अर्द्धनारी
अर्द्धनारी
मैं उससे काफी समय बाद मिल रहा था। अपने कामकाजी जीवन की व्यस्तता के कारण मैं गाँव ज्यादा नहीं जा पाता था ।उस दिन बाजार जाते वक्त अचानक उसके साथ मुलाकात हो गयी। वह मुझसे लगभग एक साल छोटी है , लेकिन उस दिन मुझसे दस-पंद्रह साल बड़ी लग रही थी वह । दुबली पतली सी कमजोर शरीर पर एक नाइटी पहन रखी थी, जो की उसके कमजोर शरीर पर लिपटी हुई एक पतली चादर की तरह लग रही थी। नाइटी इतनी पुरानी भी नहीं थी, लेकिन उसकी दुबली पतली काया के कारण यह मानो कोई कील से लटकी हुई कपड़े की तरह दिख रही थी। सिर के अधिकांश बाल भी झाड़ चुके थे, जो कुछ बचे थे वह कमर तक पतली सी रस्सी की भाँति लटकी हुई थी। इतनी पतली की कभी कभी ढीली ढाली नाइटी के अंदर छिप जाती थी,शायद उसकी चोटी भी नज़र मिलाना चाहती नहीं थी किसी से भी। चोटी के अंत में, एक रबड़ लपेट कर अपनी बचेखुचे बालों को संभालने की प्रयास की थी , शायद अपने अस्त-व्यस्त अव्यवस्थित ज़िंदगी की तरह । वो है कमला सब उसे कम्मो करके बुलाते थे । एक ही गाँव में घर हम दोनों का , हमारे घर और उसके घर के बीच केवल कुछ ही घर का फासला है। हमारे बीच उम्र का अंतर भी बहुत कम यही कुछ एकाध साल होगा ।इसलिए वह मुझे दादा (बड़े भैया) करके बुलाती थी और मैं भी मजाक में उसे दीदी करके बुलाता था। उस दिन उसे इस तरह देख मुझे कुछ अटपटा सा लग रहा था। परिस्थिति को भांपते हुए मैं मजाकिया अंदाज में बातचीत सुरु करना चाहता था, मगर फिर खुद को नियंत्रित करना मुनासिब समझा । शायद वो भी कुछ कहने के लिए खुद को तैयार कर रही थी, मगर बोल नहीं पा रही थी। लेकिन उसकी मासूम खामोश आँखें बहुत कुछ कहती थी, में सुनता और समझता भी था। वह मुस्कुराने की कोशिश कर रहा थी लेकिन मुस्कुरा नहीं पा रही थी। अभिव्यक्ति की कमी उसकी होठ , समग्र मुख मंडल और आँखों से स्पष्ट नज़र आ रही थी। वह शायद खुद को छुपाना चाहती थी , लेकिन पकड़े जाने के बाद छिपना कैसी। वह हाँ-ना की दुविधा से बाहर नहीं निकल पा रही थी, मैं उसके दिल की दर्द को महसूस कर पा रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे बात करना भूल चुकी थी वो , या काफी समय से किसी से बातचित नहीं की हो। अगर मन की बात समझने वाला ही कोई न हो तो मन की बात कहने का क्या फायदा? दर्द को महसूस करने का दिल न हो तो, इसे अपने सीने में दबाए रखने के सिवाय और चारा क्या है? उसने धीमी आवाज में कहा- :-यूँ ही रास्ते में खड़े रहोगे क्या ? कितने दिनों के बाद आये हो,घर के अंदर तो चलो। मैं चुपचाप उसे अनुशरण किया। आँगन में एक पुराना खाट पड़ा हुआ था। सामने प्लास्टिक के फिते से बुनी हुई एक पुरानी कुर्सी पड़ी थी। सफेद प्लास्टिक के फीते पर धूल की परत जम चुकी थी। कई जगह टूटी हुई डोरियाँ लटकी हुई नज़र आ रही थी। इस से स्पष्ट प्रतीत होता था कि कई दिनों से यहां कोई आया नहीं । खाट के ऊपर एक पट्टी बिछी हुई थी। मैं उस पर बैठ गया. पीने के लिए एक गिलास में पानी लेकर आई वो। गिलास को थामे देख रहा था मैं,घर पर और कोई नहीं था, होगा भी कौन ? और है कौन उसका इस दुनियां में? उसके साथ रहने वाला कोई और नहीं है । न अपना घर-संसार, न अपने माता पिता। भाई-भाभियाँ भी उसे छोड़ बहुत दिन से अपना अपना घर अलग से बना कर वहीं रहने लगे थे, और वह अकेली रह गयी जहां उसकी यादें जुड़ी हुई है। कभी-कभी छोटी भाभी आती है, कुछ देर रुकती ,कभी कभी एक-दो दिन रुक भी जाती और फिर चली जाति अपनी व्यस्त ज़िंदगी में। फिर अकेले रह जाती वो। अकेले रहने की आदत पड़ जाने के बाद उसे भी किसी की मौजूदगी अछि नहीं लगती।