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विभव दा का अंगूठा

विभव दा का अंगूठा

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विभव दा का कमरा हवादार और रोशनीदार तो नहीं, पानीदार अवश्य। कमरा इस कदर ‘एयरटाइट’ था कि गर्मी की अंधड़-भरी दुपहरी में जब और घरों के मजबूती से बंद किए गए दरवाजे गर्म हवा के थपेड़ों से बुरी तरह कांप जाते और खुले रह गये दरवाजों और खिड़कियों के पल्ले बम विस्फोट की आवाज के साथ चौखट से टकराते, तब भी हवा के झोंके विभव दा के कमरे की ओर रुख करने की हिम्मत नहीं करते। अंधेरे का तो इस कमरे से इस हद तक प्यार था कि कमरे में दिन में 60 वाट का बल्ब जलाने पर भी (क्योंकि मकान मालिक की ओर से 100 वाट का बल्ब जलाने पर मनाही थी) कमरे में अंधेरा पसरा हुआ महसूस होता। बरसात के दिनों में हमेशा ही पानी छत से टपकता रहता और दीवारों से पसीजता रहता जिससे फर्श पर पानी जमा हो जाता। बरसात न भी हो तो छत और दीवारों से बुरादानुमा चीज झड़ती रहती। कमरे में एक खिड़की थी, जो मकान के पिछवाड़े में खुलती, जहां कूड़े-कचरे के सड़ने के कारण भयानक बदबू उठती रहती। इससे बचने के लिए खिड़की हमेशा बंद रखी जाती।

यह कमरा भानु प्रताप पटेल लॉज का हिस्सा था। जाहिर है लॉज मालिक का नाम भानु प्रताप पटेल ही था। हममें से अनेक लेखकों और साहित्यकारों को यह जानकर दुःख हो सकता है कि श्री भानु प्रताप पटेल जी ने एक ‘बे-आलीशान’ लॉज का ‘सृजन’ कर संसार में वह अमरता सुनिश्चित कर ली जो अनेक साहित्यकारों को बेहतरीन रचनाओं का सृजन करके भी नसीब नहीं होती। पटेल जी गरीब छात्रों के सच्चे हमदर्द थे। इतने हमदर्द कि उन्होंने लॉज में पानी, बिजली, स्नानघर, शौचालय, मकान की मरम्मत तथा सफेदी जैसे काम केवल यह सोचकर नहीं करवाया कि ऐसा करने पर कमरों का किराया बढ़ाना पड़ता और अगर किराया बढ़ाया जाता तब गरीब छात्र जाते कहां?

विभव दा के बाप गांव में खेती-बारी करते थे। वह गांव हरियाणा या पंजाब का गांव नहीं था जहां सड़क, बिजली, टेलीफोन और अन्य जरूरी और गैरजरूरी (उपभोक्ता-संबंधी) सुविधाओं की पहुंच हो। वह गांव भारत के सबसे पिछड़े राज्य बिहार के सबसे पिछड़े जिले नालंदा के अंतर्गत आता था। कोई भी सड़क गांव तक नहीं जाती थी और गांव पहुंचने के लिए दो-ढाई कोस की दूरी पैदल तय करनी पड़ती थी। रास्ते में तीन-तीन नदियां पड़ती थीं। बरसात में नदियों के अलावा खेतों में भी पानी उपलाता रहता। अगर आप दिल्ली जैसे महानगरों में जन्म लेकर पले-बढ़े हैं तब आप तो आप, अच्छे से अच्छे खिताब विजेता तैराक भी बरसात के मौसम में उस गांव तक नहीं पहुंच सकते। बिजली विभाग ने जरूर उस गांव पर रहमोकरम फरमाया था और उस गांव तथा आसपास के गांवों में बिजली की तारें बिछा दी थीं। अब आप यह नहीं पूछें कि बिजली की सप्लाई कितनी होती थी। जब जिला मुख्यालय में बिजली की आंखमिचौली चलती रहती है तब उस गांव की क्या औकात? कभी-कभी बिजली गांव वालों को दर्शन दे जाती। बिजली के आने पर उस गांव का नजारा देखने लायक होता। खाना खा रहे व्यक्ति खाना छोड़कर, स्नान कर रहे व्यक्ति भींगे बदन जांघिया पहनकर या तौलिया लपेटकर तथा पत्नी के साथ सोये व्यक्ति अपने चरम आनंद को छोड़ खेतों की ओर मोटर-पम्प चलाने के लिए गिरते-पड़ते इस तरह भागते मानो उन्हें हीरे-जवाहरात के किसी गुप्त खजाने का पता मिल गया हो। गांव के बगल से गुजरने वाली नदी के बांध इतने ऊंचे हैं, मानो पहाड़। फिर भी नदी के बांध हर दूसरे-तीसरे साल टूट ही जाते और बाढ़ खड़ी फसल को अपने साथ बहा ले जाती। तब भी जैसे-तैसे दोनों शाम की रोटी, तन ढकने के कपड़े और विभव दा के खर्च के लिए पैसों का जुगाड़ हो ही जाता। 

