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मेरी यादगार आनंददायक रेल यात्र

मेरी यादगार आनंददायक रेल यात्र

7 mins 500 7 mins 500

अभी पिछले दिनों इमरजेंसी में बिहार जाना था। तत्काल से ब्रहमपुत्र मेल में स्लीपर का टिकट लिया। ट्रेन को निर्धारित समय के अनुसार रात 11 बजकर 40 मिनट पर पुरानी दिल्ली स्टेशन से रवाना होना था। मेट्रो ट्रेन से मैं रात 11 बजे के आसपास रेलवे स्टेशन पहुंच गया। सौभाग्य से ट्रेन दो घंटा लेट हो गई और मुझे प्लेटफार्म पर तफरी करने का मौका मिल गया। कुछ समय बाद प्लेटफार्म में बिजली आनी बंद हो गई जिसके कारण प्लेटफार्म पर लगे पंखे बंद हो गए और अंधेरा हो गया। इसके कारण मैंने गर्मी और अंधेरे का मज़ा लिया। पूरे प्लेटफार्म पर लोगों की भारी भीड़ थी और सभी इस की चिंता में डूबे थे ट्रेन कब आएगी। लेकिन मैं सोच रहा था कि ट्रेन देर से आए ताकि गर्मी और अंधेरे का और आनंद उठा सकूँ। लेकिन रेल मंत्रालय को मेरा सुख बर्दाश्त नहीं हुआ और ट्रेन मात्र ढाई घंटा लेट होकर प्लेटफार्म पर हैवान की तरह आ धमकी। डिब्बे के अंदर घुसने के लिए धक्का-मुक्की कर रहे लोगों के धक्के — मुक्के खाते हुए मैं डिब्बे के अंदर प्रवेश करने में कामयाब हुआ। मुझे अपने आप पर गर्व हुआ और मुझे लगा कि मुझ में अगर इतने धक्के-मुक्के खाने की क्षमता है तो मैं अवश्य कोई मुक्केबाजी की प्रतियोगिता जीत सकता हूं। कुछ ही मिनटों पर पूरा डिब्बा खचाखच भर गया। सीटों के अलावा लोग फर्श पर बैठ गए और इतने सारे लोगों से अपने को घिरा देखकर अपने को सेलिब्रिटी जैसा महसूस करने लगा। यह सुखद अहसास मुझे रेलवे के कारण नसीब हुआ। कुछ देर के बाद टायॅलेट गया तो नल में पानी नहीं आ रहा था और टॉयलेट भयानक रूप गंदा था। यह देखकर मेरा मन जल संकट के प्रति रेलकर्मियों की जागरूकता को देखकर खुशी से भर गया। ये लोग पानी बचाकर देश और समाज की कितनी बड़ी सेवा कर रहे हैं। रेलकर्मियों के प्रति मन में श्रद्धा भाव लेकर जब अपनी सीट के पास पहुंचा तो सीट पर कुछ और लोग काबिज हो चुके थे। मैं मानव कल्याण की भावना से भर गया और मैंने सोचा की प्राणी मात्र की सेवा का यह मौका जाने नहीं देना चाहिए और इसलिए अपनी सीट पर अन्य प्राणियों को बैठने दिया। वैसे इसके अलावा कोई और चारा भी नहीं था। 

