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V. Aaradhyaa

Inspirational

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V. Aaradhyaa

Inspirational

बाबुजी हम जवानों के साथ क्यों

बाबुजी हम जवानों के साथ क्यों

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"अरुण भैया! काफ़ी अरसे बाद हम सब इकट्ठे हुए हैँ। क्यों ना सब मिलकर पिकनिक पर चलें? "

काव्या ने लाड़ से ठुनकते हुए कहा।

"अरे! देखो तो काव्या मासी कैसे बच्चों की तरह ज़िद कर रही हैं!"

विदिशा की दस साल की क्यूट सी बेटी मोनी के कहने पर अरुण के बेटे अंकुश का ध्यान भी उधर गया और वह भी मोनी की हाँ में हाँ मिलाते हुए बोला,

"काव्या बुआ बच्चों जैसे उछल रही हैं!"

अब तक वरुण के दोनों बच्चे सोंटू और चीनू भी ताली बजाकर हँसने लगे थे। पाँच साल के सोंटू और तीन साल की चीनू को कुछ समझ नहीं आया था। बस उसके कजिन मोनी दीदी और अंशु भैया हंस रहे थे। उनके लिए यही वजह काफ़ी थी ताली बजाकर हँसने के लिए।

सभी कजिन में बड़ी थी दस साल की मोनी।

फिर आठ साल का अंशु और उसके बाद सोंटू और चीनू। सबकी फेवरेट थी उनकी स्मार्ट काव्या मासी उर्फ़ काव्या बुआ। बच्चों के लिए काव्या का यह रूप बिलकुल नया था। वैसे भी चारों भाई बहन में काव्या सबसे छोटी थी और सबसे स्मार्ट भी।


काव्या ने आगे कहा कि,

"और हाँ... पूरा परिवार मतलब पूरा परिवार। मम्मी पापा भी साथ चलेंगे!"

तभी तपाक से वरुण की नखरीली पत्नी पालिका के मुँह से हठात निकला,

"हमारे साथ बुजुर्ग जाकर क्या करेंगे? "

बोलते ही पालिका ने अपनी जुबान समेट ली पर उससे क्या होता है। बात तो मुँह से निकल चुकी थी। काव्या के छोटे भैया उर्फ़ पालिका के पति वरुण ने तुरंत पालिका की ओर आँखें तरेरकर देखा और सबकी नज़र बचाकर उसका हाथ यूँ दबाया जैसे कहना चाहता हो,

"अभी तुम अपनी बकवास बंद करो!"

पति के आँखों की भाषा समझकर पालिका ने बात को सहज़ बनाने की भरसक कोशिश करते हुए कहा,

"मेरा मतलब है कि दिन भर घर से बाहर माँ बाबूजी क़ो परेशानी होगी!"

अब तक घनश्याम जी भी अपनी छोटी बहू के मनोभाव समझ चुके थे। सो संकोच के साथ बोले,

"सही तो कह रही है छोटी बहू। मैं बुजुर्ग तुम नौज़वानों में जाकर भला क्या करूँगा!"

वैसे तो राधिका जी का भी बड़ा मन था जाने का। पर अभी पति की हाँ में हाँ मिलाकर चुप हो गई।

आइये... आपको घनश्याम जी की फूलवारी के सभी फूलों से परिचय करा देते हैं।

घनश्याम जी और राधिका जी के चार बच्चे हैं। सबसे बड़ा अरुण उसके बाद विदिशा फिर वरुण और सबसे छोटी काव्या।

विदिशा की शादी सबसे पहले हुई। उसकी बेटी है मोनी। अरुण का बेटा है 'अंशु'। उसके बाद छोटे बेटे वरुण के दो बच्चे हैं, बेटा सोंटू और बिटिया चीनू।

