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अवरोध

अवरोध

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यह उन महानगरों की कहानी नहीं है जहां बिजली चौबीसों घंटे सिर पर सवार रहती है, बल्कि उन कस्बों की कहानी है जहां हमेशा ही बिजली की आँख मिचौली चलती रहती है। यह आँख मिचौली जहां खाने बनाने के क्रम में चूल्हे-चौके और बर्तनों से जूझ रही माँ और किताबों में सिर खपा रही दोनों बहनों के लिए परेशानी लेकर आती, वहीं यह मुझे आनंद और मस्ती का भरपूर अवसर उपलब्ध कराती। हर शाम खेलने के बाद घर लौटने पर पढ़ने के लिए बैठते ही मैं बिजली गुल होने की प्रतीक्षा करने लगता। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस मामले में मुझे कभी निराश नहीं होना पड़ा। बिजली जाते ही खुशी से आह्लादित होकर मैं तेजी से बाहर मोहल्ले में खेलने के लिए भाग जाता, जहां पहले से ही मेरे हमउम्र पड़ोसी लड़के इकट्ठा रहते थे। उसके बाद तो हम धमा चौकड़ी मचाते हुए दौड़ लगाते। हम लुका-छिपी और छुआ-छुई जैसे अंधेरे में खेले जा सकने वाले खेलों के मजे लूटते। केवल यही वह सुनहरा मौका होता जब कोई भी मुझे घर जाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता था। माँ भी खाना बनाने का काम निपटा जातीं। पिताजी अपने दोस्तों के साथ सड़कों पर चहल-कदमी करने निकल जाते। केवल दोनों बहनें लालटेन की धुँधली रौशनी में किताबों में डूबी होतीं।

हालांकि यही आनंद उस समय महंगा साबित होता, जब होमवर्क पूरा नहीं होने पर स्कूल में मुझे सख्त सजा दी जाती थी। उन दिनों न तो, ‘‘एक दो तीन बारह तेरह’’, ‘‘ए बी सी डी ई एफ जी .... ’’ और ‘‘एक दूनी दो, दो दूनी चार’’ जैसे फिल्मी गानों और न ही शिक्षा के क्षेत्र में आज जितने शैक्षिक नवाचारों का अविर्भाव हुआ था। गिनती, पहाड़े और वर्णमालाएं याद कराने के लिए हमें बेंचों पर खड़ा करने, मुर्गा बनाने और बेतों से पिटाई करने जैसे दुखदायी तरीके अपनाए जाते थे। उन दिनों यह आम धारणा थी कि पढ़ाई और पिटाई में घनिष्ठ संबंध है। इसलिए पढ़ाई के क्रम में पीटने और सजा देने में किसी तरह की कोताही नहीं बरती जाती थी, बल्कि कई बार तो लगता था कि पिटाई ही मुख्य काम है और पढ़ाई गौण है। अक्सर तो लड़कों के घरों से ही उनकी ज्यादा से ज्यादा पिटाई करने की सिफारिशें आती थीं। 

इस मामले में मैं थोड़ा भाग्यशाली था, क्योंकि पिताजी पिटाई के सख़्त खिलाफ थे, लेकिन और मामलों में दुर्भाग्यशाली था। जहां मेरे दोस्तों के पास खेल कूद और धमा चौकड़ी मचाने के लिए भाई-बहनों की पूरी फौज उपलब्ध थी, वहीं अपनी उम्र के हिसाब से मैं बिल्कुल अकेला था। मन बहलाव के लिए मुझे मात्र खिलौनों और एकांत में खेले जाने वाले खेलों पर निर्भर रहना पड़ता अथवा लुक-छिपकर पड़ोस में भागना पड़ता था। यही नहीं, घर पर भी मैं पूरी आज़ादी के साथ जो मन आए वह खेल खासकर ऐसे खेल तो बिल्कुल नहीं खेल सकता, जिनसे शोर-गुल होता हो और न ही दोस्तों को खेलने के लिए अपने घर बुला सकता था क्योंकि इससे पढ़ाई में मशगूल मेरी बहनों, जो उम्र में मुझसे काफी बड़ी थीं, का ध्यान बंट सकता था। 

