और उसने दुनिया नहीं देखी
और उसने दुनिया नहीं देखी
शादी के बाद सतिंदर ने ढेर सारे सपने पाल रखे थे। बीवी आएगी, रोमांस होगा, हनीमून मनाएंगे और और बढेगा मेरा परिवार। उधर सतविंदर की मां कलावंती देवी ने तो और भी ज्यादे सपने देख डाले थे। जैसे बहू आयेगी, घर की रौनक बढ़ेगी, चूड़ियों की खनखनाहट और पायलों की छम - छम खनक से लगेगा कि कोई सुहागन आँगन में अपनी खुशबू बिखेर रही है। हाँ सतविंदर के पापा गनेस बाबू जरूर थोड़ा चिन्तामगन हो उठे थे कि अब उनकी घर में पैठ कुछ प्रतिबंधित हो जाया करेगी। खंखारते हुए आंगन में जाना होगा। बाहर से ही बुलाना होगा कि -'अरे सुनती हो !'
सतविंदर रहता तो अब गुड़गाँव में है लेकिन उसके माता पिता की सोच अभी उसके गाँव जवार की ही है। बेटे को ऐसे बैठना चाहिए, ऐसे बोलना चाहिए। बहू और बेटियों के लिए भी ढेर सारे प्रतिबन्ध और सुझाव थे जिनका हालांकि अब धीरे - धीरे अवमूल्यन होता जा रहा था। अभी पिछले ही दिन तो सतविन्दर एक रात देर से घर क्या आया की पापा जी ने आसमान सिर पर उठा लिया था।
"सतविन्दर की मां तूं कह दे अपने बेटे से कि मेरे रहते ऐसा नहीं चलेगा। मैं मर जाऊं तो जो जी में आये वो कर लेगा। कहीं शरीफ घर के लडके रात के बाढ़ बजे तक घूमा करते हैं ? "
सतविंदर की माँ के पास हाँ में हाँ मिलाने के अलावे रास्ता ही क्या था ?
असल में कुदरत भी तो जाने कैसे कैसे खेल खेला करती है। गनेश बाबू संस्कारी आदमी ठहरे। वे जितना पंथ पुराण की इज्जत करते किस्मत उन्हें उसके उलट ही परिणाम दे दिया करती थी। शुद्ध ब्राम्हण की तलाश में अपनी बेटी की शादी प्रतापगढ़ के एक प्रतिष्ठित पाण्डेय परिवार में किये थे। उन्हें बताया गया था कि लड़का आर्मी में लेफ्टिनेंट है। शादी के ऐन दिन किसी ने आकर उनसे कह दिया की लड़का तो सूबेदार है। अब गनेश बाबू को काटो तो खून नहीं। गोरखा रेजिमेंटल सेंटर जाकर खुद जब पता लगाए तो उनके होश उड़ गए|बात एकदम सच निकली। धडधडाते हुए अन्दर गए और अपनी दो नाली बंदूख निकालकर चीखने लगे मैं लड़के को गोली मार दूँगा। उसने झूठ बोला था। लोगों ने उन्हें शांत किया तो अपने रिश्तेदार उन मास्टर साहब पर पिल पड़े जिन्होंने शादी तय करवाई थी। बहरहाल दहरम बहरम करवाते किसी तरह उस रात शादी संपन्न हुई। आज तक उन्होंने अपने समधी और दामाद को इस गुस्ताखी के लिए माफ़ नहीं किया है।
अभी- अभी सतविंदर कहीं से लौटा तो उसने उनसे बताया कि पापा चांदनी के घर वाले आज शाम मिलने के लिए आ रहे हैं।
घर में तैयारी होने लगी। सबसे ज्यादा खुश कलावन्ती देवी थीं।
शाम को लड़की वाले ढेर सारा सामन फल, मिठाइयां, मेवे और फल आदि लेकर आये। इधर से भी उनका भरपूर स्वागत हुआ। कुण्डली का मिलान पहले ही हो चुका था और आज शादी की भी तारीख पक्की हो गई। दिसंबर की आठवीं तारीख को चंडीगढ़ में शादी और उसके दो दिन बाद गुडगाँव में रिशेप्शन रखा गया। समय कम था इसलिए अगले ही दिन से भाग दौड़ शुरू हो गई। सबसे मुश्किल काम था गाँव देहात के लोगों को बरात में ले जाने का। लेकिन गणेश बाबू के वाक् चातुर्य और नजदीकियों से वह काम भी हो ही गया।
यह तय हुआ कि गाँव के लोग सीधे चंडीगढ़ पहुंचेंगे।
सब कुछ ठीक - ठाक चल रहा था कि एक दिन सतविंदर को किसी दोस्त ने बताया कि लड़की अल्ट्रा माडर्न है। उसके हाव भाव तो ऐसे हैं कि तेरे घर में उसका टिकना मुश्किल ही लागे है। सतविंदर बहुत मुश्किल में पडा। अब क्या कुछ हो सकता था ?कुछ नहीं। और सतविंदर ने अपने दिमाग पर ज्यादा जोर ना देकर सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया।
परम्परागत ढंग से शादी सम्पन्न हो गई। घराती और बाराती दोनों पक्ष खुश थे जो आजकल की शादियों में कम ही हुआ करता है। गाँव वाले चंडीगढ़ से अपनी बर- बिदाई लेकर सीधे गाँव चले गए और सतविंदर अपनी नई नवेली दुल्हन और परिजनों के साथ गुडगाँव आ गया। रिशेप्शन की तय्यारी भी तो करनी थी !