घनश्याम जी और राधिका जी की सबसे छोटी काव्या की शादी को अभी डेढ़ साल ही हुए हैं। घनश्याम जी चार साल पहले रिटायर्ड हो चुके हैं और मूरी में ही रिहायशी इलाके में जमीन लेकर बड़ा सा हवादार तीन मंज़िला मकान बनवाकर अपने बड़े बेटे अरुण के साथ रह रहें हैं। वैसे तो घनश्याम जी देखने में ह्रष्ट पुष्ट हैं पर अपने मीठे के शौक की वजह से मधुमेह की बीमारी ने उनसे अच्छी खासी मित्रता कर रखी है। और वह दिन भर तो डॉक्टर के कहे अनुसार दवाइयां लेते हैं और अपनी पत्नी के निर्देश के मुताबिक खानपान का ध्यान रखते हैं पर अगर फ्रिज में या कहीं और मिठाई रखी हुई दिख जाए तो अपनी मित्रता निभाते हुए चुराकर खा लेते हैं राधिका जी उन्हें प्रतिदिन सुबह मॉर्निंग वॉक पर भेजती है तो थोड़ी दूर चलकर किसी टपरीवाले की मीठी चाय मठरी वगैरह खाकर दोस्तों संग बतियाकर हँसते हुए घर वापिस लौटते हैं। तीन साल से टहल रहे हैं पर क्य मज़ाल जो तोंद ज़रा सी भी कम हुई हो।


इधर उनके लिए करेले का जूस बनाते हुए राधिका जी सोचतीं...

"रोज टहलते हैं इतना परहेज़ भी करते हैं खाने पीने का पर ये मुई डायबीटीज कम क्यूँ नहीं हो रही?"

अब भोली भाली राधिका चपल चंचल नटखट घनश्याम जी की चतुराई कैसे समझती?

खैर... राधिका जी के करेले के जूस का ग्लास छोड़िये और यहाँ आइये जहाँ गर्म गर्म चाय, समोसे, जलेबी और गुलाब जामुन की बहार है।

सबसे बड़ा अरुण फिर विदिशा उसके बाद वरुण और सबसे छोटी काव्या चारों भाई बहनों का बचपन बहुत ही लाड प्यार में बीता था। अब जब इसबार गर्मी छुट्टी में एकसाथ मिले तो समोसा कचौड़ी, जलेबी ना खाएं तो बड़ी बेइंसाफी हो जाएगी ना।

अब के संजोग ऐसा हुआ कि चारों भाई बहन गर्मी की छुट्टियों में इकट्ठे कटे हुए थे और सबका पास के पिकनिक स्पॉट राज़रप्पा जाने का कार्यक्रम बना। छोटा सा शहर था मूरी और उससे लगा हुआ था राजरप्पा। आने जाने में बमुश्किल दो से ढाई घंटे लगते। लेकिन चुँकि घनश्याम जी शुगर पेशेंट थे। और इसलिए देर तक उन्हें खुद को लघुशंका के लिए रोक पाना मुश्किल होता। इसलिए वह नहीं जाना चाहते थे।

अपने पापा की यह छोटी सी मुसीबत काव्या समझ रही थी। उसके मन में एक बात आई और उसने अपनी भांजी मोनी का हाथ पकड़ा और मार्केट चली गई। वहां से आने के बाद उसने अपने पापा के कमरे में गई और पापा से कहा,

"पापा! देखिए, मैं आपके लिए क्या लाई हूँ। आप बेझिझक इसे यूज़ करिए। आप देर तक बाहर आराम से रह पाएंगे। आपको कोई प्रॉब्लम नहीं होगी। इसे यूज करना बहुत आसान है। प्लीज पापा,मना मत कीजिए!"


तब तक राधिका जी भी कमरे में आ गई थी। और उन्होंने भी घनश्याम जी को इस बात के लिए उत्साहित किया कि प्रेरित किया कि वह काव्या की बात मान लें।

थोड़े संकोच से घनश्याम जी ने काव्या के हाथ से वह पैकेट ले लिया। वह एडल्ट डायपर का पैकेट था।

घनश्याम जी ने सुन रखा था इसके बारे में। टी. वी. में ऐड भी देखा था। आज सामने से देखकर उनके मन में भी उसे इस्तेमाल करने की उत्सुकता जगी।

ट्रायल के लिए घनश्याम जी ने उसी समय एडल्ट डायपर यूज़ किया और उन्हें बहुत आराम महसूस हुआ। अब तो वह बाहर पिकनिक जाने के लिए बिल्कुल तैयार हो गए थे। शाम की चाय के समय घनश्याम जी ने खुद आगे बढ़कर कहा कि,

"अरुण बेटा! कल एक टवेरा और एक जीप का इंतज़ाम कर लो। हमारा पूरा परिवार उसमें आ जाएगा। हम सब कल राजरप्पा पिकनिक के लिए प्रस्थान कर रहे हैं!"