यही नहीं, वे दोनों मुझे पढ़ाई से बांधने और खेलने पर प्रतिबंध लगाने की रणनीति भी रचतीं। यह बात मैंने गहराई से महसूस की थी कि दोनों किताब- चटोरी बहनें मेरी प्रगति में बाधक थीं। मुझे इस बात का पूरा यकीन था कि अगर मुझे खेलने की आज़ादी, वक्त और सुविधाएँ हासिल होतीं तब मैं एक साथ कई खेलों में विश्व स्तर का खिलाड़ी बन सकता था। परंतु दोनों वक्त-बेवक्त मेरे खेलने की धारावाहिक प्रक्रिया में आड़े आतीं थीं। जब अकेले में खेले जाने वाले खेलों से मेरा मन उब जाता तब मैं दोस्तों के साथ खेलने के लिए गली-मोहल्लों में भाग जाता था। परंतु यह काम इतना आसान नहीं था। दोनों जासूस की तरह मुझ पर नजर रखती थीं। इसलिए इस काम में मुझे बहुत चालाकी बरतनी पड़ती। भागते समय अगर उनमें से किसी की भी नजर मुझ पर पड़ जाती तो मेरी पूरी कोशिश बेकार चली जा सकती थी। मुझे भागते देखते ही वह दौड़ कर मुझे पकड़तीं और डांटने के अंदाज़ में लेक्चर पिलाने लगतीं, ‘‘मुन्ना रे .... कहां भाग रहा था? दिन-भर खेलता रहता है। चलो पढ़ने बैठो। स्कूल का टास्क बनाया ? लाओ दिखाओ।’’


फिर वह मुझे टास्क दिखाने को कहतीं और इसके पूरा न होने पर (जाहिर है, ऐसा हमेशा होता था) टास्क पूरा करने को कहतीं, जो मेरे लिए सबसे उबाऊ और दुसाध्य कार्य था। कभी-कभी मैं उन्हें चकमा देकर भाग निकलने में सफल हो जाता था। वह कुछ दूर मेरा पीछा करतीं। जब मैं दूर निकल जाता और अंगूठा दिखाकर उन्हें चिढ़ाता तब वह पैर पटकते हुए लौट जातीं, ‘‘बहुत बदमाश हो गया है, शैतान कहीं का। आने दो बाबूजी को। इतना पिटवाऊंगी कि याद रखोगे। जब देखो तब खेलता रहता है। पढ़ना-लिखना साढ़े बाईस।’’

मैं दोनों को अपना शत्रु मानता था। उनसे बहुत चिढ़ता और उन्हें भी खूब चिढ़ाता। मैंने उनसे दुश्मनी निकालने के अनेक उपाय खोज रखे थे। जब मुझे पता चलता कि दोनों में से किसी एक की परीक्षा निकट है तब उन्हें तंग करने का कोई भी मौका नहीं चुकता। दोस्तों को जान-बूझकर अपने घर बुलाता और बिना मतलब का हंगामा करते हुए खेलता। तेज़ आवाज़ में रेडियो ‘ऑन’ कर देता और चुपके से उनकी कोई किताब अथवा कलम ग़ायब कर देता। हालांकि अपनी इन करतूतों की वजह से पिताजी का कोपभाजन बनना पड़ता। वह मुझे कभी-कभी बुरी तरह पीट डालते थे। ऐसे समय में दोनों बहनें अथवा मां मुझे पिटने से बचातीं। पिताजी द्वारा पीटे जाने पर मैं पूरा घर सिर पर उठा लेता था और जोर-जोर से चिल्लाते हुए घंटों रोता रहता। जब मेरी बहनें मुझे दुलारतीं, मनातीं अथवा चुप करातीं तब मैं उन्हें बलपूर्वक हाथ-पाँव चलाते हुए झिड़क देता। मेरी कोशिश रहती कि इस काम में मैं उनकी पीठ अथवा पेट पर एकाध जोरदार धौल जमा दूँ, ताकि चोट के कारण वे बिस्तर पकड़ लें और ठीक से परीक्षा न दे पाएं।

दरअसल मेरी भीतरी इच्छा तो यही होती थी, कि दोनों कोई परीक्षा पास न कर पाएं और पिताजी जो माँ, घर-परिवार और मोहल्ले के लोगों की सलाह के विरुद्ध उन्हें जबर्दस्ती पढ़ा रहे थे, मजबूर होकर उनकी पढ़ाई छुड़वा दें। परंतु ऐसा नहीं होता, उल्टे दोनों ही अपनी क्लास में प्रथम आतीं बल्कि कई विषयों में तो पिछले सारे कीर्तिमान तोड़ डालतीं। जिस दिन उनमें से किसी एक का रिजल्ट निकलता वह दिन पिताजी के लिए विजय-दर्प का दिन होता। वह मोहल्ले-भर में अपनी प्रतिभावान बेटियों की तारीफ करते फिरते। पड़ोस में मिठाइयाँ बांटी जातीं, घर में विशेष पकवान बनते मानो कोई त्यौहार मनाया जा रहा हो। पिताजी दोनों पढ़ाकू बेटियों की प्रशंसा के पुल बांधते और मुझे डांट पिलाते, ‘‘तुम्हें अपनी बहनों से सीख लेनी चाहिए। दिन-भर खेलते रहते हो? पढ़ने में मन लगाओ। नहीं पढ़ोगे तो करोगे क्या ? कुछ तो सीखो, बाद में पढ़ाई ही काम देगी। देखो तुम्हारी बहन प्रथम आई हैं। एक तुम हो, दो साल से सातवीं में ही लटके हुए हो। कुछ तो शर्म करो।’’

मैं उनका उपदेश सुनकर मन ही मन कुढ़ता। ‘‘देख लूंगा। बहुत घमंड है दोनों को। पिताजी भी इन्हें पढ़ने की छूट देकर बिगाड़ ही रहे हैं। बहुत इतरा रहे हैं। लगता है दोनों पढ़-लिखकर बहुत नाम करेंगी। देखता हूं, क्या कर लेती हैं।’’

बहनों की पढ़ाई के बारे में मेरी भी वहीं राय थी जो माँ , घर और मोहल्ले के लोगों की थी। उस समय आम धारणा थी कि लड़कियों का काम चूल्हा-चौका संभालना है। घर में भी और ससुराल में भी। लोगों का मानना था कि दोनों बेटियों को स्कूल भेज कर पिताजी उन्हें बिगाड़ रहे हैं और बेकार में पैसे खर्च कर रहे हैं। जब अन्य घरों में मेरी बहनों की हमउम्र लड़कियाँ घरेलू काम-काज में अपनी मां का हाथ बंटा रही होती थीं अथवा घर की देखभाल की सारी जिम्मेदारियां उठा रही होती थीं उस समय मेरी बहनें स्कूल अथवा कॉलेज में होती थीं और अगर घर पर भी मौजूद होतीं तो किताब-कापियों में अपना सर खपा रही होती थीं।

मुझे पढ़ाई-लिखाई बहुत ही वाहियात काम लगता। हर पढ़ने-लिखने वाले से नफरत-सी होती जा रही थी। मैं अक्सर ऐसे पढ़ाकू दोस्तों को मूर्ख बनाता और उनका मज़ाक उड़ाने में पीछे नहीं रहता। यह काम जितना मजेदार होता उतना ही आसान भी, क्योंकि सारे दोस्त इस काम में मेरी मदद करते। दूसरी तरफ, पिताजी का मानना था कि शिक्षित लड़कियों की शादी में दिक्कत नहीं होती और न ही दहेज़ को लेकर अधिक बखेड़ा खड़ा होता है। लड़के वाले भी दहेज़ की मांग तभी करते हैं जब लड़की अनपढ़ हो। अगर लड़की पढ़ी-लिखी व समझदार हो तो दहेज़ जुटाने का झंझट ही खत्म। पिताजी अपनी इस मान्यता को लेकर दोनों बहनों की पढ़ाई पर खर्च करने में किसी तरह की कंजूसी नहीं बरतते थे। पता नहीं, दोनों बहनों की पढ़ाई पर कितना खर्च हुआ होगा। बड़ी बहन नालंदा महाविद्यालय में तथा छोटी बहन आदर्श माध्यमिक विद्यालय में पढ़ रही थीं। दोनों को कॉलेज और स्कूल पहुंचाने तथा घर वापस लाने के लिए एक रिक्शा किया गया था। दोनों बहनों की पढ़ाई-लिखाई की किसी भी चीज की फरमाइश तुरंत पूरी की जाती, जबकि मैं पैदल स्कूल जाता। हालांकि मेरा स्कूल दूर नहीं था। परंतु इससे क्या? वे दोनों फूल की थोड़े ही बनी हुई थीं? मेरे लिए अत्यंत आवश्यक चीजें भी तभी आतीं जब तक मैं स्कूल में क्लास टीचर के हाथों दो-तीन बार पिट नहीं जाता और स्कूल की ओर से उस चीज के मेरे पास न रहने की शिकायत घर न आ जाती। दरअसल पिताजी को मुझ पर कोई विश्वास नहीं रह गया था। उन्हें लगता कि जो चीज मैं मांग रहा हूं वह या तो गैर जरूरी है या फिर मैं उसे दोस्तों को बांट दूँगा अथवा उसे बाजार में बेच कर सिनेमा देख आऊंगा।