विभव दा अपने गांव के सबसे निकट स्थित शहर के ‘बे-आलीशान’ लॉज के ‘बे-आलीशान’ कमरे में रहकर पढ़ाई करते थे। वह देर रात तक पढ़ाई करते और कभी-कभी तो पूरी रात ही पढ़ने में गुजार देते। हालांकि भानु प्रताप जी उनके देर रात तक पढ़ने पर एतराज करते। वह अक्सर विभव दा को यह सीख और उपदेश देते रहते, ‘‘का विभव बाबू! इतना पढ़ के का करियेगा जी? रात-रात-भर पढ़ना क्या कोई अच्छी बात है? शरीर गलाबे से का फायदा है? आप इतना पढ़ते-लिखते हैं, फिर भी आपको यह मालूम नहीं है कि रात में ज्यादा देर तक जागने से सेहत पर बुरा असर पड़ता है। ऊपर से बिजली भी तो खर्च होती है’’

हालांकि भानु प्रताप जी को यह बात बखूबी मालूम है कि रात में बिजली मुश्किल से दो-तीन घंटे ही रहती है। कभी-कभी तो पूरी रात नदारद रहती। ऐसी स्थिति में विभव दा का लालटेन की धुंधली रोशनी में पढ़ाई करनी पड़ती। ऐसे सीलन-भरे अंधेरे कमरे में रहकर ऐसी धुंधली रोशनी में पढ़ने वाले विभव दा के ख्वाब बहुत सुनहरे थे। वह आई.ए.एस. अफसर बनने के सपने देख रहे थे। क्या आप मजाक समझ रहे हैं? यह मजाक नहीं सच्चाई है। विभव दा आई.ए.एस. की ही तैयारी कर रहे थे। क्या फरमाया कि मुझे सुनने में गलती हुई है और मैं आई.ए. अथवा आई.एस.सी. को आई.ए.एस. समझ बैठा। जी नहीं। मेरा कान और दिमाग इतना कमजोर नहीं है। उन्हें आई.एस.सी. किए छः वर्ष से ऊपर हो गए थे। वह पिछले तीन साल से आई.ए.एस. की तैयारी कर रहे थे।

आप क्या सोच रहे हैं? ‘‘ऐसी जर्जर आर्थिक और दयनीय पारिवारिक स्थिति वाले विभव दा क्या खाकर आई.ए.एस. की तैयारी कर सकते हैं? जरूर वह सिरफिरे हैं। आई.ए.एस. तो धनी-मानी व्यक्तियों, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, नेताओं और मंत्रियों के बेटे-बेटियों की बपौती है जो तमाम सुख-सुविधाओं को भोगते हुए पढ़ाई करते हैं या पढ़ाई करने का नाटक करते हैं। मन होने पर प्रश्नपत्र ही आउट करवा लेते हैं, अपने किसी प्रोफेसर को परीक्षा में बैठा देते हैं, कॉपी में अंकों का हेरफेर करवा लेते हैं और साक्षात्कार में तो खैर उनके रिश्तेदार या बाप-दादा ही होते हैं।’’ यह आपकी सोच हो सकती है पर विभव दा इस सोच को पलायनवादी मानते हैं। उन्हें अपनी प्रतिभा और मेहनत करने की क्षमता पर पूरा विष्वास है। फिर भारत तो लोकतांत्रिक देश है। संविधान ने सभी को बराबरी का अधिकार दे रखा है। यहां गरीब से गरीब व्यक्ति प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पदों पर सत्तासीन हो सकता है। कोई भी व्यक्ति अपनी प्रतिभा, मेहनत और लगन के बल पर ऊंचे से ऊंचे सरकारी ओहदे प्राप्त कर सकता है। विभव दा का दावा है कि वह अपनी मेहनत के बल पर आई.ए.एस. की परीक्षा में सफल होकर रहेंगे। अगर आदमी चाहे तो क्या नहीं कर सकता!