किसी की सवालिया निगाहों का या सहानुभूतिपूर्ण व्यबहार का सामना करने से अधिक अप्रीतिकर परिस्थिति क्या हो सकती ? सहानुभूति हमेशा सूखे घाव को खरोच कर लहूलुहान कर देती , और सांत्वना की भाषा जितनी कोमल होती, उसका प्रभाव उतनी ही कठोर होते। इसलिए खामोशी उसे बहुत अछि लगती थी। खामोश लम्हों में समय की नब्ज तय होती है, न दुख महसूस होता है न खुशी । वह क्षण जब सारे दर्द और खुशी एक साथ मौन हो जाते , उसे ही जीवन कहते हैं शायद। उस क्षण का अजीब सुखद अनुभूति उसके अर्द्ध-जीवित शरीर को जीवंत कर देता और वह घर के बगल में बने मंदिर में अपनी आँखें मूंद कर बैठ जाती । अपने अंदर समायी हुई खामोशी को समर्पित कर देती उसकी प्राण प्रिय कान्हा के चरणों में । न राधा की तरह प्रेम न मीरा की तरह भक्ति , फिर भी अनोखी वो अनुरक्ति जिसे कान्हा के चरणों मे समर्पित करते वक्त वो बेसुद हो जाती । भक्त आते जाते , दर्शन करते कराते मगर मनमग्ना वो खोई रहती अपनी भाव पूर्ण भजन में , जिसे मैं युगों पहले उसे लिख कर दिया था.. "अगले जनम मोहे जनम देना तो कुसुम-कली कर देना, लोटती रहूंगी चरणों मे तेरी इतनी कृपा कर देना नाथ, इतनी कृपा कर देना।। गले में तुम्हारी माला बन जाऊं और कोई चाह नहीँ, सिने में तेरी मैं लिपटी रहूंगी छोटी सी कामना यही संसारी माया से मुक्त करो नाथ, चरण करूँ वंदना .... इतनी कृपा कर देना।। इस गाने को शब्दबद्ध और स्वरबद्ध मैने ही किया था। सालों बाद वही गाना सुन कर स्तब्ध हो गया मैं , बहुत तकलीफ भी हो रही थी। वही आवाज, वही लय, वही शब्द, वही ताल मगर मेरे कानों में गूंजती थी कोई करुण विलाप की तरह । भक्ति अनुरक्ति के साथ शिकायत का स्वर भी सुनाई दे रहा था मुझे। मानों श्रद्धा और भक्ति के पर्दे के नीचे से कई सवाल उभरने की कोशिश कर रहे हों । फूल बनाकर जन्म दिया तो उसका कर्म खिलना ; अगर आपके चरणों में लेटना ही उसका धर्म है , तो उसकी नियति में है क्या ? क्या उस की कोई और महत्वाकांक्षा नहीं ? यदि यही सत्य है तो सृष्टि का नियम सबके लिए बराबर5 क्यों नहीं ? जब कोई फूल खिलती है फलवती होने का हक़ उसे होना तो चाहिए , यही तो सृष्टि का नियम है । फिर फूल के लिए ये भेदभाव क्यों ? कहो कान्हा! क्या जवाब तेरा , जो तेरे चरणों में पड़ी रहती , कंठ का सौंदर्य बृद्धि करती माला बन कर , जो तेरे दिल की इतनी करीब रहती है , क्या उसे तेरी दुनिया में अपनी छोटी सी दुनिया बनाने का अधिकार नहीं ? यदि हाँ, तो वह इतना दुःखी क्यों है! यदि नहीं, तो क्यों नहीं? जो युगों से तेरे सेवा में खुद को समर्पित कर दी , वो आज बासी-फूल क्यों बनी हुई है ? रात हो चुकी थी। मैं जाने के लिए उठ खड़ हुआ । उसने मेरे हाथ में कुछ प्रसाद देते हुए बोली , इस बार कब तक रुकोगे? मैन बोला :-जाना तो कल ही था मगर मुझे लगता कि मैं तीन चार दिन और रुकूंगा । उसने संतुष्टि और