इस अविश्वास के कारण हर सप्ताह वह मेरे बस्ते की तलाशी लेते कि महीनों पहले दी गयी चीज मेरे पास है या नहीं। उस चीज के बस्ते में न होने पर घंटो जिरह की जाती जैसे मैं कोई मुज़रिम हूं। जब मैं ठीक-ठाक जवाब नहीं दे पाता तो मेरी भरपूर पिटाई होती।

इतनी उपेक्षा और अपमान तो मैं बर्दाश्त कर लेता था परंतु बहनों को रोज़ पढ़ाने के लिए आने वाले ट्यूटर के नज़दीक बैठकर पढ़ाई करना मेरी सहन शक्ति से बाहर की चीज थी। ट्यूटर महोदय भी प्रायः शाम को ही आते थे जब मेरे ख़ुशनसीब दोस्त खेल के मैदान में उछल-कूद और धूम-धड़ाका कर रहे होते, मनचाहे खेल के भरपूर मजे लुट रहे होते और मुझ पुकार रहे होते। ऐसे समय में बंधक की तरह वहां बैठना कितना दुश्कर हो सकता था! और इसका जिम्मेदार कौन था? मेरी बहनें ही तो। जब कभी ट्यूटर के आने से पहले मैं घर से भाग जाता तब मुझे बुलाने के लिए पिताजी, मां, बहन अथवा खुद ट्यूटर महोदय ही आ धमकते जैसे अगर वहां पढ़ने न बैठूं तो ज़मीन ही उलट जाएगी। मजबूरन मैं मन मारकर वहां बैठा रहता और दोनों बहनों के लिए बुरा-भला सोचता रहता।

दोनों बहनें मेरे आनंद में बाधक थीं। इसके लिए वे कई तरीकों का इस्तेमाल करतीं, जैसे जाड़े का मौसम आने से पहले दोनों मेरे लिए स्वेटर, पायजामा, टोपी इत्यादि बुनने में जुट जातीं। जब भी मैं घर पहुँचता तब बन रहे स्वेटर नपवाने के लिए उनके सामने हाज़िर होना पड़ता। स्कूल जाने से पहले वे मुझे पकड़कर जबर्दस्ती नहलातीं, कपड़े पहनातीं, जूते पहनातीं, खाना खिलातीं और बस्ता ठीक करतीं। इन कामों, खासकर नहाने और जूते पहनने में शुरू से ही मेरी दिलचस्पी नहीं थी। मुझे लगता कि मुझ पर बेवजह प्रतिबंध लगाया जा रहा है। स्कूल से लौटकर मैं बस्ता फेंक कर खेलने के लिए बाहर भागने ही वाला होता कि वे पकड़कर मेरा यूनिफार्म उतारतीं और खाना खिलातीं। रात को बैठकर पढ़ने के लिए मजबूर करतीं। इस दौरान मुझे शांत और अनुशासन में रहना पड़ता, जो बेहद उबाऊ और कठिन था। बार-बार वे टोकतीं ही रहती थीं - ‘मुन्ना, ठीक से बैठो’, ‘टेबल मत हिलाओ’,‘तबला नहीं बजाओ’ .... ‘ठीक से हिज्जे करते हुए पढ़ो’ , ‘पैर मत हिलाओ’ .... और भी जाने क्या-क्या। 