विभव दा का हौसला बुलंद है और हो भी क्यों नहीं? वह किसी से कम थोड़े ही हैं। गरीब हैं तो क्या हुआ? लोग गरीबी का सिर्फ रोना रोते हैं, उससे उबरने का प्रयास ही नहीं करते। विभव दा की प्रतिभा पर खुद विभव दा को ही नहीं उनके माता-पिता, गांव के लोगों, उनके दोस्तों और स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों को भी विश्वास है। इस विश्वास का ठोस आधार भी है। विभव दा शुरू से पढ़ने में तेज रहे हैं। वह अपनी क्लास में हमेशा प्रथम होते आए हैं, जबकि हमेषा आर्थिक तंगी में ही रहे हैं। उनके पास जरूरी किताबें भी नहीं होतीं, यहां तक कि शिक्षण शुल्क और वार्षिक परीक्षा-शुल्क मुश्किल से जमा कर पाते। हालांकि उनका स्कूल सरकारी था और उस समय नाममात्र का शिक्षण शुल्क लगता था।

मैट्रिक तक वह नंगे पैर तथा फटे-पुराने हाफ पैंट और हाफ कमीज पहन कर स्कूल जाया करते थे। उनका स्कूल गांव से करीब दो कोस की दूरी पर था। बरसात के दिनों में तो उन्हें तैरकर स्कूल जाना पड़ता था। उनके गांव के पांच लड़के उनके साथ उस स्कूल में पढ़ते थे, लेकिन उनके अतिरिक्त कोई भी लड़का मैट्रिक से आगे नहीं पढ़ पाया। यही नहीं, वह हाई स्कूल में अपनी क्लास के पहले छात्र हैं जिसने सफलता की इतनी साढ़ियां तय की है। मैट्रिक, आई.एससी. और बी.एससी. अच्छे अंकों के साथ पास करने के बाद वह आई.ए.एस. की तैयारी में जुटे हैं। आई.ए.एस. में उनकी सफलता की संभावना पर आपको भले ही विश्वास न हो पर विभव दा को अपनी सफलता पर पूरा विश्वास है। अगर डिग्रियां प्राप्त करने वाले लड़कों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति संबंधी आंकड़ों की जानकारी हो तब आपको विभव दा के बी.एससी. कर लेने पर भी आश्चर्य हो सकता है। लेकिन हर चीज के अपवाद होते हैं। विभव दा जैसे इने-गिने छात्र भी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में अपवाद हैं।

आपका मुझ पर यह आरोप हो सकता है कि मैं विभव दा को ‘अपवाद’ बनाकर मध्ययुगीन रचनाओं, गुलशन नंदाई उपन्यासों और ‘हॉलीवुड’ की वर्तमान युगीन फिल्मों के चमत्कारी, करामाती और हरफनमौला किस्म का एक अपराजेय नायक गढ़ रहा हूं। मैं आपके इस आरोप का जवाब विभव दा के ही शब्दों में देना चाहता हूं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था भले ही इंतहा की हद तक भ्रष्ट हो चुकी है, लेकिन अभी भी ईमानदार, मेहनती और योग्य छात्रों के लिए आगे बढ़ने की गुंजाइश बची हुई है। इस अर्द्ध-पूंजीवादी व्यवस्था की यही तो विषेशता है कि इसमें सभी लोगों के लिए गुंजाइश रहती है। इसलिए अगर कोई अपनी मेहनत और लगन के बल पर सफलता हासिल कर ले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