सतविंदर ने अपनी सुहाग रात जबरदस्त ढंग से मनाई।
हीरे के कंठहार को जब उसने नव वधू चांदनी को पहनाया तो उसका सौन्दर्य और भी खिल- खिल उठा। हल्के सांवले पन लिए रंग पर उसके नयन नक्श बेहद आकर्षण पैदा कर रहे थे। दांतों की पंक्तियाँ मोती के समान चमक रही थीं। शायद वह अपने सौन्दर्य बोध से भी अभिभूत थी। देर रात तक दोनों एक दूसरे के बारे में जानते - समझते रहे। सतविंदर को पहली नज़र में कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा था कि चांदनी अल्ट्रा माडर्न है। उसको आलिंगन में लेते समय, उसके होठ पर चुम्बन अंकित करते समय तो कतई नहीं !लेकिन बात बस यहीं तक रह गई। सतविंदर का कंडोम उस रात क्या उसकी अगली कई रातों तक इस्तेमाल नहीं हो सका।
दिसंबर की आठवीं तारीख भी बीत ही गई। क्लार्क्स के शानदार होटल में सतविंदर ने अपने मल्टी नेशनल साफ्टवेयर कम्पनी के हर बन्दे को बुलाया था और सबने खूब छक कर खाया पीया। चांदनी आज तो और भी खूबसूरत लग रही थी। उसके पैरेंट्स भी आये थे और अपनी आवभगत से अति प्रसन्न भी थे।
रिशेप्शन की रात सतविंदर की सहज वासनात्मक उत्तेजना बढ़ सी गई और वह क्रमशः चांदनी का देंह स्पर्श करते हुए साहचर्य सुख उठाने की कोशिश करने लगा। चांदनी की ना नुकुर भी उसे रोमांचित कर रही थी कि अचानक चांदनी थोड़ा कड़क होकर बोल उठी -
"आई से नो, नो नो और नो का मतलब तो डियर सतविंदर आप जानते ही होगे ! "
सतविंदर सकपका गया। उसकी सारी उत्तेजना, शादी का रोमांच यकायक भरभरा कर उतर सा गया। उसने अपने अशांत चित्त को समझाया और शांत भाव से बेटर हाफ से छिटक कर दूसरी ओर मुंह करके सो गया।
अगले दिन घर में तो नव वधू को लेकर बहुत चहल- पहल मची रही लेकिन सतविंदर मुरझाया - मुरझाया लगा। उसकी माँ ने जब उसके चेहरे की भाषा पढी तो समझ गई कि सतविंदर खुश नहीं है। एकांत में ले जाकर बेटे से पूछीं कि बेटा सब कुछ ठीक - ठाक तो है ?सतविंदर उनसे क्या बताता ?