राहत भरी आवाज में बोला , अगर ऐसे है तो कल आओ ना , मैं तुम से तुम्हारे बारे में कुछ पूछ नहीं सकी । कल आओ बैठ के बातें करेंगे । बहुत कुछ है बोलने के लिए , बोल देने से शायद मन हल्का हो जाए । मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ नहीं था, मगर सुनने के लिए बहुत था । कल आने का वादा करके लौट आया मैं ....... तब तक बहुत देर हो चुकी थी, मेरा अब बाज़ार जाने का मन नहीं था, मैं घर वापस आ गया । सब लोग खाना खाकर सो गए, मैं भी सोने की कोशिश कर रहा था। नींद नहीं आ रही थी । बार-बार कमला का वह मौन मासूम चेहरा मेरी आंखों के सामने आ जा रही थी। मैं समझ तो सकता था कि वो मुझे कुछ कहना चाहती है मगर मुझे कैसे पता चलेगा कि वह क्या कहना चाहती ! ऐसे कोई भी अन्दाजा लगाना सही न होगा। मेरा अंदाजा सत्य हो सकता , अर्धसत्य या झूठ भी हो सकता है! परिकल्पनाओं को पूर्णतः सत्य या असत्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। मैं उसकी खामोशी की रहस्य जानने को उत्सुक हो रहा था । थोड़ी देर लेटते लेटते नींद लग गयी। देर से सोने के कारण सुबह भी थोड़ी देर से नींद खुली । अपना नित्यकर्म के बाद सोफे पर बैठने जा रहा था तो मैंने देखा कि सोफे के ऊपर बहुत सारे कपडे पड़े हुए थे। शायद यह हर घर घर की कहानी है । हर घर में कपड़े सूखने के बाद ऐसे ही सोफे या कुर्सी पर डाल दिया जाते अगले दिन व्यबस्थित करते तक । इसलिए मैं एक चटाई बिछाकर नीचे बैठ गया और तभी चाय लेकर मेरी छोटी बहन सिम्मी आयी , मुझे निचे बैठा देखकर उसने तुरंत सारे कपड़े उठाकर खाट के उपर रख दिया और सोफ़ा कभर ठीक करके मुझे सोफे में बैठने को कहा। मैं सोफे पर बैठ गया और उसके हाथ से चाय का कप ले लिया । सिमी की ससुराल हमारे गाँव से पाँच-सात कोस की दूरी पर है। मैं जब भी गाँव जाता हूँ, तो अपने बहनों के घर जाने की कोशिश करता हूँ। इस बार मैंने सभी को गाँव आने के लिए कहा रखा था । इसलिए दोनों बहनें आयी हुई थीं। मैं जब चाय पी रहा था तभी सिम्मी बोली : भैया, तुम्हें पता है, कल कमला के साथ एक हादसा हो गया; उसका हाथ टूट गया, सर भी फट गया है। मैंने आश्चर्य से पूछा : यह सब क्यों और कब हुआ, कल ही तो मैं उससे मिल कर आया हूँ, सब कुछ ठीक तो था, यह सब कैसे हुआ! निमी , मेरी दूसरी बहन ,ने कहा, ''कल रात टियूब-वेल से पानी लाने के दौरान वह गिर गयी थी , चबूतरे में जमी काई से पैर फिसल गया और गिर गयी । पानी की बाल्टी से चोट लग गयी माथे पर और दाहिना हाथ भी टूट गया, ।" मैं आत्मग्लानि से बिचलित हो उठा। एक भयानक अपराधबोध अचानक मुझे घेरने लगा। मैंने सोचा, जो कुछ हुआ उसके लिए मैं ही जिम्मेदार हूं। मुझसे मिलने के बाद उसके पुराने घाव फिर से हरे हो गए होंगे , और ध्यान हट गया होगा । मैं जल्द से जल्द चाय पीकर उससे मिलने के लिए निकलना चाहा , निम्मी बोली - चिंता मत करो, उसे कल रात अस्पताल लेकर मरहम-पट्टी कर दिया गया है , वह अब ठीक है। उसकी कान्हा ने उसे कल बचा लिया । मैंने कहा, ऐसा क्या चमत्कार हो गया कि तुम कहती कि उसकी कान्हा ने उसे बचा लिया? सिम्मी ने कहा जब वो गिर गयी थी , ठीक उसी वक्त बिना किसी काम से उसकी मझला भाई किशन वहां पहुंच गया । जो भाई को इतने दिनों