विभव दा जैसे कुछ छात्र कीचड़ में कमल की तरह खिले होते हैं। उनके पास न पैसे थे, न पहुंच। उन्हें तो सिर्फ अपनी योग्यता, मेहनत और लगन के बल पर आगे बढ़ना था। उन्हें परीक्षा में नकल करने वाले छात्र बिल्कुल मूर्ख लगते और कभी-कभी उन्हें इन छात्रों पर तरस आता। उन्हें लगता, कुछ लोग पैसों के लिए इन छात्रों के जीवन और कैरियर के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। भले ही ये छात्र पैसा, नकल, पैरवी और शिक्षकों तथा अधिकारियों को रिश्वत खिलाकर अच्छे नंबरों के साथ बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर लें, लेकिन नौकरी के लिए तो उन्हें कम्पिटीशनों का सामना करना ही पड़ेगा। तब ऐसे छात्र किस तरह से कम्पिटीशन पास करेंगे - क्योंकि इनमें न तो नकल होती है और न ही पैरवी। आखिरकार इनमें योग्यता और ज्ञान ही तो काम आयेगा। विभव दा ने इस सच्चाई को बहुत पहले ही भांप लिया था और इस कारण वह शुरू से ही मेहनत से पढ़ाई करते आ रहे हैं। जहां दूसरे छात्र तरह-तरह के कदाचारों का सहारा लेकर परीक्षा पास करते, हजारों रुपये फूंककर अच्छे नम्बर ला पाते, वहां विभव दा अपनी योग्यता और मेहनत के बल पर अच्छे अंकों के साथ परीक्षाएं पास करते। विभव दा ने अपनी इन सफलताओं से उत्साहित होकर आई.ए.एस. की तैयारी करने का फैसला किया। उन्हें लगा कि अब वह उस मोड़ पर आ गए हैं जहां उनकी योग्यता और प्रतिभा की सही पहचान होगी। जब वह आस-पास के छात्रों से अपनी तुलना करते तब अपने को उनसे बहुत आगे पाते। उन्हें यह विश्वास होने लगा कि वह दिन दूर नहीं जब सफलता उनके कदम चूमेगी। उनकी योग्यता की कद्र होगी और उन्हें देश-सेवा का सुअवसर मिलेगा। वह अगर आई.ए.एस. में चुन लिए गए तो इस व्यवस्था को दिन-रात गालियां देने वालों को सबक मिलेगा और उन्हें सद्बुद्धि आएगी, जब उन्हें पता चलेगा कि विभव दा जैसे निर्धन और साधनहीन लोगों के लिए भी इस व्यवस्था ने जगह छोड़ रखी है। इस व्यवस्था में केवल भ्रष्ट तरीकों से ही आगे बढ़ा जा सकता है - ईमानदारी और नेकी के बलबूते पर भी आगे बढ़ा जा सकता है। बड़े-बड़े सरकारी पद सिर्फ धनी-मानी लोगों और सम्भ्रांत परिवारों, ऊंची जातियों की ही नहीं बल्कि पिछड़ी जाति के उनके जैसे निर्धन लोगों की भी पहुंच में हैं। आई.ए.एस. में विभव दा की सफलता एक मिसाल होगी - उनके जैसे गरीब व पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत होगी।

