिड़चिड़ाने लगते। मेरे कहने से थोड़ा खेलते कभी टीवी भी देख लेते थे।
उस समय मैं उन को अपने साथ रसोई के छोटे छोटे कार्यो को सीखाने लगी। उसमे व्यस्त होकर उन का मन भी थोड़ा अच्छा हो जाता था। मेरे साथ रहने से उन को सासू माँ का डर भी नहीं होता था। अब धीर-धीरे बहुत कुछ बनाना सीख लिया। ये सब सीखाना बहुत ज़रूरी है ये सोच कर ही मैने उन को सीखा दिया। मैं जानती थी जब ये बाहर जायेंगे तब ये कैसे अपने दिनचर्या के कार्यो को कर पायेगे। इन को काम करने की आदत नहीं है।
मेरे बड़े बेटे को कुछ समय के लिए बाहर कोचिंग के लिए जाना पड़ा वहाँ जो खाना मिला उस से वह वापस आने के बाद बहुत समय तक पेट की समस्या से परेशान रहा।
तब उस को समझाया की बेटे सभी कार्यो को करना आना चाहिए। अभी तो कुछ समय के लिए गये थे। जब लम्बे समय के लिए जाओगे तो कैसे करोगे।
इसी कारण तुम दोनों को घर के कार्य सीखाना चाहती हूँ कि ज़रुरत पड़ने पर दोनो सभी कार्य कर सको और कोई परेशानी नहीं हो। दोनों ही अब देश से बाहर है जहाँ पर हम भारतीयों का खाना मिलना बहुत कम ही होता है। अब जब भी मन करता है या खाना ठीक नहीं मिलता। खाना अपने आप बना कर खा लेते हैं। मैं भी चिंता से मुक्त हूँ। यहाँ तक की अब जब घर में होते है, मेरे अस्वस्थ होने पर भी सभी घर के काम कर लेते है। बचपन में मैं देखती थी हम बहने तो सब काम.करती थी। पर भाई किसी काम में हाथ नहीं लगाते थे। आज उन के गृहस्थ जीवन में भाभी को घर और बाहर सब काम कर परेशान होते देखती हूँ। आज के इस युग मे जब पति पत्नि दोनों कामकाजी है तो यदि घर में आपसी प्यार और सामंजस्य रखना है तो लड़कों को भी घर के कामों में हाथ बँटाना पड़ेगा तो ही ये संभव है।नहीं तो इस को लेकर छोटी नोक - झोंक भी बड़ा रुप ले सकती है और घर टुटने की कागार तक जा सकता है।