से उसकी कोई फिक्र नहीं थी कान्हा के मरजी के बिना भला ठीक उसी वक्त वह वहां क्यों पहुंचता ? उसने तुरंत उसे अस्पताल लेकर मरहम् पट्टी करा दिया नहीं तो अनर्थ हो जाता । इतने में निम्मी नाश्ता ला चुकी थी। नाश्ते के बाद मैं कमला को देखने के लिए निकल गया। मैंने बाहर का गेट खोल कर अन्दर गया । बैठी हुई थी वह उसी खाट के ऊपर , शायद मेरा इंतज़ार कर रही थी । मुझे देखते ही थोड़ी सी मुस्कुराई वो । जो मुस्कान कल लाख प्रयास करने पर भी निकल नहीं रही थी, आज मैं उसके होठों से उस मुस्कान को सहजता से छलकते देख रहा था ; और सोच रहा था ऐसी परिस्थिति में भी कोई मुस्कुरा भी सकता है ? मैं महसूस कर पा रहा था उस मुस्कान में छिपे तकलीफों को । मेरे आने का उम्मीद को सच होता हूआ देख वो खुस थी , और अपनी सारी दर्द तकलीफों को भूल कर जो मुस्कान परोस रही थी वो कई दर्दों से दर्दनाक थी । और वो हलकि सी मुस्कान के साथ बोली - मैं जानती थी तुम आओगे इस लिए तो यहां बैठ कर तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ । दोनों उसी खाट पर बैठे थे , समय व्यतीत हो रही थी खामोशी से । कैसे बार्त्तालाप सुरु करें में सोच रहा था । दिलासा देने का अंदाज़ में बोला दवाइयां वक्त पे ही लेते रहना , पट्टी खुलने में बीस पच्चीस दिन तो लग जाएंगे । सावधानी बरतते रहना । सर हिला कर हामी भरी कमला । बोलने और सुनने को तो बहुत कुछ था , लेकिं न जाने क्यों शब्दों का अभाव महसूस कर रहा था मैं । वापस जाने के लिए में उठने लगा । मुझे उठते देख अपनी बाई हाथ से इशारा करके मुझे बैठने को कहा कमला । उसकी दाहिना हाथ में दर्द बढ़ गयी थी शायद , जो उसके चेहरे की भाव से प्रतीत हो रहा था । थोड़ा रुक कर फिर बोलने लगी - तुम तो परदेशी हो गये , याद रखोगे भी कैसे कि तुम्हारा कम्मो नाम की एक बहन भी थी । इन दिनों किन परिस्थितियों से हो कर मैं गुज़री हूँ वो मैं ही जानती और मेरा कान्हा जानता है । मर गयी होती तो कब से मर चुकी होती । आज जो मैं ज़िंदा हूँ इसका कारण भी मैं ही हूँ। मैं नहीं मरी क्यों कि मैं मर नहीं सकती । मेरी ज़िंदगी हर रोज बिखर जाने वाली फूल की तरह है , मैं डाली से बिछड़ सकती हूं , टूट सकती हूँ , मुरझा सकती हूं , मगर मर नहीं सकती। मैं बासि फूल जो ठहरी । प्रभु के चरणों में लग जाने के बाद मरण कैसी ? आह भरते हुए बोली कमला- कहां गये वो बचपन की दिन ! वो सारे सुनहरे सपने पानी के बुलबुले जैसे गुम हो गए । किसे दोष दूँ ? वाल्यावस्था से जिसे अपना माना वो सब जान कर भी अनजान बना हुआ है, किसी और को दोष दे कर क्या फायदा ? अपने कान्हा के तरफ इशारा करते हुए कहा , देखो कैसे मुस्कुरा रहा है मेरी मजबूरी पर । इससे पहले कि वह कुछ कह पाती, उसने एक गहरी आह भरी। उस आह से मेरा दिल भी दहल गया । ऐसा लगा मानो उसके दिल में जमाने से दफनाए हुए दर्द एक साथ वाष्पीकृत होकर बाहर आने को आतुर हो रहें हों , और उस उष्माहट में मैं भी झुलस जाऊंगा । उसने कहा - मेरा इस दशा के लिये किसी को दोष दे नहीं सकती । केवल मेरा नियति समझ कर कान्हा को बोल देती हूँ बार बार , कई बार । सब सुनता , मगर कुछ बोलता नहीं । बोलेगा भी क्या , क्या जवाब है उसके पास? जिसे वाल-काल से पूजते आयी हूँ वो अगर इतना निर्मम हो सकता तो किसी दूसरे को दोष दे कर क्या फायदा ? कान्हा के तरफ देखते देखते आँखें नम हो गयी उसकी , मगर टपकने से पहले कहीं गायब हो भी गयी । ये आंसू भी बड़े अजीब होते हैं । कभी बहते तो रुकने का नाम नहीं लेते , कभी रोने का जी करे तो पलकों तले दुबके रह जाते । कुछ पलों का खामोशी मुझे अतीत और वर्त्तमान के बीच त्रिशंकु बना दिया था । तभी कमला बोली फिर से -तुम तो बहुत कुछ जानते हो । जहां से नहीं जानते हो या जानने की कोशिश नहीं की , उसके लिए मैं तुम्हें दोष नहीं दे सकती ।मेरे पिता ने तुम्हारे परिवार के साथ जो अत्याचार किया , अगर मैं तुम्हारे जगह होती तो मैं भी वही करती जो तुमने की है । और ऐसे तुम्हारा क़सूर क्या , कुछ भी तो नहीं , बस इतना कि मुझे भूल गए हो ।दूसरी बात अगर तुम गावँ में रहे होते तो बात इतनी नहीं बिगड़ी होती , दूरियाँ इतनी नहीं बढ़ी होती । अपनी परिवार की जिम्मेदारी निभाते निभाते मुझे याद रख न पाये । ऐसे मैं तुम्हारा सग्गी बहन तो नहीं हूँ , की तुम इतना सोचोगे मेरे लिए! एक सांस में इतना कुछ कह गयी वो, मैं सुन रहा हूं..बस सुन रहा था। मैंने खुद को रोक न पाया और पूछा बैठा- तुम व्याह क्यों नहीं कि , क्यों खुद को बर्बाद कर दी ? तब दार्शनिक अंदाज़ में बोली कमला - स्त्री और पुरुष का जन्मजन्मांतर का वैदिक बंधन को शायद विवाह कहते हैं , जिस से बंध कर दो शरीर और दो आत्मा एक हो जाते । मैं का अस्तित्व हम में परिवर्त्तित हो जाता । दो शरीर एक जाँ हो जाते । मैंने आश्चर्य से उसका चेहरा देख रहा था । उसने कहा :-जब तुम ने मुझे देखा था, तब मैं सिर्फ एक लड़की थी, मगर औरत बन नहीँ पाई। जब नारी ही बन नहीं पाई फिर सादी कैसे कर सकती ? मैं जो एक "अर्धनारी" ठहरी हूँ ; मेरी नशीब में सादी कहाँ? मैं अचंभित हो कर उसे देख रहा था,कुछ देर की चुप्पी के बाद वह फिर बोली : मेरे पिता के पास क्या कमी थी, न धन की, न प्रभाव की। वह चाहे होते तो क्या नहीं कर सकते थे? अगर वो मेरे तरफ एक बार ध्यान दिए होते तो मैं आज इतनी अवहेलित सी ज़िंदगी न जी रही होती । मेरी भी एक छोटी सी सही सुखी संसार होता। मैं एक "अर्द्ध-नारी" बनकर अभिशप्त ज़िंदगी न व्यतीत कर रही होती ; कम से कम एक औरत बनकर तो गर्व से जी रही होती । मैं चुपचाप सुनता था , वह बोलती जाती थी- :- किशोरावस्था के बाद लड़की और लड़के के बीच की नजदीकियों को समाज में अलग नजर से देखा जाता है। इसलिए उन के बीच पहले जैसे मिलनाज़ुलना नहीं हो पाता । कई बातें तो लड़के जान भी नहीँ पाते जो लड़कियों को सहनी पड़ती हैं । तुम समझ पा रहे होंगे जो मैं कहना चाहती हूँ । आज मुझे शर्म नहीं आती ये सब बताते हुए । उम्र का उस पड़ाव को कब की पर कर चुकी हूँ । अब तो बूढ़ी हो चुकी हूँ , अब शर्म कैसी ? जो बात अब तक किसी को बता नहीं पाई आज अगर तुम को नहीं बताऊंगी शायद इस जन्म में किसी और को बता नहीं पाऊंगी । इसलिए तुम चाहो या न चाहो , सुनो एक "अर्धनीरी" की दिल की कथा , हृदय का व्यथा । तुम को सुनना होगा उसकी खामोश आँखों से गायब हो चुकी आँसुओं की पुकार । वो बोले जा रही थी और मैं सुन रहा था और महसूस कर रहा था उसकी चेहरे की पल पल बदलते अभावी भावों को । क्रमशः.......