घनश्याम जी का ऐसा कहना था कि परिवार में सब खुश हो गए।

और सब काव्या को आँखों ही आँखों में धन्यवाद कर रहे थे। जिसने बाबूजी को डायपर यूज़ करने के लिए मना लिया था।

उस दिन राजरप्पा में पिकनिक पर ऐसा समां बांधा घनश्याम जी ने कि सब आश्चर्य से भर गए।

अंताक्षरी का दौर चला तो पुराने गानों का इतना सुंदर क्लेक्सन था उनके पास कि सब मंत्रमुग्ध होकर सुनते रह गए। कई गाने तो राधिका जी को देखकर गा देते और राधिका जी शरमाकर रह जाती।

आज घनश्याम जी की ललक और चेहरे की चमक नौजवानों को भी मात दे रही थी।



दरअसल बढ़ती उम्र कभी उदासी या बुढ़ापा नहीं लाती। बल्कि लोगों द्वारा की जा रही उपेक्षा और बेलौस व्यवहार बुजुर्गों के अंदर जीने की उमंग कम कर देता है। और वह खुद के अमोद प्रमोद से अलग करके उदास और एकरस जिंदगी जीने पर मजबूर हो जाते हैं। जबकि प्यार मिले, सम्मान मिले और परिवार का सहयोग मिले तो फिर तो कोई भी उम्र हो कोई भी दौर हो इंसान खुश रह लेता है।

आज जो आत्मविश्वास और चेहरे पर अनोखी सी चमक घनश्याम जी के चेहरे पर थी वह सिर्फ डायपर पहनकर एक समस्या से निजात पाने की नहीं थी बल्कि परिवार का प्रेम सम्मान उनका आत्मविस्वास बढ़ा रहा था। और चेहरे की चमक दुगनी कर रहा था परिवार द्वारा उनके हर रूप को अपनाए जाने की खुशी।

जब हमें कोई हमारी कमी और खूबियों के साथ अपनाता है तो हम और भी बिंदास और बेखौफ हो जाते हैं।

घनश्याम जी भी आज खुद के अपनाए जाने के भाव से अभिभूत थे।

राधिका जी आज अपने उदास और खिन्न से रहनेवाले पति का कोई और ही रूप देख रही थी और छुपछुपकर घनश्याम जी की बलैयां ले रही थी। उम्र के इस पड़ाव पर जहां पति पत्नी के बीच शारीरिक आकर्षण उतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता जितना मन एक दूसरे में रिलमिल जाता है।

ऐसा ही तो आत्मिक रिश्ता था राधिका जी का अपने घनश्याम से।

उनकी मॉडर्न नखरिली बहू पालिका अपने सास ससुर के रिश्ते की इस कमाल की केमिस्ट्री समझने की कोशिश कर रही थी। जिसमें इस उम्र में भी पति की आंखों में पत्नी के लिए प्रेम का अथाह सागर उमड़ता हो और पत्नी अब भी पति की प्यार भरी नजरों का सामना न कर पाने की स्थिति में नजरें झुका लेती हों।



आज गाना और पुराने एक्टर्स की नकल उतारना वगैरह ऐसी गतिविधियां थी कि सबको बहुत मजा आ रह था।

यहां तक कि पालिका को अपने कहे पर थोड़ी ग्लानि हुई जो उसने कहा था कि,

"हम यंगस्टर्स के साथ बुजुर्ग जाकर क्या करेंगे!"

आज की तरह का आनंद पालिका ने कभी महसूस नहीं किया था।

अंताक्षरी खेल में वह भी घनश्याम जी की टीम में आ गई थी ओर उनके साथ जोश में खूब गा रही थी। गाते गाते एकबार उसने घनश्याम जी का हाथ यूं थामा जैसे अनजाने में पकड़ा हो। यह उसका सॉरी

बोलने का बड़ा ही प्यारा तरीका था जिसे घनश्याम जी समझ गए। समझते कैसे नहीं...?