दिन में भयंकर गर्मी का आनंद उठाते हुए रेल यात्रा करता रहा। जब पटना पहुंचा तो रात को 9 बज गए थे। वैसे निर्धारित समय के अनुसार इस ट्रेन को अपराह्न तीन बजे ही पटना पहुंच जाना चाहिए था लेकिन सरकार की मेहरबानी के कारण मैंने मुफ्त में और छह घंटे रेल यात्रा का आनंद उठाया। कायदे से छह घंटे का अतिरिक्त रेल यात्रा का मज़ा लूटने के लिए सरकार को मुझसे एवं अन्य यात्रियों से अतिरिक्त किराया वसूल करना चाहिए था, लेकिन जन सेवा करने वाली सरकार इतनी संकीर्ण सोच की नहीं होती। जब पटना पहुंचा पता चला कि मुझे जिस शहर को जाना है वहां के लिए कोई बस या गाड़ी अब नहीं मिलेगी इसलिए मैंने प्लेटफार्म पर ही रात्रि जागरण का आनंद उठाने का फैसला किया। मैंने रेलवे का धन्यवाद किया कि उसने यह अवसर उपलब्ध कराया क्योंकि अगर ट्रेन समय पर पटना पहुंच जाती तो मैं बस पकड़ कर अपना शहर चला जाता और रेलवे प्लेटफार्म पर रात गुजारने के आनंद से वंचित रह जाता। 

वापसी की यात्रा और भी मजेदार रही। वापसी के लिए तत्काल के जरिए महानंदा एक्सप्रेस एक्सप्रेस में थर्ड एसी का टिकट मिला। निर्धारित समय के अनुसार आधी रात के बाद 1 बजकर 40 मिनट पर ट्रेन को पटना जंक्शन पहुंच जाना चाहिए था लेकिन ट्रेन आई 3 बजे। इस तरह से मुझे पटना में चार घंटे तक स्टेशन पर चहल-कदमी करने का अवसर मिला। रेलवे स्टेशन पर लगे डिस्प्ले के अनुसार ट्रेन प्लेटफार्म नम्बर 2 से रवाना होने वाली थी। कुछ देर इधर-उधर टहल कर जब थक गया तो प्लेटफार्म नम्बर 2 पर जाकर बैठ गया। काफी देर तक आराम फरमाता रहा। ट्रेन को 3 बजे आना था लेकिर प्लेटफार्म नम्बर 2 पर कोई पैसेंजर ट्रेन आकर लग गई थी। मैंने सोचा कि यह ट्रेन महानंदा एक्सप्रेस के आने के पहले ही प्लेटफार्म से रवाना हो जाएगी, लेकिन पैसेंजर ट्रेन वहां से हिलने का नाम नहीं ले रही थी और समय भी बीता जा रहा था। अचानक मेरा ध्यान प्लेटफार्म नम्बर 4 पर गया तो देखा कि महानंदा एक्सप्रैस उस प्लेटफार्म पर लगी हुई है। मैं झट से उठा और दौड़ता हुआ सीढ़ियों पर चढ़कर और सीढ़ियों से उतर कर प्लेटफार्म नम्बर 4 पर पहुंचा और सामने जो डिब्बा मिला उसमें घुस गया। डिब्बा में जैसे ही घुसा ट्रेन आगे बढ़ने लगी। यह सोच कर अत्यंत रोमांच से भर गया और यह सोचकर पूरा शरीर पसीना-पसीना हो गया कि पांच सेंकेंड भी देर हो गई होती हो यह ट्रेन निकल गई होती और फिर पटना में एक दो रोज़ रहने का आनंद मिलता।


जिस डिब्बे में चढ़ा वह स्लीपर डिब्बा था और लोग जहां जगह मिली थी वहां पसरे हुए थे, एसी डिब्बे की तलाश में सोये हुए लोगों के बीच से बंदर की तरह उछल - कूद करते हुए आगे बढ़ा। एक डिब्बा खत्म करके दूसरा डिब्बा। भरपूर कसरत हो रही थी। उछलता-कूदता हुआ कई डिब्बों को पार करने पर ऐसी डिब्बा मिला। वहां पहुंचने पर पता चला कि मेरी सीट कोई और यात्री विराजमान हैं। चूकि मैं पहले की यात्रा में काफी मानव कल्याण कर चुका था इस कारण मैंने इस बार मानव कल्याण करने का विचार नहीं किया। मेरी सीट पर विराजमान यात्री मन ही मन भुनभुनाते हुए उतरे। मैं अपनी सीट पर जाकर लेट गया। सुबह होने पर पता चला कि पूरी ट्रेन में दो एसी डिब्बे लगने थे लेकिन एक एसी डिब्बा लगा नहीं और इसलिए कुछ यात्रियों को स्लीपर में एडजस्ट किया गया है। मैं रेल मंत्रालय की यह सुव्यवस्था को देखकर बहुत प्रभावित हुआ। दूसरे देशों में यात्रियों का इतना ध्यान कहां रखा जाता है। संयोग से मेरी सीट एसी डिब्बा में ही था-इसलिए मैं रेल मंत्रालय की उक्त सुव्यवस्था का लाभ लेने से वंचित हो गया। कुछ समय तक एसी ठीक से चली लेकिन उसके बाद उसने चलने से इंकार कर दिया। एसी डिब्बा में बिना एसी के यात्रा करने का आनंद कुछ और ही होता है। इस यात्रा का भरपूर आनंद उठाया।