उन्होंने पूरे संकल्प और सफलता के विष्वास के साथ बी.एससी. के तुरंत बाद आई.ए.एस. की तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने दिन-रात एक करके तैयारी की। उनकी मेहनत का नतीजा यह हुआ कि वह पहले ही चांस में पी.टी. में आ गए। पहली बार वह ‘मेन्स’ में नहीं आ पाये। दूसरे चांस में पी.टी. में आ गए। पहली बार वह ‘मेन्स’ में नहीं आ पाये। दूसरे चांस में और जमकर तैयारी की और इस बार वह ‘मेन्स’ में भी आ गए। साक्षात्कार के लिए उन्हें दिल्ली बुलाया गया। पूरे गांव और कस्बे क्या उस जिले में भी उनके नाम की धूम मच गयी। उनकी सफलता से प्रेरित होकर छात्रों ने उनकी देखा-देखी आई.ए.एस. की तैयारी शुरू कर दी। अक्सर उनके पास आई.ए.एस. की तैयारी करने वाले छात्रों की भीड़ लगी रहती। उन्होंने दिल्ली आने-जाने के लिए कर्ज लेकर पैसों का इंतजाम किया। अपने फटे-पुराने जूते मरम्मत करवाये और खूब ‘पॉलिश’ कर उन्हें चमकाया। अपनी पुरानी पैंट-शर्ट को खूब साबुन लगा-लगाकर धोया और सलीके से ‘आयरन’ करवाकर संभालकर रख लिया - इंटरव्यू के दिन पहनने के लिए। उन्होंने कहीं पढ़ा था कि इंटरव्यू लेने वाले छात्रों के पहनावे पर भी ध्यान देते हैं। अगर जूते चमकदार हों, पैंट-शर्ट की फिटिंग अच्छी हो, उनका रंग मैच करता हो, क्रीज बरकरार हो, शर्ट पर कहीं दाग-धब्बे न हों .... तब इंटरव्यू लेने वालों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने पहले एक टाई खरीदने की सोची, परंतु बाद में इसका विचार यह सोचकर त्याग दिया कि नई टाई पुरानी पैंट-शर्ट और पुराने जूते पर जंचेगी नहीं और नयी पैंट-शर्ट और जूते खरीदने की स्थिति में वह नहीं हैं। उन्होंने अंग्रेजी बोलने की भी थोड़ी प्रैक्टिस कर ली ताकि उन्हें देहाती न समझा जा सके। फिर भी उस साल उनका अंतिम तौर पर आई.ए.एस. में चयन नहीं हुआ। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी तथा अगले साल के लिए तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने अपनी कमजोरियों और खामियों को पहचाना और कुछ फैसले तथा संकल्प किए। जैसे अंग्रेजी बोलने की प्रैक्टिस करना, अपने व्यवहार और पहनावे को अफसराना बनाना, बोलचाल में अंग्रेजियत लाना, इंटरव्यू में महंगे जूते और पैंट-शर्ट पहनकर और टाई लगाकर जाना भले ही उन्हें उधार लेना पड़े अथवा इन्हें खरीदने के लिए कर्ज के बोझ के तले दबना पड़े लेकिन यह पता नहीं लगने देना है कि उनकी पारिवारिक स्थिति बहुत खराब है।

वह अपनी कमजोरियों को दूर करने के लिए ‘तन-मन’ से जुट गये। उनकी सबसे बड़ी कमजोरी तो अंग्रेजी न बोल पाने की थी। उनके पास ‘धन’ होता तब वह पटना अथवा दिल्ली में इंगलिश स्पोकेन कोर्स में दाखिला लेते लेकिन उनके पास ‘धन’ नहीं था इसलिए उन्होंने एकलव्य का तरीका अपनाया और खुद अंग्रेजी बोलने का अभ्यास शुरू कर दिया .... ताकि राज-गुरुकुलों में शिक्षा पाने वाले आज के पांडवों को मात दी जा सके।

       

इस बीच मैं काफी समय के लिए बाहर चला गया जिससे विभव दा के बारे में कुछ पता नहीं चला। हालांकि मुझे पूरा विश्वास था कि इस बार तो वह आई.ए.एस. में बाजी मार ही लेंगे। मैं जब वहां लौटा तो विभव दा से मुलाकात नहीं हुई। पहले उनसे रोजाना लाइब्रेरी में भेंट होती थी, लेकिन इधर मैं कई बार लाइब्रेरी गया, पर वह दिखाई नहीं पड़े। मैंने सोचा कि आई.ए.एस. में चयन हो जाने के कारण उन्होंने लाइब्ररी आना बंद कर दिया हो। यह भी हो सकता है कि वह बीमार हों या इस शहर में ही न हों। एक दिन मैं उनके कमरे पर गया तब कमरे में किसी और लड़के को पाया। वहां पता चला कि वह बोरिया-बिस्तर समेट कर अपने गांव चले गये हैं।

कई महीनों के बाद वह एक पेट्रोल पम्प पर बड़ा-सा प्लास्टिक का पीपा लिए हुए दिखाई पड़े। उनसे मिलने पर पता चला कि वह डीजल लेने के लिए आए हैं।

गांव में बिजली की आपूर्ति नहीं के बराबर होने के कारण खेतों की सिंचाई डीजल इंजन से करनी पड़ती है। जीने के लिए कोई न कोई काम-धंधा तो करना ही पड़ता है न! उसी दिन विभव दा ने बताया कि एक बार डीजल इंजन को खेत पर ले जाते समय इंजन को जमीन पर रखने के दरम्यान उनके दाएं हाथ का अंगूठा बुरी तरह कुचल गया। यह तो संयोग था कि कटा नहीं। इलाज के बाद दर्द तो समाप्त हो गया लेकिन अंगूठा अक्सर सुन्न हो जाता है - ऐसा महसूस होता है अंगूठा है ही नहीं।


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