बाबू जी का आशीर्वाद
बाबू जी का आशीर्वाद
चौबे धर्मशाला में लगी श्री हरीकृष्ण चौबे जी की मूर्ति ही नहीं वरन वह स्वयं भी स्वर्ग से अपने घर और सपनों को इस तरह फलीभूत होता देखकर खुद भी मुस्कुरा ही रहे होंगे। ऋषिकेश में रहने वाले हरीकृष्ण चौबे जी अपनी सारी खेतिहर जमीन को सरकार द्वारा लिए जाने के बाद उन पैसों से हरिद्वार में ही अपना घर बना कर रहने लगे थे। वहीं उनकी सरकारी नौकरी भी लग गई थी। मृत्यु से पहले वह अपने तीन बेटे और एक बेटी का विवाह आदि करके अपनी सारी जिम्मेदारियों से निवृत हो गए थे।
गंगा किनारे घाट पर पुरानी खरीदी हुई जमीन पर अपनी सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने कुछ कमरे बनवा दिए थे। उन्हीं में से ही एक में वह अपनी पत्नी के साथ रहते थे और बाकी कमरों में हरिद्वार आने वाले सज्जन और साधु जनों को वहां रहने का सहारा देते हुए, पूजा पाठ करते हुए ही अपने दिन काट रहे थे। सवेरे शाम का सत्संग और गंगा स्नान का पुण्य लाभ, भरा पूरा परिवार, सारे सुख भोगते हुए पत्नी की मृत्यु के लगभग 3 महीने बाद ही वह भी इस संसार से विदा हो चले।
उनके मरणोपरांत सारे काज आदि करते हुए उनके नाम पर उनके पुत्रों ने बहुत दान पुण्य करे। चौबे जी के घाट वाले घर को तीनों पुत्रों ने मिलकर एक रहने के लिए होटल बनाने का फैसला किया। थोड़े बहुत बदलाव के बाद वह घर चौबे होटल में तब्दील हो गया। क्योंकि वह गंगा घाट के पास था इसलिए उसमें आने जाने वालों की कमी ना थी। उससे आए पैसों को चौबे जी के सब बच्चों के नाम पर बैंक में डाल दिया जाता था और उन्हीं पैसों से होटल में और बेहतर सुविधाओं के साथ और मंजिलें बढाई जा रही थी। उस होटल से आए पैसों को बच्चे बाबूजी का आशीर्वाद बोलते थे। वास्तव में उनके आशीर्वाद के समान ही पैसों में बढ़ोतरी होती जा रही थी। किसी भी भाई या बहन का काम कभी रुकता नहीं था, क्योंकि जरूरत पड़ने पर वह बाबूजी का आशीर्वाद पा सकते थे । परंतु उसमें से निकाले हुए पैसों को वह वापिस जमा जरूर कर देते थे ताकि बाबूजी का आशीर्वाद बना रहे और बढ़ता रहे। साल में एक बार वे जागरण जरूर करवाते थे। धीरे धीरे बाबूजी के आशीर्वाद के कारण चौबे जी का घर और उनके बच्चे बेहद गणमान्य जनों में शोभा पाने लगे। पूरे हरिद्वार में उनका घर बच्चों में प्रेम के लिए भी मशहूर था।
सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा था कि तभी मंझले चौबे भाई का बेटा जो कि पढ़ाई में भी बेहद होशियार था, उसको आगे पढ़ने के लिए विदेश जाने का अवसर मिला। क्योंकि कुछ समय पहले ही उसकी बहन की शादी हुई थी अतः उसको देने के लिए 40 लाख रुपए की रकम देना उनके लिए संभव न था।
वह इस विषय में बात कर ही रहे थे कि छोटे और बढ़के चौबे भैया भी उस साल होटल में होने वाले जागरण और एक और मंजिल बनाने के विषय में बात करने को आए। मंझले की उदासी का कारण जानने के बाद दोनों भाइयों ने बोला बाबूजी के घर में अगर कोई उनका पोता इतना लायक होता है तो क्या बाबूजी उसे आशीर्वाद नहीं देंगे। अपने भतीजे को प्यार करते हुए तीनों भाइयों ने फैसला किया कि हम होटल की मंजिल ना भी बनाए तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता ,लेकिन बाबूजी का पोता पढ़ने से वंचित रह जाए तो यह जरूर हमारे लिए शर्मनाक होगा।
होटल के जमा हुए सारे पैसे मंझले भैया के पुत्र राकेश को देकर विदेश में पढ़ने को भेज दिया गया। इस घटना के बाद भले ही उनका होटल आगे ना बड़ा हो, लेकिन एक भातृ-प्रेम का उदाहरण जरूर सबके सामने प्रस्तुत हो गया था। हालांकि मंझले ने अपने मन ही मन में निश्चय तो कर लिया था कि अपनी पुत्री के विवाह में लिए कर्ज के बाद वह यह पैसे भी चुकाएगा जरूर।
सबके पैर छूकर विदेश जाते राकेश ने भी अपने मन में कोई निश्चय तो करा था। घर के पहले होशियार और विदेश जाने वाले बच्चे को प्रत्येक भाई ने कोई नसीहत तो नहीं दी बस केवल इतना ही कहा कि तू बाबू जी का आशीर्वाद ही नहीं लेकर जा रहा है बल्कि इस घर के संस्कारों की भी परीक्षा देने जा रहा है, ख्याल रखना। अश्रुपूरित नजरों से सब ने उसे विदा किया।
आज इस बात को 6 साल हो गए। होटल तो चौथी मंजिल बन ही रहा था लेकिन अबके बाबूजी के पोते राकेश ने विदेश से आकर वहां ही साथ वाली जमीन लेकर उसमें कुछ कमरे बनवाए, और बाबू जी की बड़ी सी मूर्ति स्थापित करी थी।
हरीकृष्ण चौबे धर्मशाला का बड़ा सा बोर्ड अपने होटल के साथ लगते हुए घर का हर बच्चा बाबूजी के आशीर्वाद को महसूस कर रहा था और गर्व से सबका सीना चौड़ा हो रहा था। सच ही है यह केवल बाबूजी का आशीर्वाद ही नहीं बल्कि उनके दिए हुए संस्कार भी थे जिनके कारण कि ना केवल बच्चों की इच्छापूर्ति हुई ,अपितु बाबू जी का भी धर्मशाला बनवाने का सपना पूर्ण हुआ। ऐसा लगता था मानो बाबू जी की मूर्ति नहीं बल्कि वह खुद ही खड़े मुस्कुरा रहे हों।