सुबह जब टायलेट गया तो नल में पानी नहीं था। इससे जाहिर हो गया कि सभी रेल कर्मी जल संकट के प्रति जागरूक हो चुके हैं। मैं इस रेल यात्रा का आनंद उठा रहा था लेकिन कुछ मुर्ख और अयोग्य रेल यात्री अपनी नाकाबिलियत के कारण रेल मंत्रालय की ओर से प्रदान की जा रही गर्मी युक्त और और पानी विहीन रेल यात्रा का आनंद उठा नहीं पा रहे थे और वे रेलवे को गाली दे रहे थे। दो चार यात्रियों ने ट्विट करके रेल मंत्री को रेलवे द्वारा उपलब्ध कराई जा रही व्यवस्था की जानकारी भी दी। लेकिन इसपर भी जब कुछ नहीं हुआ तो उस कोच में आए रेलवे कर्मचारी को एसी डिब्बे का हाल बताया तो उन्होंने सुझाव दिया कि जब ट्रेन किसी बड़े स्टेशन पर रूके तो जंजीर खींचकर ट्रेन को आगे बढ़ने नहीं दें। ऐसे में कोई न कोई बड़ा अधिकारी ज़रूर आएगा। क्योंकि उनके लिए यही एकमात्र रास्ता है। जब कानपुर में ट्रेन रूकी तो दो तीन लोगों ने जंजीर खींचा और बाकी यात्रियों से डिब्बे से उतर कर स्टेशन पर आकर हल्ला - हंगामा करने का कहा। अच्छी बात यह हुई कि कुछ गिने-चुने मूर्ख एवं निक्कमे यात्रियों को छोड़कर किसी ने उनका साथ नहीं दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि कुछ होनी या अनहोनी नहीं हुई। न तो एसी ठीक हुई और न ही नल में पानी आया। सबको रेलवे की ओर से निर्धारित सुव्यवस्था के अनुसार गर्मी का आनंद उठाने को मजबूर होना पड़ा। ट्रेन आगे बढ़ रही थी और वे दो चार मूर्ख यात्री अपनी सीट पर भुनभुना रहे थे कि यहां कोई सुनता ही नहीं है। अब सोचिए ऐसी छोटी—छोटी बातों पर ध्यान दिया जाएगा तो बड़ी बातों पर कौन ध्यान देगा। कुछ यात्री जो एसी डिब्बे में बैठ कर गर्मी का आनंद उठा पाने में असक्षम थे वे अपना सामान उठा कर स्लीपर में चले गए कि वहां कम से कम खिड़की से ताजी हवा तो आएगी। मैंने एसी डिब्बे में एसी के बिना रेलयात्रा करने के इस मौके को जाने नहीं दिया और पूरी यात्रा पसीने से नहाने का आनंद उठाते हुए पूरी की। निश्चित ही इस आनंददायक रेल यात्रा की याद जीवन भर बनी रहेगी और इसके लिए जीवन भर सरकार एवं रेल मंत्रालय का अहसानमंद रहूँगा।


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