उनकी लाडो काव्या भी तो ऐसे ही माफी मांगती है।

घनश्याम जी ने भी पालिका के सिर पर अपना आशीर्वाद वाला हाथ रख दीया। जिसे देखकर सबकी आंखें जुड़ा गईं।

इधर राधिका जी अलग काव्या पर प्यार बरसाए जा रही थीं कि वह किसी तरह घनश्याम जी को डायपर पहनने को राजी करवा पाई और आज वह जिंदगी का लुत्फ उठा रहे थे।

कहना ना होगा कि उस रात सब वहीं रुके और अगले दिन वापिस आए। फिर भी उनका जोश नहीं कम हुआ था।

अब घनश्याम जी काफी चुस्त दुरुस्त रहते। कहीं आने जाने में आनाकानी नहीं करते थे।

अब कहीं भी जाना होता तो घनश्याम जी उस समय डायपर यूज कर लेते। ना कोई झंझट होता ना टेंशन। आराम से घूम फिरकर आते।

एक तरह से बच्चों की समझदारी से और घनश्याम जी की साझेदारी से उनका जीवन आसान हो गया।


दरअसल यह तभी संभव हो पाया कि....

घनश्याम जी बहुत आसानी से बदलाव को स्वीकार करते हैं और नई व आधुनिक चीज़ेँ इस्तेमाल करने में नहीं हिचकते हैं। उन जैसे प्रगतिशील विचारधारा वाले लोग नई चीजों को अपनाकर अपना जीवन आसान करते हैं। उनकी वजह से उनकी खुद की जिंदगी तो आसान होती ही है। परिवार में अन्य लोग भी खुश रहते हैं।

वैसे वह राजरप्पा वाली पिकनिक तो घनश्याम जी के लिए यादगार बन गई थी। काव्या की बात मानकर उनकी परेशानी तो दूर हुई ही, राधिका जी भी काफ़ी खुश थीं। बच्चे तो माता पिता को खुश देखकर आनंदित थे। काव्या के फोन की पूरी गैलरी लगभग इस पिकनिक के फोटो से ही भर गई थी। यादें जो जमा कर रही थी वो। काफी अरसे बाद पूरा परिवार बाहर जो आया था।

नई चीजें नए उत्पाद हमेशा खराब नहीं होती। कई सारे नए उत्पाद हमारे रोजमर्रा की जिंदगी को ज्यादा आसान कर देते हैं। यह बहुत महंगे भी नहीं होते और टिकाऊ भी होते हैं। उस दिन से घनश्याम जी डायपर तो यूज़ करते ही थे। साथ में हमेशा अपने दवा का किट भी लेकर चलते थे। एक तरह से उनकी जिंदगी में एक साथ ढेर सारे बहारें आ गई थीं और अब वह सिर्फ थके हारे उदास बुजुर्ग बनकर नहीं बल्कि एक नौज़वान सी उमंगे लेकर ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठाना चाहते थे।

रजरप्पा ही नहीं सोसायटी की अन्य गतिविधियों में भी एक घनश्याम जी भाग लेने लगे थे। इस मामूली से बदलाव ने उनमें आत्मविश्वास भर दिया था। और उनकी जीवन शैली किसी सरल कर दी थी।


पिकनिक से वापिस आकर उन्होंने जब काव्या का पीठ थपथपाया तो काव्या ने भी अपने पापा का पीठ थपथपाते हुए कहा,

"प्राउड ऑफ़ यू पापा! आजकल के बुजुर्ग बच्चों की बात कहां मानते हैं? जबकि अगर वह हमारी बात मानने लगे तो उनकी जिंदगी हम सुविधाओं से भर दें!"

तभी घनश्याम जी ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा,

"यहाँ बुजुर्ग कौन है? मैं तो नौज़वान हूँ!"

बाप बेटी की इस चुहल से सब हंस पड़े।

तब तक तीसरी पीढ़ी की लीडर मोनी सामने आई और नानाजी का हाथ पकड़कर बोली,


"नानू! अगर आप यंग हो तो हमें आइसक्रीम दिलाने ले चलो ना। ये लोग सारे तो थक गए हैं!"


तब घनश्याम जी उल्लासित होते हुए बोले,

"क्यों नहीं बच्चों! मैं चलता हूँ तुम सबको आइसक्रीम दिलवाने। इन्हें छोड़ो... ये बुजुर्ग हो गए अब!"

उनकी बात पर फिर एक समवेत ठहाका गूँज उठा। काव्या बड़े प्यार से अपने पापा को देख रही थी। उनके व्यवक्तित्व में एक आत्मविश्वास आ गया था और चेहरे पर अनोखी चमक।

दो पीढ़ी को जोड़ने में काव्या एक कड़ी का काम कर रही थी और परिवार में सब आपस में समंजस्य बैठाकर साथ चलने की कोशिश कर रहे थे।

आखिर... एक दूसरे का साथ देना और अपनाकर चलना ही तो परिवार का ध्येय होता है।



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