बड़ी बहन बी.ए. अंतिम वर्ष में प्रवेश कर चुकी थीं। पिताजी पिछले एक साल से बड़ी बहन की शादी की बात चला रहे थे। जहां तक मुझे याद है, शुरू-शुरू में पिताजी पूरे उत्साह के साथ लड़के की खोज में निकलते। मां-पिताजी देर रात तक विभिन्न लड़कों के गुण-दोश की व्याख्या करते। काफी विचार-विमर्श के बाद तय किया जाता कि फलां लड़का मेरी बहन के लिए ठीक रहेगा। परंतु मैंने महसूस किया कि उस एक दिन के बाद परिवार में अचानक न समझ में आने वाला मनचाहा परिवर्तन हो गया। उस दिन के बाद हालांकि परिवार के सभी सदस्य पूर्ववत अपन काम निपटाते रहे, इसके बावजूद परिवार के माहौल में वह गर्माहट और उत्साह का ताप नहीं रहा जो पहले था। सब कुछ जैसे ठंडा पड़ गया।

उस दिन शाम को स्कूल से घर लौटने पर मैंने घर को जाने-अनजाने लोगों से भरा पाया। घर में अभूतपूर्व सरगर्मी और चहल कदमी दिखाई पड़ रही थी। मैं समझ गया कि मेरे बहन को देखने के लिए ‘बरतुहार’ (लड़के वाले) आए हैं। उनकी खातिरदारी के लिए खान-पान की व्यवस्था की जा रही थी। माँ ने मुझे नई पोशाक पहनाई, मेरे बाल संवारे और मेहमानों को प्रणाम करने को कहा।

सभी जगह हँसी-खुशी और उत्साह का माहौल था। पिताजी के चेहरे पर खुशी चमक रही थी। मुझे लगा कि यहां शादी की बात तय हो जाएगी, क्योंकि लड़के वाले मेरी बहन को देखने के बाद काफी संतुष्ट नजर आ रहे थं। पिताजी जब मेहमानों को विदा करके लौटे तो मैंने उन्हें कुछ निराश देखा।

दिन गुजरने के साथ पिताजी की निराशा भी बढ़ती जा रही थी। साथ ही उन पर माँ तथा परिवार के और आस-पड़ोस के लोगों का दबाव बढ़ने लगा था। माँ और पिताजी में अक्सर झड़प हो जाती थी। माँ पिताजी को अक्सर ताने देती रहती थी। ‘‘घर में खूंटा-भर की जवान बेटी हय और इनको तो कुछ पता ही नय चले हय। कोइयो ऐसन घर नय होतय। पहिले से हम कह रहलिय हल कि बेटी के पढ़ावे-लिखावे से कोय फायदा नय हैय। बाकि ई सुनै तब न। बहुत पढ़ा लेला। बहुतै इतरा रह हल कि हम अपन बेटी के पढ़ैवे करब। अब देख ला। कित्तो दहेज नय देवे पड़ हय। पढ़ावे-लिखावे से का फायदा होलय।’’

माँ के सवालों का जवाब देने में पिताजी बिल्कुल झल्ला जाते थे। ‘‘तब का कहती है कि बेटी को काला अक्षर भैंस बराबर रखते? उसको अनपढ़ रखते?’’

‘‘नय, तब पढ़ाबे से बड़ी गुण मिल गेलो? का फायदा होलय पढ़ावे से? दहेज़ भी द और लड़की भी पढ़ावा। पहले से हम समझा रहली हल कि दहेज़ ला कुछ जमा करके रखा। अब भुगता पढ़ावे का नतीजा।’’

पिताजी आपे से बिल्कुल बाहर हो जाते, ‘‘तुम हमको चैन से नहीं बैठने दोगी। कह तो रहे हैं कि लड़का खोज रहे हैं और तुम हो कि एक ही रट लगाए जाती हो - ‘दहेज देवे पड़ेगा।’ दहेज देना पड़ेगा तब क्या हुआ, सब देते हैं। अपनी बेटी को हम दहेज़ भी देंगे। औउ पढ़ाये तो क्या गलती किए? अयं? कर्जा लेके बेटी की शादी करेंगे। बाकि पढ़ावेंगे अपनी बेटी को। कोय रोकने वाला है?’’