घर पर अब बहू देखने वालों की संख्या कम हो चली थी। एक शुभ दिन देख कर सासू मा ने बहूरानी से किचेन में एक खाद्य सामग्री बनवा कर रसोई छुलाने की भी शुरुआत कर ही डाली। अनमने ढंग से चांदनी यंत्रवत सब कुछ करती रही। सब कुछ ठीक चले तो सतविंदर को भी इस नई ज़िंदगी का स्वाद मिले !एक दिन आफिस से लौटते हुए भगवान् के दरबार में जाकर सतविंदर ने अपने अब तक के सूखे दाम्पत्य जीवन में हरियाली लाने के लिए की मनौती मान ही ली।
उधर चांदनी दिन भर अपने मोबाइल पर अपनी मम्मी और सहेलियों से जाने क्या क्या बातें किया करती थी। देर शाम को जब सतविंदर घर पहुंचता तो माल ले जाने की जिद किया करती। सतविंदर आज नहीं कल तो कभी आज तबियत ठीक नहीं है का बहाना बनाया करता। लेकिन ऐसा कब तक चलता। आखिरकार एक शाम दोनों शहर के सबसे बड़े माल में टहल रहे थे।
'चांदनी ! तुम्हें मुझसे इस शादी से कोई प्राब्लम है क्या ?"मौक़ा देख कर सतविंदर पूछ ही बैठा अचकचाते हुए, मानो चांदनी इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं हो, चांदनी बोल पड़ी - " नहीं तो ?नॉट एट ऑल। " आगे वह बोल रही थी-"बट बाई दि वे, व्हाई आर यू आस्किंग सच क्यूश्चेन डियर सतविंदर ? "
"इसलिए कि मैं जब जब तुम्हारे पास आना चाहता हूँ तुम बहाने बनाकर मुझसे अलग हो जाया करती हो। "थोड़े से पाज़ के बाद वह फिर बोला -"आखिर हम अपनी सुहाग रात को कब इंज्वाय करेंगे चांदनी ?" एक सांस में सतविंदर बोल गया।
" सतविंदर जी, अगर तुम शरीर के मिलन को अपनी वासनात्मक भूख को मेरा कौमार्य भंग करने को ही विवाह का असली मक़सद समझते हो तो मुझे तुम्हारी सोच पर घिन आती हैघिन। तुम पुरुष लोग | अरे क्या तुमने सीमोन दि बोउआ, तसलीमा नसरीन, प्रभा खेतान, चित्रा मुदगल को नहीं पढ़ा है ? " चांदनी भी स्त्री स्वातन्त्र्य के नए ज़माने की हवा से वाकिफ होकर बोले जा रही थी।
नव विवाहितों के बीच जब सीमोन दि बोउआ, तसलीमा नसरीन, प्रभा खेतान और चित्रा मुदगल के स्त्री विमर्श का ज़िक्र आ जाय तो ऐसे में देर तक दोनों के बीच मानो चुप्पी ने रस ले लेकर आपस में ही संवाद किया।
लेकिन उस रात सतविंदर पर जाने कौन सा भूत सवार हो गया। तनावपूर्ण महल में वे डिनर बाहर से करके आये थे। बिस्तर पर जाते ही सतविंदर मानो किसी भूखे शेर की तरह चांदनी पर ग्रहण लगा कर छा ही गया। स्त्री स्वातन्त्र्य की धज्जियां उड़ चुकी थीं। चांदनी ने बीच - बीच में चीखने की कोशिश की तो उसने उसके मुंह पर हाथ रख दिया और जब तक उसकी शारीरिक भूख शांत नहीं हो गई उसने चांदनी को नहीं छोड़ा।
उस रात कंडोम का पैकेट खुला तो उपयोग भी हुआ लेकिन उत्तेजना, उन्माद और सेमी बलात्कारी मूड में उसने अपना काम नहीं किया।
अगली सुबह सब कुछ नार्मल सा लगा। शायद चांदनी ने कल रात की अपनी हठात सम्पन्न सुहाग रात रूपी फ़ाइल पर कार्योपरांत स्वीकृति दे दी थी। अगला महीना उन दोनों के लिए एक खुशखबरी भी लेकर आ गया वे अब दो से तीन होने जा रहे थे। लेकिन
इस बार चांदनी ने सतविंदर ही नहीं उसके माँ बाप की खुश खबरी को भी हठात फुल स्टाप दे डाला। उसने बिना किसी को बताये पड़ोस की एक आंटी जी को साथ ले जाकर ' एबार्शन 'करवा लिया था। उसको भय था कि बच्चा जनने से उसका फीगर खराब हो जाएगा !
विस्मित सुखविंदर का सुख - चैन जाने किस गली में एक बार फिर खो सा गया है और उसके माँ बाप अब भी टकटकी लगा कर नौवें महीने का इंतज़ार कर रहे हैं जब उनके यहाँ बच्चे की किलकारियां गूंजेंगी !