मैं इस वाक्युद्ध का स्पष्ट आशय नहीं समझ पाता, केवल इतना समझ सकता था कि पिताजी जिस उम्मीद को लेकर मेरी दोनों बहनों की पढ़ाई-लिखाई पर खर्च कर रहे थे उस उम्मीद पर पानी फिर गया है। स्वभावतः मुझे अपने आकलन सही होने पर खुश होना चाहिए था परंतु मैं अज्ञात आशंका से भर उठा। मुझे लगा कि पिताजी की धारणा का गलत सिद्ध होना बहुत गलत हुआ। इस आशंका की काली छाया घर के हर सदस्य पर, हर कोने में मंडरा रही थी। कहीं उत्साह-उमंग नहीं रह गये थे।

घर के माहौल में आया परिवर्तन अब पूरी तरह दिखाई दे रहा था। अब मैं स्कूल से घर आने के बाद सीधा बस्ता पटक कर खेलने के लिए गली-मोहल्ले में बिना किसी बाधा के भाग सकता था। मुझे ऐसा करते हुए देखकर मेरी बहनें मूक दर्शक बनी रहती थीं। अब वे मुझे पकड़ने के लिए मेरे पीछे नहीं भागती थीं। अब वे मुझे पिताजी से पिटवाने की धमकी भी नहीं देती थीं। दोनों ही का, खासकर बड़ी बहन का, किताबों से लगाव जैसे खत्म ही हो गया था। अब वे किताबों में आँखें गड़ाये नहीं मिलती थीं, बल्कि रसोई में नजर आती थीं। मेरे ऊधम मचाने और तेज़ रेडियो बजाने के खिलाफ पिताजी से मेरी शिकायत भी नहीं करती थीं। वे अब पिताजी से किसी चीज की फरमाइश भी नहीं करतीं।

पिताजी अब ज्यादातर सोचमग्न दिखते। पहले की तरह वे अब बहनों से उनकी पढ़ाई के बारे में नहीं पूछते। वह मां से इस बात पर भी नहीं उलझते कि वह दोनों बेटियों से घर का काम क्यों लेती हैं।

धीरे-धीरे इस अनचाहे और दुखद परिवर्तन ने पूरा आकार ग्रहण कर लिया। उस दिन छोटी बहन की मैट्रिकुलेशन परीक्षा का रिजल्ट निकला। वह प्रथम श्रेणी में पास हुई थी। और बहुत खुश थी। लेकिन घर के किसी कोने में, किसी सदस्य में खुशी का नामों निशान तक नहीं था। यहां तक कि पिताजी भी उसी तरह से सोचमग्न और उदास थे। जबकि अगर पहले का मौका होता तब खुशी का अलग ही माहौल होता जिसे अब केवल याद ही किया जा सकता है।

जब छोटी बहन ने कॉलेज में एडमिशन लेने का जिक्र किया था तब पिताजी ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई, बल्कि बिना कुछ बोले बाहर निकल गए। इधर माँ का प्रलाप चालू हो गया था। ‘‘हां .... हां खूब कॉलेज में पढ़ ला हो। पढ़ के तो बहुत निहाल कर देला। इन्होंने (पिताजी ने) दोनों को सर पर चढ़ा रखा है। घर में खाए के पैसा नय और बेटी को पढ़ावे चलला है। जैसे पढ़के नेहाल कर देते। गोइठा में घी सुखावे से फायदा का है?’’

पिताजी के घर लौटने तक माँ का भाषण चालू था। ‘‘का जरूरत है कॉलेज भेजे से। वैसे ही तो घर के खर्च नय जुट रहले हय। कोइयो ऐसन घर नय होते।’’ अगर बदली हुई स्थिति नहीं होती तब पिताजी माँ को जबर्दस्त ढंग से डांटते। खुद माँ ही ऐसा बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं। परंतु आज पिताजी बिल्कुल शांत और असहाय दिख रहे थे। बहुत देर तक माँ का भाषण सुनने के बाद उन्होंने अपना मुंह खोला, ‘‘अच्छा-अच्छा बहुत हो गया। अब शांत हो जाओ।’’

उस रात छोटी बहन देर तक रोती रही। माँ ने उसे डांटकर चुप कराया। वह चुप हो गई लेकिन उसकी सिसकियाँ नहीं थमी। उसकी बगल में सोया हुआ मैं उसकी सिसकियाँ स्पष्ट सुन रहा था। मैं उसकी आगोश में धंस गया। 

वह मुझसे चिपट कर सिसकती रही।


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